
गर्मी के मौसम में उत्तर भारत में बेल फल का काफी इस्तेमाल किया जाता है। बेल का वेज्ञानिक नाम एगल मार्मेलोस है। बेल भारतीय उपमहाद्वीप और दक्षिण-पूर्व एशिया में पाए जाने वाले पेड़ की एक प्रजाति है। यह भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल में एक प्राकृतिक प्रजाति के रूप में पाया जाता है। रोगों को नष्ट करने की क्षमता के कारण बेल को बिल्व कहा गया है। इसके अन्य नाम हैं-शाण्डिल्रू, श्री फल, सदाफल इत्यादि। इसका गूदा निकाल कर सीधे खाया जाता है या उसका शरबत बनाया जाता है। बाजार में मिलने वाले पेय पदार्थों की जगह आप नियमित बेल के शरबत का इस्तेमाल करें तो इससे आपको भरपूर पोषण मिलेगा और इसके साइड इफैक्ट भी नहीं हैं।
आयुर्वेदिक में बेल को दीपन, पाचन सुधारक और ग्रहणी रोगों को दूर करने वाला बताया गया है। खास बात यह है कि बेल का सिर्फ फल ही नहीं, बल्कि इसके पत्ते, छाल और जड़ भी औषधीय गुणों से भरपूर होते हैं, जिनका उपयोग चिकित्सकीय सलाह से किया जा सकता है। गर्मियों में शरीर में सूजन, जलन या भारीपन महसूस हो तो बेल का रस राहत पहुंचा सकता है। इसमें मौजूद प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट और एंटीमाइक्रोबियल तत्व शरीर की सूजन कम करने में सहायक माने जाते हैं। पाचन संबंधी समस्याओं जैसे कब्ज, एसिडिटी या अल्सर में भी इसका सेवन फायदेमंद माना जाता है, क्योंकि यह आंतों को साफ रखने और पाचन क्रिया को संतुलित करने में मदद करता है। जिन लोगों को रस पीना पसंद नहीं, वे बाजार में मिलने वाला बेल का चूर्ण भी ले सकते हैं, जो कब्ज और दस्त दोनों स्थितियों में लाभ दे सकता है।
ठीक से पका हुआ काफी मीठा होता है, अधपका फल मीठा लेकिन कुछ कसैला होता है। बेल रक्त शर्करा को संतुलित रखने में भी सहायक माना जाता है। इसके पत्तों का अर्क ग्लूकोज मेटाबॉलिज्म को सपोर्ट करता है, जिससे ब्लड शुगर का स्तर नियंत्रित रहने में मदद मिल सकती है, हालांकि इसके सेवन से पहले डॉक्टर की सलाह जरूरी है। बेल का सेवन करने के लिए इसके गूदे को पानी में मसलकर छान लें और उसमें मिश्री मिलाकर पी सकते हैं। इसे सुबह या शाम किसी भी समय लिया जा सकता है। हालांकि गर्भवती महिलाओं और मधुमेह के मरीजों को इसका नियमित सेवन शुरू करने से पहले चिकित्सकीय परामर्श अवश्य लेना चाहिए।
बेल के फल में विटामिन और पोषक तत्वों की भरमार होती है। बेल में मौजूद टैनिन और पेक्टिन मुख्य रुप से डायरिया और पेचिश के इलाज में अहम भूमिका निभाते हैं। इसके अलावा बेल के फल में विटामिन सी, कैल्शियम, फाइबर, प्रोटीन और आयरन भी अधिक मात्रा में मिलते हैं। बेल के नियमित सेवन से शरीर के लिए आवश्यक पोषक तत्वों की आपूर्ति होती है साथ ही शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है।
बेल को आप कई तरीकों से खा सकते हैं। आमतौर पर बेल का रस या बेल के शरबत का इस्तेमाल सबसे ज्यादा किया जाता है लेकिन आप इस फल को तोड़कर सीधे खा भी सकते हैं। इसका बाहरी हिस्सा काफी कठोर होता है उसे तोड़ दें और अंदर के लिसलिसे गूदे में से बीज को निकालकर खाएं या रात भर इस गूदे को पानी में भिगोकर रखें और अगली सुबह इसे खाएं। कई लोग इसके गूदे को सुखाकर उसका चूर्ण बनाकर सेवन करते हैं जिसे बेलगिरी चूर्ण कहा जाता है। इसके अलावा बेल की पत्तियों का रस भी बहुत गुणकारी है और कई बीमारियों में इसका इस्तेमाल किया जाता है। आप घर पर ही बेल का मुरब्बा बनाकर उसका सेवन कर सकते हैं। यह स्वाद में भी मीठा होता है और लाभकारी भी है।
बेल के जूस में ऐसे गुण पाए जाते हैं जो खून को साफ करने में मदद करते हैं। इसके नियमित सेवन से खून शुद्ध होता है और खून में संक्रमण की वजह से होने वाली कई तरह की बीमारियों से बचाव होता है। बेल का सेवन किडनी के लिए भी फायदेमंद है और यह किडनी की कार्यक्षमता को और बढ़ाती है। शोध के अनुसार बेल की जड़ों और पत्तियों में डायूरेटिक गुण होते हैं जो मूत्र का उत्पादन बढ़ाती हैं। यह खास तौर पर वाटर रिटेंशन की समस्या से आराम दिलाने में बहुत कारगर है।
लीवर से जुड़ी बीमारियां अक्सर तभी होती हैं जब शरीर में टॉक्सिन या हानिकारक विषैले पदार्थ बढ़ जाते हैं या किसी तरह का संक्रमण हो। शोध के अनुसार बेल में एंटी-फंगल, एंटी बैक्टीरियल और एंटी माइक्रोबियल गुण होते हैं साथ ही इसमें बीटा-कैरोटीन भी पाया जाता है जो लीवर को किसी भी तरह के संक्रमण और चोट से बचाने में मदद करते हैं।
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