1 अप्रैल 1940 को इहिथे, टेटू, केन्या में वांगारी मथाई (वांगारी मुता) का जन्म हुआ। वांगारी मथाई प्रभावशाली केन्याई सामाजिक, पर्यावरण, राजनीतिक और महिला अधिकार कार्यकत्री बनीं। उन्होंने पर्यावरण-संबंधी गैर-सरकारी संगठन ग्रीन बेल्ट मूवमेंट की स्थापना की। जिसका मुख्य उद्देश्य पेड़ लगाना, पर्यावरण संरक्षण और महिलाओं के अधिकारों के लिए काम करना था। वर्ष 2004 में वह नोबेल शांति पुरस्कार पाने वाली पहली अफ्रीकी महिला बनीं। वांगारी मथाई के कुछ प्रेरक, विचारणीय, अनुकरणीय उद्धरण
आप पर्यावरण की रक्षा तब तक नहीं कर सकते, जब तक आप लोगों को सशक्त न करें, उन्हें जानकारी न दें, और उन्हें यह समझने में मदद न करें कि ये संसाधन उन्हीं के हैं।
मानवाधिकार ऐसी चीजें नहीं हैं जिन्हें लोगों के आनंद लेने के लिए थाली में परोस दिया जाए। ये ऐसी चीजें हैं जिनके लिए आपको लड़ना पड़ता है, और फिर उनकी रक्षा करनी पड़ती है।
आज हमारे सामने एक ऐसी चुनौती है जो हमारी सोच में बदलाव की मांग करती है, ताकि इंसानियत अपने जीवन-आधार को ही खतरे में डालना बंद कर दे। हमें धरती के जख्मों को भरने में उसकी मदद करने के लिए बुलाया गया है, और इस प्रक्रिया में, अपने जख्मों को भी भरने के लिए, सच तो यह है कि हमें पूरी सृष्टि को उसकी तमाम विविधताओं, सुंदरता और चमत्कारों के साथ अपनाना है। यह समझना कि सतत विकास, लोकतंत्र और शांति, ये तीनों एक-दूसरे से अविभाज्य हैं, एक ऐसा विचार है जिसका समय अब आ गया है।
जो पीढ़ी पर्यावरण को नष्ट करती है, वह उसकी कीमत नहीं चुकाती। यही तो समस्या है।
मैं इस बात से भली-भांति अवगत हूँ कि आप अकेले यह काम नहीं कर सकते। यह एक टीम वर्क है। जब आप इसे अकेले करते हैं, तो यह जोखिम बना रहता है कि जब आप इस दुनिया में नहीं रहेंगे, तो कोई और इस काम को आगे नहीं बढ़ाएगा।
शिक्षा का अगर कोई वास्तविक अर्थ है, तो उसे लोगों को जमीन (प्रकृति) से दूर नहीं करना चाहिए, बल्कि उनके मन में इसके प्रति और भी अधिक सम्मान जगाना चाहिए, क्योंकि शिक्षित लोग ही यह समझने की स्थिति में होते हैं कि हम क्या खो रहे हैं। इस ग्रह का भविष्य हम सभी से जुड़ा है, और हम सभी को इसकी रक्षा के लिए अपनी पूरी क्षमता से प्रयास करना चाहिए। जैसा कि मैंने वनकर्मियों और महिलाओं से कहा था, पेड़ लगाने के लिए किसी डिप्लोमा की जरूरत नहीं होती।
सबसे कठिन पलों में भी अवसर छिपे होते हैं।
अंततः मैं यह समझ पाई कि अगर मैं दुनिया में कोई योगदान देना चाहती हूँ, तो मुझे वह करना ही होगा, भले ही दूसरे लोग कुछ भी क्यों न कहें। मुझे यह एहसास हुआ कि मैं जैसी हूँ, वैसी ही ठीक हूँ। और यह भी कि मजबूत होना बिल्कुल सही बात है।
एक ऐसा समय आता है जब इंसानियत को चेतना के एक नए स्तर पर पहुँचने का आह्वान किया जाता है… और वह समय अब आ गया है।
बादल कितने भी घने और काले क्यों न हों, उनमें हमेशा एक पतली-सी चाँदी की लकीर (आशा की किरण) छिपी होती है, और हमें उसी की तलाश करनी चाहिए। वह आशा की किरण जरूर आएगी, भले ही वह हमारे जीवनकाल में न आए, तो अगली पीढ़ी के लिए आएगी, या फिर उसके बाद वाली पीढ़ी के लिए। और हो सकता है कि उस पीढ़ी के आते-आते, वह चाँदी की लकीर अब पतली न रहकर, और भी ज्यादा रोशन और स्पष्ट हो जाए।
