4 अप्रैल 1987 को नई दिल्ली में साहित्य अकादमी, ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त लेखक, कवि, उपन्यासकार, साहित्य आलोचक, पत्रकार, अनुवादक, क्रांतिकारी, समाचार पत्रिका दिनमान के संपादक सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय (जन्म 7 मार्च 1911 कासिया, आगरा और अवध के संयुक्त प्रांत, ब्रिटिश भारत) का निधन हुआ। अज्ञेय ने हिंदी कविता के साथ कथा साहित्य, आलोचना और पत्रकारिता में आधुनिक प्रवृत्तियों की शुरुआत की। उन्हें आधुनिक हिंदी साहित्य में प्रयोगवाद आंदोलन का प्रणेता माना जाता है। अज्ञेय का एक उद्धरण, अगर मैं अपने से बड़े किसी विचार, आदर्श, आइडिया के लिए जीता हूँ तो स्पष्ट है कि मेरा जीवन एक यज्ञ है, उस विचार या आदर्श के लिए अर्पित आहुति मैं हूँ।
मैं सदैव अपने शरीर को पवित्र रखने का प्रयास करूँगा, यह जानते हुए कि तुम्हारा जीवंत स्पर्श मेरे समस्त अंगों पर विद्यमान है।
वहीं, नित्य-प्रति रात को लोग आते थे, हमारे शरीरों को देखते थे, गन्दे संकेत करते थे, और हम बैठी सब कुछ देखा करती थीं। वहाँ, जब चूसे हुए नींबू की तरह बीमारियों से घुले हुए वे पूँजीपति साफ-साफ कपड़े पहनकर इठलाते हुए आते थे, उफ्! जिसने वह नहीं देखा, वह पूँजीवाद और साम्राज्यवाद का दूरव्यापी परिणाम नहीं समझ सकता! धन के आधिक्य से ही कितनी बुराइयाँ समाज में आ जाती हैं इसको जानने के लिए वह देखना जरूरी है!
एक आदमी के भीतर जो शैतान होता है, वह तब तक दूसरे आदमी के भीतर के शैतान का पक्ष लेता है, जब तक कि उसका स्वार्थ न बिगड़े।
जो एक बार अपनी इच्छा से पतित होता है, उसका उत्थान होना असंभव है। कोई उसका मित्र नहीं होता, कोई उसकी सहायता नहीं करता। मेरे लिए यही जीवन है, यही जिसे एक दिन मैंने इतनी व्यग्रता से अपनाया था, और जिसने आज साँप की तरह मुझे अपने पाश में बाँध लिया है!
जैसे कोई दान दी हुई गाय का कष्ट देखकर यही सोचकर रह जाता है कि अब मुझे इसका कष्ट निवारण करने का अधिकार नहीं रहा!
मन की यह भी एक शक्ति है कि जरा से भी साम्य के सहारे वह सहज ही संपूर्ण लयकारी संबंध जोड़ लेता है।
कार्ल न जाने क्यों अधिकाधिक उदास होता जा रहा है, वह कहता है कि हम अपनी ही हानि कर रहे हैं। कहता है कि सिकंदर पागल था, अपने राष्ट्र को दूर-दूर तक फैलाता गया, पर उसकी रक्षा नहीं कर सका, व्यर्थ ही इतने प्राण नष्ट किए, एक अपनी व्यक्तिगत तृप्ति के लिए३वह कहता है कि सबको स्वतंत्र होने का अधिकार है, कि एक देश पर दूसरे देश का अधिकार स्थापित करना नीचता है और अन्याय की सीमा है।
क्रांति सुधार नहीं है। न सही। परिवर्तन ही सही। लेकिन परिवर्तन का भी तो ध्येय होता है! क्रांति परिवर्तन भी नहीं है। मैंने सोचा, पूछूँ तो फिर क्रांति है क्या? किंतु मैं बिना पूछे उसके मुख की ओर देखने लग गया। वह स्वयं बोली, क्रान्ति आन्दोलन, सुधार, परिवर्तन कुछ भी नहीं है क्रांति है विश्वासों का, रूढ़ियों का, शासन की और विचार की प्रणालियों का घातक, विनाशकारी, भयंकर विस्फोट! इसका न आदर्श है, न ध्येय, न धुर। क्रांति विपथगा, विध्वंसिनी है, विदग्धकारिणी है!
