10 अप्रैल 1941 को मेडफोर्ड, मैसाचुसेट्स पॉल एडवर्ड थेरॉक्स का जन्म हुआ। पॉल थेरॉक्स अमेरिकी उपन्यासकार और यात्रा लेखक हैं, जिन्होंने कई किताबें लिखी हैं, जिनमें यात्रा वृत्तांत द ग्रेट रेलवे बाजार काफी चर्चित रही। उनके कुछ उपन्यासों पर फीचर फिल्में भी बनी हैं। पॉल थेरॉक्स के कुछ विचारणीय उद्धरण
मैं अपने दिनों को लंबा तो नहीं कर सकता, इसलिए मैं उन्हें बेहतर बनाने की कोशिश करता हूँ।
मुझे लगता है कि यात्रा करने की इच्छा इंसान की एक स्वाभाविक विशेषता है, आगे बढ़ने की चाहत, अपनी जिज्ञासा शांत करने या अपने डर को कम करने की इच्छा, अपनी जिंदगी के हालात बदलने की इच्छा, अजनबी बनने की इच्छा, दोस्त बनाने की इच्छा, किसी अनोखी जगह का अनुभव करने की इच्छा, और अनजान चीजों का जोखिम उठाने की इच्छा।
द्वीपों की यात्रा के प्रति मेरा प्रेम एक ऐसी मानसिक स्थिति का रूप ले चुका है जिसे नेसोमेनिया कहते हैं, यानी द्वीपों के प्रति एक जुनून। मुझे यह जुनून काफी हद तक सही लगता है, क्योंकि द्वीप अपने आप में छोटे-छोटे संपूर्ण संसार होते हैं, जो हमें बड़े संसारों को समझने में मदद करते हैं।
आप लंबे समय के लिए कहीं दूर चले जाते हैं और जब लौटते हैं, तो एक बदले हुए इंसान होते हैं, आप कभी भी पूरी तरह से वही इंसान बनकर वापस नहीं आते।
यात्रा का सबसे बड़ा इनाम तब मिलता है, जब वह सिर्फ किसी मंजिल तक पहुँचने का जरिया न रहकर, आपकी जिंदगी जीने के तरीके का ही एक अभिन्न हिस्सा बन जाती है।
सभ्य व्यवहार की असली पहचान है, करुणा।
पर्यटकों को यह पता नहीं होता कि वे कहाँ-कहाँ घूम चुके हैं, जबकि यात्रियों को यह पता नहीं होता कि वे कहाँ जा रहे हैं।
पढ़ने से आपको आजादी मिलती है। आप पढ़ने के जरिए पूरी दुनिया के बारे में जान सकते हैं।
यात्रा के दौरान कभी-कभार कुछ ऐसा अप्रत्याशित घट जाता है, जो पूरी यात्रा का स्वरूप ही बदल देता है और यात्री के जहन में हमेशा के लिए बस जाता है।
भले ही मैं आपके साथ यात्रा कर रहा होऊँ, लेकिन आपकी यात्रा आपकी ही रहेगी, वह मेरी यात्रा नहीं कहलाएगी।
यात्रा करने का सबसे बड़ा औचित्य स्वयं को बेहतर बनाना नहीं, बल्कि एक तरह से गायब हो जाने का खेल खेलना है, यानी बिना कोई निशान छोड़े कहीं ओझल हो जाना।
मेरा मानना है कि प्यार वह चीज बिल्कुल नहीं है, जैसा कि आप अपनी बीस या तीस साल की उम्र में उसके बारे में सोचते हैं।
यात्रा दरअसल एक मानसिक अवस्था है। इसका आपके भौतिक अस्तित्व या किसी अनोखी जगह से कोई लेना-देना नहीं होता। यह तो लगभग हमेशा एक आंतरिक अनुभव ही होता है।
अगर आप जल्दबाजी में न हों, तो हर काम को करने का कोई न कोई रास्ता जरूर निकल आता है।
मेरा अनुभव यह कहता है कि अगर आप जल्दबाजी में न हों, तो आप लगभग कुछ भी कर सकते हैं और लगभग कहीं भी जा सकते हैं।
लोग बीमार पड़ने के बारे में लिखते हैं, वे पेट की गड़बड़ी के बारे में लिखते हैं, वे बस का इंतजार करने के बारे में लिखते हैं। वे बस इंतजार करने के बारे में ही लिखते रहते हैं। वे तो इस बात पर भी तीन-तीन पन्ने लिख डालते हैं कि उन्हें वीजा मिलने में कितना ज्यादा समय लग गया। मुझे बोरिंग चीजों में कोई दिलचस्पी नहीं है। हर किसी को पेट की तकलीफ होती है। हर किसी को लाइन में इंतजार करना पड़ता है। मैं इसके बारे में सुनना नहीं चाहता।
सफर एक नजरिया है, मन की एक अवस्था है। यह रहना नहीं, बल्कि चलते रहना है।
सिद्धांतों पर चलना अक्सर महँगा और अकेलापन भरा होता है।
जब आप अकेले होते हैं, तभी आपको एहसास होता है कि आप कहाँ हैं। आपके पास अपने खुद के साधनों के अलावा किसी और का सहारा नहीं होता।
सफर सिर्फ गुजरे हुए समय में ही ग्लैमरस लगता है।
हर किसी की अपनी राय थी, लेकिन किसी के पास कोई हल नहीं था।
घर हमेशा एक ऐसा विषय होता है जिसे समझना नामुमकिन होता है, यह कई परतों वाला और दिमाग घुमा देने वाला होता है।
अगर आप थोड़े-बहुत भरोसे के लायक न होने की बदनामी कमा लें, तो आपसे कभी कोई काम करने के लिए नहीं कहा जाएगा।
ज्यादातर सफर, और खास तौर पर वो सफर जो सचमुच यादगार होते हैं, अजनबियों की मेहरबानी पर निर्भर होते हैं इनमें आप खुद को ऐसे लोगों के हाथों में सौंप देते हैं जिन्हें आप जानते भी नहीं, और अपनी जान भी उनके भरोसे छोड़ देते हैं।
आप जितना ज्यादा लिखते हैं, आप उतना ही ज्यादा लिखने में माहिर होते जाते हैं। -पॉल थेरॉक्स
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