
फूलों को तो तोड़ लो, पर कलियों को बख्श दो, विख्यात अंग्रेजी कवि, व्यंग्यकार, राजनीतिज्ञ एंड्रयू मार्वेल के उद्धरण
31 मार्च 1621 को विनेस्टेड, यूनाइटेड किंगडम में एंड्रयू मार्वेल का जन्म हुआ। एंड्रयू मार्वेल विख्यात अंग्रेजी कवि, व्यंग्यकार, राजनीतिज्ञ, हाउस ऑफ कॉमन्स के सदस्य और चर्चित अंग्रेजी कवि जॉन मिल्टन के सहयोगी और मित्र बने। यहां प्रस्तुत हैं एंड्रयू मार्वेल की एक कविता का एक अंश और उनके कुछ उद्धरण
काश हमारे पास दुनिया और समय की कोई कमी न होती,
तो ऐ प्रियतमे, तुम्हारी यह नजाकत कोई गुनाह न होती।
हम आराम से बैठते, और सोचते कि किस राह पर चलें,
और अपने प्रेम के लंबे दिनों को कैसे बिताएँ।
परंतु मुझे हमेशा अपने पीछे, समय का पंख लगा रथ तेजी से आता सुनाई देता है।
कला का मार्ग बेशक लंबा है, पर जीवन बहुत छोटा है।
फूलों को तो तोड़ लो, पर कलियों को बख्श दो।
आत्म-रक्षा ही प्रकृति का सबसे पहला और महान नियम है, इंसान को छोड़कर, सभी जीव इसका पालन करते हैं।
इस दुनिया में असल में बस दो ही तरह के लोग होते हैं, अच्छे और बुरे, और ये दोनों ही हर जगह आपस में घुले-मिले रहते हैं।
मेरा अपना एक बगीचा है, पर वह गुलाबों और लिली के फूलों से इतना भर गया है, कि तुम्हें देखकर ऐसा लगेगा मानो वह कोई छोटा-सा जंगली इलाका हो।
चलो, हम अपनी सारी ताकत और अपनी सारी मधुरता को एक साथ समेटकर एक कर लें, और अपने सुखों को जीवन के इन लोहे के दरवाजों से, जोरदार संघर्ष के साथ छीनकर बाहर निकाल लें। इस तरह, भले ही हम अपने सूरज को एक जगह रोक न पाएँ, पर हम उसे अपनी मर्जी से दौड़ा जरूर सकते हैं।
जैसे तिरछी रेखाएँ किसी भी कोण पर आपस में मिल सकती हैं,
वैसे ही हमारा प्रेम, जो दो समानांतर रेखाओं की तरह है, भले ही अनंत हो, पर कभी आपस में मिल नहीं सकता।
मेरा यह प्रेम, किसी भी साम्राज्य से कहीं ज्यादा विशाल और कहीं ज्यादा धीमी गति से बढ़ना चाहिए।
एक इंसान बस उतना ही कर सकता है, जो काम करने के साथ-साथ उसके बारे में ज्ञान भी रखता हो।
इस बीच, मन बाहरी सुखों से विमुख होकर, अपनी ही आंतरिक खुशी में डूब जाता है,
मन, वह विशाल सागर, जहाँ हर तरह की चीज को अपना ही प्रतिबिंब दिखाई देता है,
फिर भी, वह इन सबसे परे जाकर, बिल्कुल ही अलग दुनिया और अलग सागरों की रचना कर लेता है,
वह बनी हुई हर चीज को मिटाकर, किसी हरे-भरे उपवन में एक हरे विचार का रूप दे देता है…
कितनी सुखद थी मन की वह बगीचे जैसी अवस्था! -एंड्रयू मार्वेल
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