
1 अप्रैल 2024 को हाइफा, इजराइल में जाने माने इराकी-इजराइली लेखक, नागरिक अधिकार कार्यकर्ता और एसोसिएशन फोर सिविल राइट्स इस्राइल के संस्थापक, अध्यक्ष सामी माइकल (जन्म 15 अगस्त 1926, बगदाद, इराक) सामी माइकल का निधन हुआ। सामी माइकल इजराइल के उन पहले लोगों में से थे जिन्होंने इजराइल राज्य के साथ-साथ एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य बनाने की मांग की थी। उनकी लेखनी में पहचान, बहुसंस्कृतिवाद और प्रवासियों के अनुभवों को दर्शाया गया। उनके विचार अरबी और हिब्रू दोनों संस्कृतियों से उनके गहरे जुड़ाव, उनकी लेखन प्रक्रिया और उनके मानवतावादी और प्रायः उदासी भरे नजरिए को दिखाते हैं।
सामी माइकल ने एक बार एक ड्राइवर के साथ कार में की गई एक लंबी यात्रा का किस्सा दर्ज किया हैं, यात्रा के दौरान, ड्राइवर ने माइकल को समझाया कि हम यहूदियों के लिए सभी अरबों को मार डालना कितना जरूरी, बल्कि कितना जरूरी और तत्काल आवश्यक है। सामी माइकल ने विनम्रता से उसकी बात सुनी, और डर, निंदा या घृणा से प्रतिक्रिया देने के बजाय, उन्होंने ड्राइवर से एक सीधा-सा सवाल पूछा, और तुम्हारी राय में, सभी अरबों को कौन मारेगा?
हम! यहूदी! हमें ही मारना होगा! या तो हम रहेंगे या वे! क्या तुम्हें दिखाई नहीं देता कि वे हमारे साथ क्या कर रहे हैं?
लेकिन असल में, सभी अरबों को कौन मारेगा? सेना? पुलिस? शायद दमकलकर्मी? या सफेद कोट पहने, हाथ में सिरिंज लिए डॉक्टर?
ड्राइवर ने अपना सिर खुजलाया, सवाल पर कुछ देर सोचा, और आखिर में बोला, हमें यह काम आपस में बाँटना होगा। हर यहूदी आदमी को कुछ अरबों को मारना होगा।
माइकल ने हार नहीं मानी, ठीक है। मान लीजिए कि आप, एक हाइफा निवासी के तौर पर, हाइफा की एक अपार्टमेंट बिल्डिंग के इंचार्ज हैं। आप घर-घर जाते हैं, घंटियाँ बजाते हैं, और वहाँ रहने वालों से विनम्रता से पूछते हैं, माफ कीजिए, क्या आप लोग अरब हैं? अगर जवाब हाँ होता है, तो आप उन्हें गोली मारकर मार डालते हैं। जब आप बिल्डिंग में मौजूद सभी अरबों को मार चुके होते हैं, तो आप नीचे उतरते हैं और अपने घर की ओर चल पड़ते हैं, लेकिन अभी आप ज्यादा दूर नहीं पहुँचे होते कि आपको सबसे ऊपरी मंजिल से एक बच्चे के रोने की आवाज सुनाई देती है। अब आप क्या करेंगे? क्या आप मुड़ेंगे? क्या आप वापस जाएँगे? क्या आप ऊपर जाकर उस बच्चे को गोली मार देंगे? हाँ या नहीं?”
एक लंबा सन्नाटा छा गया। ड्राइवर सोचने लगा। आखिरकार उसने कहा, सर, आप बहुत ही क्रूर इंसान हैं!
यह कहानी उस उलझन को उजागर करती है जो कभी-कभी किसी कट्टरपंथी के मन में पाई जाती है, हठधर्मिता और भावुकता का एक अजीब मिश्रण, और साथ ही कल्पनाशीलता की कमी।
सामी माइकल के उद्धरण
मैं इराकी भी हूँ और मैं इजराइली भी हूँ। ये दोनों पहचानें मेरे भीतर मौजूद हैं और मैं इन दोनों से ही प्यार करता हूँ, क्योंकि ये दोनों ही मेरा एक अभिन्न अंग हैं। ये दोनों नदियाँ मेरे लेखन में भी प्रवाहित होती हैं।”
लिखते समय कभी-कभी मेरे साथ ऐसा होता है कि मैं किसी शब्द की तलाश में होता हूँ, वह शब्द, अपनी नटखट अदा के साथ, अंग्रेजी में तो मिल जाता है, अरबी में भी मिल जाता है, लेकिन हिब्रू में आने से साफ इनकार कर देता है। कुछ हद तक, मैंने अपनी हिब्रू भाषा को खघ्ुद ही गढ़ा है। इसमें कोई शक नहीं कि इस पर अरबी भाषा का प्रभाव ही सबसे ज्यादा हावी है, मेरे वाक्यों की बनावट लगभग पूरी तरह से अरबी जैसी ही है।
मैं उस पीढ़ी से ताल्लुक रखता हूँ जो बटन दबाने के बजाय उन्हें घुमाना ज्यादा पसंद करती है। मैं इसके अलावा कुछ और कर भी नहीं सकता। मुझे कलम के उस स्पर्श की जरूरत महसूस होती है, जिसके जरिए शब्द मेरे हाथों से निकलकर सीधे कागज पर उतर आते हैं।
मेरा लेखन कार्य कभी-कभी दो या तीन साल तक भी चलता रहता है, और फिर मैं उसे पूरी तरह से फेंक देता हूँ। मुझे किसी को भी कोई चीज देने या सौंपने की कोई बाध्यता नहीं है, यही वजह है कि मेरी दो किताबों के बीच कभी-कभी छह या सात साल का लंबा अंतराल भी आ जाता है।
महज पाँच मिनट के बेहद छोटे से अंतराल में ही, इस नई मातृभूमि ने मेरे पिता को, जो उस समय अपनी पूरी ताकत और ऊर्जा के साथ जीवन के शिखर पर खड़े थे, एक बुजुर्ग, अपमानित और पूरी तरह से टूट चुके इंसान में तब्दील कर दिया। -सामी माइकल