हम सभी एक ही ग्रह पर रहते हैं और हम सब मिलकर एक ही इंसानियत का हिस्सा हैं, इस सच्चाई से कोई भी मुँह नहीं मोड़ सकता।
जब हम पेड़ लगाते हैं, तो हम असल में शांति और आशा के बीज बोते हैं।
पेड़, शांति और आशा के जीवंत प्रतीक होते हैं। पेड़ की जड़ें भले ही जमीन की गहराइयों में होती हैं, लेकिन उसकी शाखाएँ आसमान की ऊँचाइयों को छूती हैं। यह हमें बताता है कि ऊँची उड़ान भरने के लिए हमें जमीन से जुड़ा रहना जरूरी है।
जिसे लोग निडरता समझते हैं, वह असल में दृढ़ता होती है।
दुनिया का अफ्रीका के साथ मेल-जोल हमेशा परोपकार की भावना से प्रेरित नहीं होता, बल्कि उन देशों के अपने स्वार्थ से प्रेरित होता है जो अपने अवसरों को ज्यादा से ज्यादा बढ़ाना चाहते हैं और अपनी लागत को कम से कम करना चाहते हैं, अक्सर उन लोगों की कीमत पर, जो ऐसा करने की स्थिति में नहीं होते।
पवित्र माने जाने वाले प्राकृतिक स्थल अपनी पवित्रता खो बैठे और उनका शोषण किया गयाय ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि स्थानीय लोग इस विनाश के प्रति असंवेदनशील हो गए और इसे प्रगति की निशानी मानकर स्वीकार कर लिया।
जब हम पेड़ लगाते हैं, तो हम शांति और उम्मीद के बीज बोते हैं। हम अपने बच्चों के भविष्य को भी सुरक्षित करते हैं।
हम सभी एक ही ग्रह पर रहते हैं और एक ही मानवता का हिस्सा हैंय इस सच्चाई से कोई बच नहीं सकता।
उपनिवेशवाद के शिकार लोगों के मानसिक आघात की जाँच-पड़ताल शायद ही कभी की जाती है, और इसे समझने तथा इसका निवारण करने के लिए शायद ही कभी कोई कदम उठाए जाते हैं। इसके बजाय, यह मनोवैज्ञानिक क्षति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचती रहती है, तब तक, जब तक कि इसके शिकार लोग अपनी दुविधा को पहचानकर खुद को इस आघात से मुक्त कराने के लिए प्रयास शुरू नहीं कर देते।
मैंने न्डेरितु से कहा, इस सेमेस्टर में मैं प्राणीशास्त्र मनोविज्ञान, धर्मशास्त्र, अंग्रेजी रचना आधुनिक यूरोपीय इतिहास और खेल-कूद के विषय पढ़ रही हूँ। यह काफी ज्यादा काम है, इतना कि मेरे छोटे से दिमाग को व्यस्त रखने के लिए काफी है।… यह शिक्षा काफी व्यापक थी और, अगर अब पीछे मुड़कर देखूँ, तो काफी उदार भी थी।
जब आपको पता हो कि आप सही हैं, तो बोलने से मत डरिए। डर कभी भी सुरक्षा का स्रोत नहीं रहा है। साफ-साफ बोलिए और जब तक हो सके, अपने अधिकारों के लिए लड़िए।
हकीकत यह है कि मातृभाषाएँ संवाद के माध्यम के तौर पर, और संस्कृति, ज्ञान, बुद्धिमत्ता तथा इतिहास को आगे बढ़ाने वाले वाहक के तौर पर बेहद महत्वपूर्ण होती हैं। जब उन्हें नीचा दिखाया जाता है और पढ़े-लिखे लोगों को उन्हें हे, दृष्टि से देखने के लिए उकसाया जाता है, तो लोगों को उनकी विरासत के एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्से से वंचित कर दिया जाता है।
अगर आप अब वहाँ होते, तो मुझे जमीन जोतते हुए और अपनी पीठ पर लकड़ियों का गट्ठर लादकर पहाड़ी पर चढ़ते हुए देखते, मैं अपने घर तक पहुँचता, जहाँ मैं आग जलाकर शाम का भोजन पकाता। मैं कहानियाँ नहीं सुनाता, क्योंकि अब उनकी जगह किताबों, रेडियो और टेलीविजन ने ले ली है। -वंगारी मथाई
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