9 अप्रैल 1893 को पंदहा, आजमगढ़ में राहुल सांकृत्यायन का जन्म हुआ। राहुल सांकृत्यायन विख्यात हिंदी, भोजपुरी लेखक, खोजी, निबंधकार, नाटककार, इतिहासकार, बौद्ध धर्म के विद्वान, अनुवादक, हिंदी यात्रा साहित्य के जनक, मार्क्सवादी समाजवाद के प्रवल समर्थक, पाखंड और रूढ़ियों के विरोधी बने। पेश हैं राहुल सांकृत्यायन के कुछ विचारणीय, प्रेरणादायक, अनुकरणीय उद्धरण
रूढ़ियों को लोग इसलिए मानते हैं, क्योंकि उनके सामने रूढ़ियों को तोड़ने वालों के उदाहरण पर्याप्त मात्रा में नहीं हैं।
बहुतों ने पवित्र, निराकार, अभौतिक, प्लेटोनिक प्रेम की बड़ी-बड़ी महिमा गाई है और समझाने की कोशिश की है कि स्त्री-पुरुष का प्रेम सात्विक तल पर ही सीमित रह सकता है। लेकिन यह व्याख्या आत्म-सम्मोहन और परवंचना से अधिक महत्व नहीं रखती। यदि कोई यह कहे कि ऋण और धन विद्युत- तरंग मिलकर प्रज्वलित नहीं होंगे, तो यह मानने की बात है।
असल बात तो यह है कि मजहब तो सिखाता है आपस में बैर रखना। भाई को है सिखाता भाई का खून पीना। हिंदुस्तानियों की एकता मजहब के मेल पर नहीं होगी, बल्कि मजहबों की चिता पर। कौव्वे को धोकर हंस नहीं बनाया जा सकता। कमली धोकर रंग नहीं चढ़ाया जा सकता। मजहबों की बीमारी स्वाभाविक है। उसकी मौत को छोड़कर इलाज नहीं।
हमारे सामने जो मार्ग है उसका कितना ही भाग बीत चुका है, कुछ हमारे सामने है और बहुत अधिक आगे आने वाला है। बीते हुए से हम सहायता लेते हैं, आत्मविश्वास प्राप्त करते हैं, लेकिन बीते की ओर लौटना कोई प्रगति नहीं, प्रतिगति-पीछे लौटना होगा। हम लौट तो सकते नहीं क्योंकि अतीत को वर्तमान बनाना प्रकृति ने हमारे हाथ में नहीं दे रखा है।
वह कैसे भविष्यवाणी कर सकती है कि जिस स्वर्ग की हमने आकाश में कल्पना की है, वह उस दिन ढह जाएगा यदि वह किसी तरह यह स्वर्ग बन गया? स्वर्ग में स्वर्ग और अधोलोक में नर्क को स्वर्ग-नरक के आधार पर व्यापार करने के लिए धरती पर स्वर्ग और नर्क की आवश्यकता है। यह आवश्यकता राजा-एंडी और दास-स्वामी के बीच के अंतर से पूरी होती है
प्रकृति ने कभी मानव पर खुलकर दया नहीं दिखाई, मानव ने उसकी बाधाओं के रहते उस पर विजय प्राप्त की।
भिक्षुओ! मैं ऐसा एक भी रूप नहीं देखता, जो पुरुष के मन को इस तरह हर लेता है जैसा कि स्त्री का रूप स्त्रीं का शब्दी स्त्रीे की गंध स्त्री का रस स्त्रीा का स्पिर्श। इसके बाद उन्हों ने यह भी कहा, भिक्षुओं ! मैं ऐसा एक भी रूप नहीं देखता, जो स्त्री के मन को इस तरह हर लेता है, जैसा कि पुरुष का रूप, पुरुष का।
एको चरे खग्गर विसाण-कप्पोन (गैंडे के सींग की तरह अकेले विचरे), घुमक्कड़ के सामने तो यही मोटो होना चाहिए।
धर्म एक व्यक्तिगत अनुभव है, और इसे दूसरों पर थोपा नहीं जाना चाहिए।
सत्य एक अखंडता है, और इसे कई हिस्सों में विभाजित नहीं किया जा सकता है।
संस्कृति एक जीवन शैली है, और यह हमारे विचारों, भावनाओं, और व्यवहारों को आकार देती है।
बाहरी दुनिया से अधिक बाधाएं आदमी के दिल में होती हैं।
सत्य की खोज में, हमें अपने स्वयं के पूर्वाग्रहों और धारणाओं से मुक्त होना होगा।
संस्कृति एक जीवित प्रक्रिया है, और यह समय के साथ विकसित होती रहती है।
भागो नहीं, दुनिया को बदलो।
जीवन समयबद्ध है, इसे व्यर्थ न कीजिए।
हमारे सामने जो मार्ग है उसका कितना ही भाग बीत चुका है, कुछ हमारे सामने है और बहुत अधिक आगे आने वाला है।
आत्मविश्वास ही सफलता की कुंजी है। अगर हम अपने आप पर विश्वास करते हैं, तो हम कुछ भी कर सकते हैं। बीते हुए समय से हम सहायता लेते हैं, आत्मविश्वास प्राप्त करते हैं, लेकिन बीते की ओर लौटना कोई प्रगति नहीं, प्रतिगति-पीछे लौटना होगा।
जीवन एक संघर्ष है, और संघर्ष से ही जीवन की सार्थकता है।
असफलता से कभी निराश नहीं होना चाहिए।
असफलता हमें सफल होने के लिए तैयार करती है।
सत्य ही प्रकाश है। सत्य से ही हमें सही मार्ग मिलता है।
शांति ही मानवता का लक्ष्य है। शांति से ही हम एक बेहतर दुनिया बना सकते हैं।
सामाजिक न्याय और समानता के बिना, शांति और समृद्धि संभव नहीं है।
सामाजिक न्याय एक आवश्यकता है, और यह हमें एक बेहतर समाज बनाने में मदद करता है।
प्रकृति ने कभी मानव पर खुलकर दया नहीं दिखाई, मानव ने उसकी बाधाओं के रहते उस पर विजय प्राप्तस की।
धर्म शत्रुता सिखाता है, और भाइयों को आपस में लड़ाता है। भारत में एकता धर्मों को जोड़ने से नहीं, बल्कि धर्मों की चिता पर ही आएगी।
सच्चा ज्ञान दुनिया के बारे में सिर्फ़ पढ़ने से नहीं, बल्कि उसे अनुभव करने से मिलता है।
सहानुभूति ही मानवता का मूल है। सहानुभूति से ही हम दूसरों की मदद कर सकते हैं। -राहुल सांकृत्यायन
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