
18 मार्च 1898 को शिकागो, इलिनोइस में जानी मानी अमेरिकन लेखिका और कार्यकत्री मटिल्डा जोसलिन गेज (जन्म 24 मार्च 1826, सिसरो, न्यूयॉर्क) का निधन हुआ। मटिल्डा जोसलिन गेज को मुख्य रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका में महिलाओं के मताधिकार के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए जाना जाता है, उन्होंने मूल अमेरिकी अधिकारों, दास प्रथा उन्मूलन और स्वतंत्र चिंतन के लिए भी अभियान चलाया। पेश हैं, मटिल्डा जोसलिन गेज के कुछ उद्धरण
माँ, घर या स्वर्ग, इन सबसे भी प्यारा एक शब्द है। वह शब्द है स्वतंत्रता।
आज की महिलाएं अपनी माताओं और दादी-नानी के विचारों का ही साकार और जीवंत रूप हैं। वे सक्रिय, सक्षम, दृढ़ निश्चयी हैं और उनकी जीत निश्चित है। उनके पीछे एक हजार पीढ़ियों का इतिहास है… लाखों महिलाएं, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं, आज हमारे माध्यम से बोल रही हैं।
जब पूरी मानवता, मानवता के लिए काम करेगी, जब पुरुषों और महिलाओं के जीवन के कार्य-व्यापार, उन सभी मामलों में एक संयुक्त साझेदारी बन जाएंगे जो दोनों से संबंधित हैं, जब लिंग, जाति, रंग या पिछली सामाजिक स्थिति, इनमें से कोई भी मानवीय क्षमताओं के उपयोग में बाधा नहीं बनेगा, तब दुनिया के हाथों में एक ऐसे स्वर्णिम युग का वादा होगा, जो स्वयं अपनी पूर्णता को प्राप्त करेगा।
महिला अब स्वयं यह सीख रही है कि जीवन में उसका पहला कर्तव्य आत्म-बलिदान नहीं, बल्कि अपना स्वयं का विकास करना है, और यह विकास मुख्य रूप से दूसरों की खातिर नहीं, बल्कि इसलिए होना चाहिए ताकि वह पूरी तरह से स्वयं बन सके।
कभी-कभी एक जीवित महिला होने की तुलना में एक मृत पुरुष होना बेहतर होता है।
संगठित लूट की अब तक ज्ञात सबसे विशाल प्रणाली वह रही है, जो चर्च ने महिलाओं के साथ अपनाई है, एक ऐसी लूट जिसने न केवल उनका आत्म-सम्मान छीन लिया, बल्कि उनके व्यक्तिगत अधिकारों, उनकी अपनी मेहनत के फलों, शिक्षा के अवसरों, और उनके स्वयं के विवेक, अंतरात्मा तथा इच्छाशक्ति के उपयोग के अधिकार को भी छीन लिया है।
चर्च या राज्य को अपने विचारों पर शासन करने या अपने निर्णयों को निर्देशित करने की अनुमति न दें।
हालांकि महिलाओं की बौद्धिक क्षमता को पुरुषों से कमतर बताने वाली बातें बहुत कही जाती हैं, फिर भी यह एक विचित्र विरोधाभास है कि अनेक अत्यंत प्रतिष्ठित पुरुष अपने जीवन में जिस मुकाम पर पहुंचे हैं, उसका श्रेय वे अपनी माताओं को ही देते हैं।
इतिहास का गहन अध्ययन करने वाला कोई भी विद्यार्थी यह पाएगा कि सभ्यता के विकास में ईसाई धर्म का योगदान बहुत ही नगण्य रहा है, इसके विपरीत, उसने सभ्यता की प्रगति को अवरुद्ध करने में ही कहीं अधिक भूमिका निभाई है।
महिलाओं को स्वतंत्रता के उस सबसे कुटिल और बेईमान शत्रु, अर्थात चर्च, की शिक्षाओं और उद्देश्यों का विरोध करने वाले एक साझा मंच पर एकजुट होना चाहिए।
