
15 मार्च 1992 मुंबई में मशहूर उर्दू और हिंदी कवि, लेखक और बॉलीवुड गीतकार राही मासूम रजा (जन्म 1 सितंबर 1927 गाजीपुर, उत्तर प्रदेश) का इंतकाल हुआ। राही मासूम रजा ने अपनी कृतियों, मैं तुलसी तेरे आँगन की, तवायफ और लम्हे के लिए तीन बार सर्वश्रेष्ठ संवाद का फिल्मफेयर पुरस्कार जीता।
प्रश्न हमारा पीछा नहीं छोड़ते। मनुष्य मौत को जीत सकता है, परंतु प्रश्न को नहीं जीत सकता। कोई-न-कोई प्रश्न दुम के पीछे लगा ही रहता है।
नई नस्ल तो हमारी नस्ल से भी ज्यादा घाटे में है। हमारे पास कोई खघ््वाब नहीं है। मगर इनके पास तो झूठे ख्वाब हैं।
वह इस डर से बोलता रहता है कि चुप हुआ तो फिर शायद उसे भी यह याद न आए कि कभी उसके पास भी एक आवाज हुआ करती थी।
समय के सिवा कोई इस लायक नहीं होता कि उसे किसी कहानी का हीरो बनाया जाए।
मुसलमान लड़कों के दिलों में दाढ़ियां और हिंदू लड़कों के दिलों में चोटियां उगने लगीं। यह लड़के फिजिक्स पढ़ते हैं और कॉपी पर ओउम् या बिस्मिल्लाह लिखे बिना सवाल का जवाब नहीं लिखते। -राही मासूम रजा
अब कोई केवल शरीफ नहीं रह गया है। हर शरीफ के साथ एक दुमछल्ला लगा हुआ है। हिंदू शरीफ मुसलमान शरीफ, उर्दू शरीफ, हिंदी शरीफ और बिहार शरीफ! दूर-दूर तक शरीफों का एक जंगल फैला हुआ है।
इतिहास अलग-अलग बरसों या क्षणों का नाम नहीं है बल्कि इतिहास नाम है समय की आत्मकथा का।
किसी के पेपर पढ़ने से इंटीग्रेशन नहीं हो सकता। और जो हुआ भी तो लोग ज्यादा-से-ज्यादा आले गृहमद सुरूर और रविंद्र भ्रमर हो जाएँगे। नहीं भाई, मुझे सीधे-सादे कम्युनल हिंदू-मुसलमान ज्यादा पसंद हैं।
नफरत! शक! डर! इन्हीं तीन डोंगियों पर हम नदी पार कर रहे हैं। यही तीन शब्द बोए और काटे जा रहे हैं। यही शब्द धूल बनकर माँओं की छातियों से बच्चों के हलक में उतर रहे हैं। दिलों के बंद किवाड़ों की दराजों में यही तीन शब्द झाँक रहे हैं। आवारा रूहों की तरह ये तीन शब्द आँगनों पर मँडरा रहे हैं। चमगादड़ों की तरह पर फड़फड़ा रहे हैं और रात के सन्नाटे में उल्लुओं की तरह बोल रहे हैं। काली बिल्ली की तरह रास्ता काट रहे हैं। कुटनियों की तरह लगाई बुझाई कर रहे हैं और गुंडों की तरह ख्वाबों की कुँआरियों को छेड़ रहे हैं और भरे रास्तों से उन्हें उठाए लिए जा रहे हैं। तीन शब्द नफरत, शक, डर। तीन राक्षस।
हमारी दुनिया में जिसके दलाल न हों, उसकी आवाज कोई नहीं सुनता।
नौकरी! यह शब्द हमारी आत्मा के माथे पर खून से लिखा हुआ है। यह शब्द खून बनकर हमारी रगों में दौड़ रहा है। यह शब्द ख्वाब बनकर हमारी नींद की हत्या कर रहा है। हमारी आत्मा नौकरी के खूँटे से बंधी हुई लिपि की नाँद में चारा खा रही है।
हिपोक्रेसी के जंगल में दो परछाइयों ने अपने-आपको अकेला पाया तो दोनों लिपट गईं।
आदमी और देवता में यही फर्क है शायद। जहर अकेले शिव पीते हैं। जहर अकेला सुकरात पीता है। सलीब पर अकेले ईसा चढ़ते हैं। दुनिया त्यागकर एक अकेला राजकुमार निकलता है।
सुना जाता है कि पहले के जमानों में नौजवान, मुल्क जीतने, लंबी और कठिन यात्राएँ करने, खानदान का नाम ऊँचा करने के ख्वाब देखा करते थे। अब वे केवल नौकरी का ख्वाब देखते हैं। नौकरी ही हमारे युग का सबसे बड़ा एडवेंचर है। आज के फाहियान और इन्ने-बतूता, वास्कोडिगामा और स्काट, नौकरी की खोज में लगे रहते हैं। आज के ईसा, मोहम्मद और राम की मंजिल नौकरी है।
क्राइसिस यह है कि किसी को ख्वाबों के इस क्राइसिस का पता ही नहीं है।
राही मासूम रजा के दो शेर, कोई ख्वाब देख डालो, कोई इंकिलाब लाओ, दिल की खेती सूख रही है, कैसी ये बरसात हुई।
इस सफर में नींद ऐसी खो गई, हम न सोए रात थक कर सो गई।