तुम्हें जो राह दीखती है, उस पर चलो, गौरा। धैर्य के साथ, साहस के साथ। और हाँ, जो तुमसे सहमत नहीं हैं उनके प्रति उदारता के साथ, जो बाधक हैं उनके प्रति करुणा के साथ। और राह पर जब ऐसा साथी मिलेगा जिस का साथ तुम्हें प्रीतिकर, वांछनीय, कल्याणप्रद लगे, तब किसी की बात न सुनना, जान लेना कि अब स्वतंत्र रूप से जोखम वरने का समय आ गया।
संकट में हम हार जाएँगे, मैं नहीं मानती, और मुझे लगता है कि यह न मानना भी स्वयं एक मोर्चा है क्योंकि मानव-नियति में विश्वास खोना मानव की प्रतिष्ठा की लड़ाई हार जाना है
और गार्हस्थ्य एक लंबी यात्रा है, बल्कि पथ-यात्रा नहीं, सागर-यात्रा, जिस में मोड़-चौराहे पर नहीं, क्षण-क्षण पर संकल्प-पूर्वक जोखम का वरण करना होता है और कोई लीकें आँकी हुई नहीं मिलतीं, नक्शे और कंपास और अन्ततोगत्वा अपनी बुद्धि और अपने साहस के सहारे चलना होता है।
अहंकार स्वाभाविक होता है, विनय सीखनी ही पड़ती है।
मन बहुत सोचता है कि उदास न हो पर उदासी के बिना कैसे रहा जाए ? शहर के, दूर के तनाव-दबाव कोई सह भी ले पर यह अपने ही रचे एकांत का दबाव सहा कैसे जाए !
औद्योगिक क्रान्ति के साथ वह सुविधा का गुलाम बन कर एक के बाद एक विभ्राट उत्पन्न करता चले?
मेरा वश होता, और भविष्य बने-बनाए मिलते, तो मैं आपको एक ऐसा सुंदर भविष्य ला देती कि बस। उसके चार पाये चार इंद्रधनुष होते, और फूलों पर पड़ी हुई चाँदनी उसके ऊपर होती, तितलियों के पंखों से रंग लेकर उसे रँगा जाता।
नीति से अलग विज्ञान बिना सवार का घोड़ा है, बिना चालक का इंजिन रू वह विनाश ही कर सकता है।
मैं जो सदा आगे की ओर ही देखता रहा, अपनी जीवन यात्रा के अंतिम पड़ाव पर पहुँच कर पीछे देख रहा हूँ कि मैं कहाँ से चलकर किधर-किधर भूल-भटककर, कैसे-कैसे विचित्र अनुभव प्राप्त करके यहाँ तक आया हूँ । और तब दिखता है कि मेरी भटकन में भी एक प्रेरणा थी।
सत्य अपने अंतर की पीड़ा से जाना जाता है।
नित्यता क्षणों की है, पर क्षण, क्षणभंगुर हैं। मैं भी हूँ, मुझमें जो कुछ नूतनता है, उसे मुझे इसी क्षण में कह डालना है, क्योंकि वह भविष्य की वस्तु है, मैं उसे कहे बिना रुक नहीं सकता और सोचने का समय नहीं, क्षण का अस्तित्व कितना?