चर्च और राज्य, दोनों ही स्वयं को दैवीय मूल का होने का दावा करते हैं, और इसी आधार पर उन्होंने महिलाओं के ऊपर पुरुषों के दैवीय अधिकार को मान्यता दे दी है, जहां एक ओर चर्च और राज्य ने पुरुषों के लिए सोचने का दायित्व संभाला है, वहीं दूसरी ओर पुरुषों ने महिलाओं के लिए सोचने का अधिकार स्वयं अपने हाथों में ले लिया है। आत्मा को अपनी सर्वोच्चता को बनाए रखना होगा, वरना वह नष्ट हो जाएगी।
ऑगस्टीन के समय से लेकर अब तक, धर्मशास्त्रियों ने लोगों को धर्मग्रंथों की अपनी विशेष व्याख्या स्वीकार करने के लिए मजबूर करने की कोशिश की है। इसके लिए उन्होंने इनक्विजिशन (धार्मिक अदालतों) की यातनाओं, रैक (शरीर खींचने वाली मशीन), अंगूठा कसने वाले पेंच, दांव पर बांधकर जलाने, जादू-टोना के नाम पर उत्पीड़न, बोस्टन की सड़कों पर नग्न महिलाओं को कोड़े मारने, देश निकाला, धर्म-विरोध के मुकदमों, गैरीसन के गले में फंदा डालने, लवजॉय की हत्या, कैप्टन वॉकर को दागने, और काफिर व नास्तिक कहकर चिल्लाने जैसे हर हथकंडे का इस्तेमाल किया है।
बाइबल की पवित्रता को लेकर ईसाई धर्म का जो सिद्धांत है, उसकी कीमत दुनिया की सभ्यता को चुकानी पड़ी है।
महिलाओं के संपत्ति और शिक्षा के अधिकारों में जो प्रगति हुई है, वह पादरियों के कड़े विरोध के बावजूद ही संभव हो पाई है। महिलाओं का दास-प्रथा विरोधी काम, नशा-मुक्ति के लिए उनका काम, उनके व्यक्तिगत अधिकारों, राजनीतिक समानता, धार्मिक स्वतंत्रता की मांग, और इसी तरह के हर कदम का चर्च (एक संस्था के तौर पर) और पादरियों (चर्च के विचारों के प्रतिनिधियों के तौर पर) द्वारा पुरजोर विरोध किया गया है।
इतिहास ऐसी गलतियों से भरा पड़ा है, जो पतियों ने कानूनी लूट-खसोट के जरिए अपनी पत्नियों के साथ की हैं। मैं यह कहने में जरा भी संकोच नहीं करती कि बच्चों की हत्या, गर्भपात और शिशु-हत्या जैसे अधिकांश अपराधों की जिम्मेदारी पुरुषों पर ही आती है।
मार्चेटा या मार्क्वेट नामक कानून के तहत, नई शादीशुदा महिलाओं को एक अत्यंत अपमानजनक गुलामी करने के लिए मजबूर किया जाता था। शादी के बाद एक से तीन दिनों तक उन्हें सामंती प्रभु (थ्मनकंस स्वतक) की जायज संपत्ति माना जाता थाय इसी प्रथा के चलते, किसी भी किसान (ेमत)ि का सबसे बड़ा बेटा उस प्रभु का ही बेटा माना जाता था… मार्क्वेट पर धार्मिक प्रभु और सांसारिक प्रभु दोनों ही अपना अधिकार जताते थे। सच तो यह है कि इस घिनौनी सामंती मांग का सबसे बड़ा रक्षक स्वयं चर्च ही था।
जब कोई पुरुष मुझसे यह शंका जाहिर करता है कि अगर मुझे या किसी अन्य महिला को वोट देने का अधिकार मिल जाए, तो हम उसका किस तरह इस्तेमाल करेंगे, तो मेरा जवाब यह होता है, इससे आपको क्या लेना-देना? अगर आपने वर्षों तक मेरे जायज उत्तराधिकार से मुझे वंचित रखा है, और अब, चाहे किसी राजनीतिक दांव-पेच के तहत, या फिर अपनी किसी नई अंतरात्मा की आवाज सुनकर, आपने मुझे मेरी अपनी संपत्ति लौटाने का फैसला किया है, तो क्या अब मुझे आपसे यह पूछना पड़ेगा कि मैं उस संपत्ति में फूलों का बगीचा लगाऊं, गेहूं का खेत बनाऊं, या फिर गायों के चरने के लिए चरागाह बनाऊं?
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