21 मार्च 1887 अर्बेलिया, बंगाल प्रेसिडेंसी, ब्रिटिश भारत (वर्तमान पश्चिम बंगाल) में एम. एन. रॉय (मानवेंद्र नाथ रॉय) का जन्म हुआ। एम. एन. रॉय 20वीं सदी के अत्यंत प्रभावशाली भारतीय क्रांतिकारी, दार्शनिक, कम्युनिस्ट कार्यकर्ता और राजनीतिक विचारक बने। एम. एन. रॉय मेक्सिकन कम्युनिस्ट पार्टी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक थे। वे कम्युनिस्ट इंटरनेशनल कांग्रेस में प्रतिनिधि थे और चीन में रूस के सहायक भी रहे। यहां पेश हैं एम. एन. रॉय के कुछ उद्धरण
आम लोगों की अपनी सोच-समझ से काम करने की क्षमता पर अविश्वास… सत्ता हथियाने का महज एक बहाना है।
हमारा उद्देश्य उत्पादक वर्गों की आर्थिक स्वतंत्रता है, यह अंतिम लक्ष्य एक लंबे और कड़े संघर्ष के बाद प्राप्त होगा, इसलिए, हमारा प्राथमिक कार्य जनता को संगठित करना और आर्थिक स्वतंत्रता के संघर्ष में उनका नेतृत्व करना है।
मनुष्य मूलतः एक विवेकशील प्राणी है। उसकी मूल इच्छा विश्वास करना नहीं, बल्कि सवाल उठाना और जानना है। आजादी की चाह और सच की खोज ही मानवीय प्रगति की मूल प्रेरणा है। एम. एन. रॉय
एक अच्छा समाज केवल अच्छे लोगों द्वारा ही बनाया जा सकता है।
आजादी की चाह और सच की खोज ही मानवीय प्रगति की मूल प्रेरणा है।
क्रांतिकारी वह है जिसके मन में यह विचार आ गया हो कि दुनिया को फिर से बनाया जा सकता है… कि इसे किसी अलौकिक शक्ति ने नहीं बनाया है, और इसलिए इसे मानवीय प्रयासों से फिर से बनाया जा सकता है।
पार्टी व्यवस्था लोगों में सबसे बुरी चीजें सामने लाएगी, और राजनीतिक दलों के नेता लोगों में घोर पिछड़ापन पैदा करेंगे।
लोकतंत्र की नींव व्यक्ति की संप्रभुता और स्वतंत्रता थी।
राज्य समाज का राजनीतिक संगठन है।
योजना यह थी कि सुमात्रा के उत्तरी छोर पर स्थित एक बंदरगाह में रोके गए जर्मन जहाजों का इस्तेमाल करके अंडमान द्वीपों पर धावा बोला जाए, वहाँ के कैदियों को आजाद करके उन्हें हथियार दिए जाएँ, और मुक्ति सेना को उड़ीसा के तट पर उतारा जाए। ये जहाज बख्तरबंद थेकृजैसा कि कई बड़े जर्मन जहाज होते थेकृऔर युद्ध के समय इस्तेमाल के लिए पूरी तरह तैयार थे। उन सभी जहाजों पर कई-कई तोपें भी लगी हुई थीं। जहाजों का चालक दल नौसेना के सैनिकों (तंजपदहे) से बना था। उन्हें नजरबंदी शिविर से भाग निकलना था, जहाजों पर कब्जा करना था, और उन्हें लेकर रवाना हो जाना था… चीनी तस्करों के जरिए सैकड़ों राइफलें और अन्य छोटे हथियार, साथ ही उनके लिए पर्याप्त गोला-बारूद हासिल किया जा सकता था, जो इन हथियारों को जहाजों पर पहुँचा देते।
दबे-कुचले लोग और शोषित वर्ग सत्ताधारी शक्ति के नैतिक दर्शन का सम्मान करने के लिए बाध्य नहीं हैं… एक निरंकुश सत्ता को हमेशा बलपूर्वक ही उखाड़ फेंका जाता है। इस प्रक्रिया में इस्तेमाल किया गया बल कोई अपराध नहीं है। इसके विपरीत, भारत में ब्रिटिश सरकार की सेना के पास जो बंदूकें हैं, असल में वही अपराध के औजार हैं। जब ये बंदूकें साम्राज्यवादी सत्ता के खिलाफ उठती हैं, तो वे ही नेकी और न्याय के औजार बन जाती हैं।