अकेले बैठना, चुप बैठना, इस प्रश्न की चिंता से मुक्त होकर बैठना कि क्या सोच रहे हो? यह भी एक सुख है।
एक निगाह से देखना कलाकार की निगाह से देखना नहीं है।
कोई भी मार्ग छोड़ा जा सकता है, बदला जा सकता है पथ-भ्रष्ट होना कुछ नहीं होता, अगर लक्ष्य-भ्रष्ट न हुए।
सोचने से ही सब कुछ नहीं होता, न सोचते हुए मन को चुपचाप खुला छोड़ देने से भी कुछ होता है, वह भी सृजन का पक्ष है। कपड़े पहनने ही के लिए नहीं हैं, उतार कर रखना भी होता है कि धुल सकें।
नंगा होने, नंगे हो जाने, नंगा करने में फर्क है। गहरा फर्क। शिशु और जंतु का नंगा होना सहजावस्था है, आदमी जब नंगा हो जाता है तब वह ग्लानि अथवा अपमान की स्थिति होती है। स्त्री जब नंगी की जाती है तब वह भी अपमान और जुगुप्सा की स्थिति होती है, या आपकी बुद्धि वैसी हो तो हँसी की हो सकती है। स्त्री का लहँगा उतारना, या बंदरिया को लहँगा पहनाना, दोनों इन प्राणियों की प्रकृत परिविष्ट अवस्था को हीन दृष्टि से देखने के परिणाम हैं।
यह कैसे हो सकता है कि कोई अपना रास्ता चुने भी, और उस पर अकेला भी न हो। राजमार्ग पर चलने वाले रास्ता नहीं चुनते, रास्ता उन्हें चुनता है।
कितना सरल हो जाता है जीवन, जब विकल्प नहीं रहते।
अमेरिकी स्वप्न में छोटा कुछ नहीं हो सकता। यानी जो छोटा है उसे छोटा कहा नहीं जा सकता। अगर आप चूहा-दौड़ में भी हैं, तो संसार की सबसे बड़ी चूहा-दौड़ में हैं, अगर बौने हैं तो भी विराट बौने हैं।
क्रांति दूसरों को बाँध कर नहीं होती, अपने को मुक्त करके होती है।
कला सामाजिक अनुपयोगिता की अनुभूति के विरुद्ध अपने को प्रमाणित करने का प्रयत्न अपर्याप्तता के विरुद्ध विद्रोह है।
साहित्य तुम्हारी तुम्हीं से पहचान और गहरी करता है, तुम्हारी संवेदना की परतें उधेड़ता है जिससे तुम्हारा जीना अधिक जीवंत होता है और यह सहारा साहित्य दे सकता है, उससे अलग साहित्यकार व्यक्ति नहीं।
मैं अकेलापन चुनता नहीं हूँ, केवल स्वीकार करता हूँ।
जीवन की गहनतम घटनाएँ किसी अनजान क्षण में ही हो जाती हैं।
जो साहित्य या काव्य अपने समय की चिंताओं को, संदेहों को व्यक्त करता है, मूल्यों का संकट पहचान कर उन नए मूल्यों को पाने को छटपटाता है जो इस संकट के पार बचे रह सकते हैं, वही आज का साहित्य है। -अज्ञेय
त्याग मापने के लिए हर एक का अपना-अपना गज होता है और वह गज होता है उस व्यक्ति का अपना त्याग या त्याग करने की क्षमता।
जिन मूल्यों के लिए जान दी जा सकती है उन्हीं के लिए जीना सार्थक है।
अगर मैं अपने से बड़े किसी विचार, आदर्श, आइडिया के लिए जीता हूँ तो स्पष्ट है कि मेरा जीवन एक यज्ञ है, उस विचार या आदर्श के लिए अर्पित आहुति मैं हूँ।
जिस जीवन को उत्पन्न करने में हमारे संसार की सारी शक्तियाँ, हमारे विकास, हमारे विज्ञान, हमारी सभ्यता द्वारा निर्मित सारी शाखाएँ या औजार असमर्थ हैं, उसी जीवन को छीन लेने में, उसी का विनाश करने में, ऐसी भोली हृदयहीनता, फाँसी।
किसी भी समाज को अनिवार्यतः अपनी भाषा में ही जीना होगा। नहीं तो उसकी अस्मिता कुंठित होगी ही होगी और उसमें आत्म-बहिष्कार या अजनबियत के विचार प्रकट होंगे ही।
यह रोज का किस्सा है। मंत्री महोदय अपनी गणना में यह भूल गए हैं कि उनकी अपनी मीयाद बँधी है।
दुःख उसी की आत्मा को शुद्ध करता है जो उसे दूर करने की कोशिश करता है। शुद्धि दूसरे के साथ दुःखी होने में नहीं, दूसरे के स्थान पर दुःखी होने में है।
आधुनिक जीवन का आधार कोई जीवन-दृष्टि या दर्शन है भी कहाँ, सिर्फ मतवाद है और तंत्र है।
दुःख संसर्ग-जन्य है, वह उदात्त और शोधक भी है। दुःख का संसर्ग परवर्ती को भी शुद्ध और उदात्त बनाता है। -अज्ञेय
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