16 अप्रैल 1844 को पेरिस, फ्रांस में अनातोले फ्रांस (फ्रांसीसी नाम, फ्रांस्वा-अनातोले थिबो) एक फ्रांसीसी कवि, पत्रकार और उपन्यासकार बने। अनातोले फ्रांस की कई रचनाएँ बेस्ट-सेलर रहीं। व्यंग्यपूर्ण और संशयवादी स्वभाव के अनातोले फ्रांस को अपने समय आदर्श साहित्यकार माना गया। उन्हें 1921 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला। यह पुरस्कार उन्हें उनकी शानदार साहित्यिक उपलब्धियों की पहचान के तौर पर दिया गया, जिनकी खासियत है, शैली की गरिमा, गहरी मानवीय सहानुभूति, लालित्य और एक सच्चा फ्रांसीसी स्वभाव है। यह भी माना जाता है कि मार्सेल प्राउस्ट (फ्रांसीसी उपन्यासकार और साहित्य आलोचक) के उपन्यास इन सर्च ऑफ लोस्ट टाइम (खोए हुए समय की तलाश में) में कथावाचक मार्सेल के साहित्यिक आदर्श बर्गोट का मॉडल यही व्यक्ति यानी अनातोले फ्रांस थे। प्रस्तुत हैं, अनातोले फ्रांस के कुछ तीखे, चुटीले, मनोरंजक, विचारणीय, अनुकरणीय उद्धरण,
कभी किसी को किताबें उधार न दें, क्योंकि कोई उन्हें वापस नहीं करता, मेरी लाइब्रेरी में जितनी भी किताबें हैं, वे सब वही हैं जो दूसरों ने मुझे उधार दी थीं।
सभी बदलावों में, यहाँ तक कि उन बदलावों में भी जिनकी हम सबसे ज्यादा चाहत रखते हैं, एक उदासी छिपी होती हैय क्योंकि जो कुछ हम पीछे छोड़ जाते हैं, वह हमारा ही एक हिस्सा होता है, एक नए जीवन में प्रवेश करने से पहले हमें अपने पुराने जीवन को पीछे छोड़ना पड़ता है।
महान कार्य करने के लिए, हमें न केवल काम करना चाहिए, बल्कि सपने भी देखने चाहिए, न केवल योजना बनानी चाहिए, बल्कि विश्वास भी रखना चाहिए।
हमने कभी शैतान की तरफ की कहानी नहीं सुनी, क्योंकि सारी किताब तो भगवान ने ही लिखी है।
जानना कुछ भी नहीं है, कल्पना करना ही सब कुछ है।
कानून, अपनी गरिमामयी समानता में, अमीर और गरीब दोनों को ही पुलों के नीचे सोने, सड़कों पर भीख मांगने और अपनी रोटी चुराने से रोकता है।
अगर रास्ता सुंदर हो, तो हमें यह नहीं पूछना चाहिए कि वह कहाँ ले जाता है।
अगर हम बदलते नहीं हैं, तो हम आगे नहीं बढ़ते। अगर हम आगे नहीं बढ़ते, तो हम असल में जी नहीं रहे होते।
कला की तरह ही, प्यार में भी, सहज-ज्ञान ही काफी होता है।
अगर पचास मिलियन लोग कोई बेवकूफी भरी बात कहते हैं, तो भी वह बात बेवकूफी भरी ही रहती है।
यह पक्का यकीन कि उनके पास ही सच है, इंसानों को क्रूर बना देता है।
पढ़ाने की पूरी कला बस इतनी है कि मन की स्वाभाविक जिज्ञासा को जगाया जाए, ताकि बाद में उसे शांत किया जा सके।
बेवकूफी, बुराई से कहीं ज्यादा खतरनाक होती हैय क्योंकि बुराई तो कभी-कभी रुक जाती है, लेकिन बेवकूफी कभी नहीं रुकती।
शिक्षा का मतलब यह नहीं है कि आपने कितना रट लिया है, या आप कितना जानते हैं। इसका मतलब है कि आप यह फर्क कर सकें कि आप क्या जानते हैं और क्या नहीं जानते।
सभी तरह के यौन विकारों में, ब्रह्मचर्य सबसे अजीब है।
समझदारी से सोचना और बेवकूफी भरा काम करना, यही इंसान का स्वभाव है, फैशन।
समय सिर्फ उन्हीं लोगों के साथ नरमी से पेश आता है, जो उसके साथ नरमी से पेश आते हैं।
जब कोई बात कही जा चुकी हो और अच्छी तरह कही गई हो, तो उसे अपनाने में कोई हिचकिचाहट न रखें। उसे अपनाएँ और उसकी नकल करें।
आम इंसान, जिसे यह नहीं पता कि अपनी जिंदगी के साथ क्या करना है, वह एक और जिंदगी चाहता है जो हमेशा के लिए रहे।
घूमना-फिरना उस मूल तालमेल को फिर से स्थापित करता है, जो कभी इंसान और ब्रह्मांड के बीच मौजूद था।
मैं समझदारी की उदासीनता के बजाय उत्साह की गलतियों को ज्यादा पसंद करता हूँ।
कोई भी इंसान तब तक पूरी तरह खुश नहीं हो सकता, जब तक वह किसी न किसी बात से अनजान न हो।
शिक्षा का नब्बे प्रतिशत हिस्सा प्रोत्साहन ही होता है।
लोगों की जिज्ञासा जगाएँ। मन को खोलने के लिए इतना ही काफी है, उन पर ज्यादा बोझ न डालें। बस वहाँ एक चिंगारी भर रख दें।
इंसान की बनावट ही ऐसी है कि उसे एक तरह के काम से आराम तभी मिलता है, जब वह कोई दूसरा काम शुरू कर देता है।
जिन किताबों की तारीफ हर कोई करता है, उन्हें पढ़ता कोई नहीं है।
हम सपनों के पीछे भागते हैं और परछाइयों को गले लगाते हैं।
अचरज की बात यह नहीं है कि तारों का संसार इतना विशाल है, बल्कि यह है कि इंसान ने उसे नाप लिया है।
अपनी शानदार समानता में, कानून अमीर और गरीब, दोनों को ही पुलों के नीचे सोने, सड़कों पर भीख मांगने और रोटी चुराने से रोकता है।
मूर्खता बुराई से कहीं अधिक खतरनाक है, क्योंकि बुराई तो कभी-कभी विराम ले लेती है, पर मूर्खता कभी नहीं।
यदि पचास लाख लोग कोई मूर्खतापूर्ण बात कहें, तो भी वह बात मूर्खतापूर्ण ही रहती है।
बहुत सारी बातें सिखाकर अपनी शेखी (अहंकार) को संतुष्ट करने की कोशिश न करें। लोगों की जिज्ञासा जगाएँ। मन के द्वार खोल देना ही काफी है, उन पर ज्ञान का बोझ न डालें। वहाँ बस एक चिंगारी रख दें। यदि वहाँ कोई ज्वलनशील पदार्थ मौजूद होगा, तो वह आग पकड़ ही लेगा।
मनुष्य एक विवेकशील प्राणी है। वह जिस भी बात पर विश्वास करना चाहता है, उसके लिए कोई न कोई तर्क गढ़ ही लेता है।
जब तक कोई किसी जानवर से प्यार नहीं करता, उसकी आत्मा का एक हिस्सा अधूरा ही रहता है। -अनातोले फ्रांस