एजरा वेस्टन लूमिस पाउंड (जन्म 30 अक्टूबर 1885, हेली, इडाहो, मृत्यु 1 नवंबर 1972 वेनिस, इटली) बेहद विवादित अमेरिकी कवि और आलोचक, एडोल्फ हिटलर और बेनीटो मुसालिनी साथ ही फासीवाद के समर्थक थे। एजरा पाउंड शुरुआती आधुनिकतावादी कविता आंदोलन के एक प्रमुख व्यक्ति थे, और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान फासीवादी इटली और सालो गणराज्य में सहयोगी बन गए। उनकी उल्लेखनीय रचनाओं में रिपोस्ट्स, ह्यूग सेल्विन मौबरली और द कैंटोस शामिल हैं। अमेरिका में 27 नवंबर 1945 को उन पर देशद्रोह के आरोपों में मुकदमा चलाया गया, और 4 दिसंबर को उन्हें गैलिंगर अस्पताल के मनोरोग वार्ड में एक बंद कमरे में कैद कर दिया गया। अदालत द्वारा नियुक्त सेंट एलिजाबेथ अस्पताल के अधीक्षक विनफ्रेड ओवरहोल्सर तीन मनोचिकित्सकों ने यह फैसला किया कि वे मुकदमे का सामना करने के लिए मानसिक रूप से अयोग्य हैं। उन्होंने एजरा पाउंड को असामान्य रूप से आत्म-महत्व की भावना से ग्रस्त, तौर-तरीकों में अति-उत्साही और उमंगपूर्ण तथा बोलने में अत्यधिक दबाव, बातों में भटकाव और ध्यान भटकने की प्रवृत्ति प्रदर्शित करने वालाष् पाया। पाउंड के वकील द्वारा नियुक्त चौथे मनोचिकित्सक ने शुरू में यह सोचा कि वे एक साइकोपैथ हैं, जिसके कारण वे मुकदमे का सामना करने के लिए अयोग्य हो जाते हैं। 1955 में 18 अप्रैल को 12 वर्ष तक अस्पताल में कैद रहने के बाद एजरा पाउंड रिहा हुए।
दिसंबर 1932 में इतालवी फासीवाद पर आधारित एक फिल्म की पटकथा पर काम करने के लिए नियुक्त किए जाने के बाद, पाउंड ने बेनिटो मुसोलिनी से मिलने का अनुरोध किया। ओल्गा रडगे ने 19 फरवरी 1927 को मुसोलिनी के लिए निजी तौर पर प्रस्तुति दी थी, लेकिन इस बार एजरा पाउंड को मुसोलिनी से मिलने का अवसर दिया गया, एजरा पाउंड 30 जनवरी 1933 को रोम के पलाजो वेनेजिया में मिले, यह वही दिन था जब एडॉल्फ हिटलर को जर्मनी का चांसलर नियुक्त किया गया था। एजरा पाउंड ने कहा, हिटलर और मुसोलिनी देहात के रहने वाले सीधे-सादे लोग थे। मेरा मानना है कि हिटलर एक संत था, और वह अपने लिए कुछ भी नहीं चाहता था। मुझे लगता है कि उसे यहूदी-विरोध के जाल में फंसाया गया था, और इसी ने उसे बर्बाद कर दिया। यही उसकी गलती थी। जब आप वह गड़बड़ देखेंगे जो मुसोलिनी को रास्ते से हटाने के बाद इटली में पैदा हुई, तो आप समझ जाएँगे कि कोई व्यक्ति उसके कुछ प्रयासों में विश्वास क्यों कर सकता था।
मैं यहूदी-विरोधी नहीं हूँ, और मैं यहूदी सूदखोर तथा उस यहूदी के बीच अंतर करता हूँ जो अपनी आजीविका के लिए ईमानदारी से दिन भर काम करता है।
पुराने जमाने में युद्ध गुलाम बनाने के लिए किए जाते थे। गुलामी थोपने का आधुनिक हथियार कर्ज है।
