29 मार्च 1826 को गीसेन, जर्मनी में विल्हेम मार्टिन फिलिप क्रिश्चियन लुडविग लीबनेख्त का जन्म हुआ। विल्हेम लीबनेख्त विख्यात जर्मन सामाजिक-लोकतांत्रिक राजनेता, पत्रकार और जर्मनी की सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रमुख संस्थापकों में से एक बने। विल्हेम लीबनेख्त का राजनीतिक करियर मार्क्सवाद से प्रेरित था और वे मजदूर पार्टी को चुनावी सफलता और व्यापक जन-सदस्यता की ओर ले जाने के लिए अग्रणी प्रयासकर्ताओं में से एक बने। विल्हेम लीबनेख्त अपने लंबे समय के राजनीतिक सहयोगी अगस्त बेबेल के साथ, 19वीं सदी के जर्मन समाजवाद में एक प्रमुख हस्ती थे। लीबनेख्त ने 1867 से 1871 तक उत्तरी जर्मन रीचस्टैग के सदस्य के रूप में और 1874 से लेकर 1900 में अपनी मृत्यु तक जर्मन रीचस्टैग के सदस्य के रूप में कार्य किया। विल्हेम लीबनेख्त जर्मनी की सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रमुख संस्थापकों में से एक माना जाता है।, उनका करियर जर्मन श्रमिक आंदोलन के छोटे, गुटों में बंटे समूहों से एक विशाल राजनीतिक दल में बदलने के दौर का गवाह रहा। उन्होंने समाजवाद-विरोधी कानूनों के कठिन दौर में पार्टी को सफलतापूर्वक आगे बढ़ाया, और उनके नेतृत्व ने उन संगठनात्मक और वैचारिक नींवों को रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिन्होंने दशकों तक पार्टी, संगठन को आकार दिया।
विल्हेम लीबनेख्त की राजनीतिक विरासत जटिल और विवादास्पद है। उन्हें कानूनी और संसदीय राजनीति के संदर्भ में मार्क्सवादी विचारों को अपनाने में एक प्रमुख हस्ती के रूप में देखा जाता है। उनकी नेतृत्व शैली को अक्सर एक भावनात्मक नेता के रूप में वर्णित किया जाता है। विल्हेम लीबनेख्त ने पार्टी की एकता को प्राथमिकता दी और शुरुआती जर्मन समाजवादी आंदोलन के विभिन्न गुटों के बीच विवादों को सुलझाने तथा उन्हें एकजुट रखने में अहम भूमिका निभाई। विल्हेम लीबनेख्त कट्टर लोकतंत्रवादी थे, जिन्होंने सत्ता पर षड्यंत्रपूर्ण तरीके से कब्जा करने और सर्वहारा वर्ग के अधिनायकवाद की अवधारणा को अस्वीकार कर दिया था। उनका तर्क था कि एक समाजवादी समाज का निर्माण केवल लोकतांत्रिक नींव पर और लोगों के बहुमत के समर्थन से ही किया जा सकता है। उन्होंने तर्क दिया, बिना लोकतंत्र के समाजवाद एक छद्म-समाजवाद है, ठीक वैसे ही जैसे बिना समाजवाद के लोकतंत्र एक छद्म-लोकतंत्र है। समाजवादी आधार पर संगठित समाज के लिए लोकतांत्रिक राज्य ही एकमात्र व्यावहारिक स्वरूप है। यहां पेश हैं विल्हेम लीबनेख्त के कुछ उद्धरण
समाजवाद और लोकतंत्र एक समान नहीं हैं, बल्कि वे एक ही सिद्धांत के अलग-अलग रूप हैं वे एक-दूसरे से जुड़े हैं, एक-दूसरे के पूरक हैं, और एक कभी भी दूसरे के साथ असंगत नहीं हो सकता। लोकतंत्र के बिना समाजवाद एक छद्म-समाजवाद है, ठीक वैसे ही जैसे समाजवाद के बिना लोकतंत्र एक छद्म-लोकतंत्र है। समाजवादी आधार पर संगठित समाज के लिए लोकतांत्रिक राज्य ही एकमात्र व्यावहारिक स्वरूप है।
पूंजी वहां निवेश नहीं करती जहां कोई लाभ न हो सके। मानवता का कोई मोल-भाव शेयर बाजार में नहीं होता।