बदनामी फैलाने की तकनीक यह है कि एक साथ दो झूठ फैलाए जाएँ, और लोगों को इस बात पर गरमागरम बहस में उलझा दिया जाए कि इनमें से सच कौन सा है।
यदि कोई व्यक्ति अपने विचारों के लिए थोड़ा भी जोखिम उठाने को तैयार नहीं है, तो या तो उसके विचार ही बेकार हैं, या फिर वह व्यक्ति ही किसी काम का नहीं है।
यूरोप में आजकल लोकतंत्र की परिभाषा यह दी जाती है कि यह एक ऐसा देश है जिसका शासन यहूदियों के हाथों में है।
गुलाम वह है जो किसी के आने और उसे आजाद कराने का इंतजार करता रहता है।
प्रतिभा… वह क्षमता है जिसके द्वारा एक साधारण व्यक्ति जहाँ केवल एक चीज देख पाता है, वहीं प्रतिभाशाली व्यक्ति दस चीजें देख लेता है।
अमेरिका एक पागलखाना है।
मैंने कभी किसी ऐसे व्यक्ति को काबिल नहीं माना, जो थोड़ा चिड़चिड़ा स्वभाव का न हो।
युद्ध (आधुनिक युद्ध) की असली समस्या यह है कि यह किसी को भी सही लोगों को मारने का मौका नहीं देता। ब्याजखोरी दुनिया का कैंसर है, जिसे केवल फासीवाद की सर्जन वाली छुरी ही राष्ट्रों के जीवन से काटकर निकाल सकती है।
कलाकार का काम मानवता को खुद से अवगत कराना है।
सच्ची शिक्षा अंततः केवल उन लोगों तक ही सीमित होनी चाहिए जो जानने की जिद करते हैं बाकी सब तो बस भेड़ों को हांकने जैसा है।
यह मायने नहीं रखता कि कोई व्यक्ति क्या विचार रखता है, बल्कि यह मायने रखता है कि वह उस विचार को कितनी गहराई से धारण करता है।
एडॉल्फ हिटलर एक जीन डी आर्क थे, एक संत थे। वे एक शहीद थे। कई शहीदों की तरह, उनके विचार भी अत्यंत उग्र थे।
हर बड़ा बदलाव सरल होता है।
अचेतन दमन के विरुद्ध बोलो, कल्पनाहीन लोगों के अत्याचार के विरुद्ध बोलो, बंधनों के विरुद्ध बोलो।
जब तक तुम्हें यह पता न चल जाए कि किसने किसे क्या उधार दिया है, तब तक तुम राजनीति के बारे में कुछ भी नहीं जानते, तुम इतिहास के बारे में कुछ भी नहीं जानते, तुम अंतरराष्ट्रीय झगड़ों के बारे में कुछ भी नहीं जानते।
युद्ध कर्ज पैदा करने के लिए लड़े जाते हैं।
क्या, कैसे से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।
मेरा मानना है कि किसी पागल की परिभाषा वह व्यक्ति है जो पागलों से घिरा हुआ हो।
मंदिर इसलिए पवित्र है, क्योंकि वह बिकाऊ नहीं है।
यदि किसी राष्ट्र का साहित्य पतन की ओर अग्रसर होता है, तो वह राष्ट्र भी क्षीण होकर नष्ट हो जाता है।
हमारे समय का अभिशाप मौद्रिक निरक्षरता है, ठीक वैसे ही, जैसे पिछली सदियों में साधारण छपी हुई सामग्री को पढ़ पाने में असमर्थता एक अभिशाप थी।
कविता भाषा का वह रूप है जिसे छांट-बीनकर उसके मूल तत्वों तक सीमित कर दिया गया हो।
अपनी इच्छाओं के मामले में कभी भी ओछे या साधारण दर्जे के मत बनो। -एजरा पाउंड
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