समाजवादी समाज में हितों का टकराव समाप्त हो जाता है। प्रत्येक व्यक्ति अपने स्वयं के हित में अपनी क्षमताओं का विकास करता है, और इस प्रकार वह पूरे समुदाय को लाभ पहुंचाता है। आज, अहंवाद की व्यक्तिगत तुष्टि और जन-कल्याण, ये दोनों ही अधिकांशतः एक-दूसरे के विरोधी हैं, एक की पूर्ति दूसरे का निषेध करती है। किंतु नए समाज में ये विरोधाभास समाप्त हो जाते हैं, व्यक्तिगत अहं की तुष्टि और जन-कल्याण की अभिवृद्धि, ये दोनों ही बातें पूर्ण सामंजस्य के साथ एक-दूसरे के पूरक बनकर साथ-साथ चलती हैं।
प्रत्येक संघ, तथा समान लक्ष्यों और आकांक्षाओं का अनुसरण करने वाले व्यक्तियों का प्रत्येक समूह, ऐसे उच्च आदर्शों के अनेक उदाहरण प्रस्तुत करता है, जो भौतिक नहीं, बल्कि केवल नैतिक पुरस्कारों की ही अभिलाषा रखते हैं। ऐसे आदर्शों के अनुयायी स्वयं को विशिष्ट सिद्ध करने की महत्वाकांक्षा से, तथा जन-कल्याण के कार्य में अपना योगदान देने की तीव्र इच्छा से प्रेरित होते हैं। इस प्रकार की महत्वाकांक्षा एक सद्गुण है, इसका अनुसरण न केवल व्यापक जन-हित को बढ़ावा देता है, बल्कि व्यक्ति को भी आंतरिक संतोष प्रदान करता है। महत्वाकांक्षा केवल तभी हानिकारक सिद्ध होती है, जब उसका अनुसरण समुदाय के अहित की कीमत पर, अथवा दूसरों के हितों की बलि चढ़ाकर किया जाए।
लोकतंत्र के बिना समाजवाद एक छद्म-समाजवाद है, ठीक वैसे ही जैसे समाजवाद के बिना लोकतंत्र एक छद्म-लोकतंत्र है।
कोई समझौता नहीं, कोई राजनीतिक सौदेबाजी नहीं।
जो कोई भी इस तथ्य को समझने में असमर्थ रहता है, अथवा जो यह मान बैठता है कि वर्ग-संघर्ष अब एक अप्रासंगिक मुद्दा बन चुका है, या यह कि विभिन्न वर्गों के बीच का आपसी टकराव अब धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है, तो ऐसे व्यक्ति की वैचारिक स्थिति मूलतः बुर्जुआ दर्शन (पूंजीवादी विचारधारा) पर ही आधारित मानी जाएगी।
हमने यह भली-भांति अनुभव कर लिया है कि समाजवाद और लोकतंत्र, ये दोनों ही एक-दूसरे से अविभाज्य हैं। इस व्यवस्था के लिए न कोई आदमी, न कोई पैसा!
वर्ग-संघर्ष से ही हमारी पार्टी का जन्म हुआ है, और अपने अस्तित्व के लिए यह वर्ग-संघर्ष पर ही निर्भर करती है।
सभी देशों के सर्वहाराओं, एक हो जाओ! (1872 के अपने भाषणों में मार्क्स को उद्धृत करते हुए)।
हमारा किला हर हमले का सामना कर सकता है, इसे न तो जबरदस्ती जीता जा सकता है, और न ही घेराबंदी करके हमसे छीना जा सकता है।
उग्र-राष्ट्रवाद या अंध-राष्ट्रवाद पूँजीवादी वर्गों की ही ईजाद और उनका एकाधिकार है, उनका स्वार्थ इसी में है कि वे मजदूर वर्गों को आपस में बाँटकर रखें।
ज्ञान ही शक्ति है और शक्ति ही ज्ञान है।
इतिहास में ऐसा कोई शासक-वर्ग, शासक-समूह या शासक-जमात कभी नहीं हुई, जिसने अपने ज्ञान और अपनी शक्ति का उपयोग शासित लोगों को प्रबुद्ध करने, शिक्षित करने और उनका पालन-पोषण करने के लिए किया हो।
हमारे कार्यक्रम का व्यावहारिक क्रियान्वयन और पार्टी की कार्यनीतियाँ (रणनीतियाँ) हम सभी का साझा दायित्व हैं यहाँ हम सभी मिलकर काम करते हैं।
अपने शुरुआती वर्षों से ही मुझे एक दोहरे आदर्श ने प्रेरित किया है, एक स्वतंत्र और एकीकृत जर्मनी, और मजदूर वर्ग की मुक्ति, यानी, वर्ग-शासन का अंतय जो कि समस्त मानवजाति की मुक्ति के ही समान है।
भविष्य उस समाजवाद का है जो लोकतांत्रिक है, और उस लोकतंत्र का है जो समाजवादी है।
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