
वाशिंगटन। कतर के मीडिया हाउस अल जज़ीरा की खबर है कि रॉयटर्स, इप्सोस के ताजा पोल के मुताबिक, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग व्हाइट हाउस लौटने के बाद से अपने सबसे निचले स्तर पर आ गई है। आर्थिक अनिश्चितता और ईरान के साथ अमेरिका-इजरायल युद्ध के बीच यह रेटिंग गिरकर 34 प्रतिशत पर पहुंच गई है। मंगलवार को जारी इस पोल में यह भी सामने आया कि सिर्फ 22 प्रतिशत लोगों ने जीवन-यापन की लागत के मामले में ट्रंप के काम का समर्थन किया है। अमेरिका के वोटरों के लिए महंगाई हमेशा से ही एक अहम मुद्दा रहा है। पहले टैरिफ की मार और अब युद्ध का भार। डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका सहित पूरी दुनिया के लिए विनाशकारी साबित हो रहे हैं।
ईरान युद्ध की वजह से तेहरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य से होने वाली ज्यादातर शिपिंग रोक रखी है जिससे दुनिया भर में एनर्जी की कीमतें आसमान छूने लगीं और अमेरिका में भी महंगाई बढ़ गई। रॉयटर्स का यह पोल 24-27 अप्रैल के बीच किया गया था, जिसमें अमेरिका के 1,014 वयस्कों का सर्वे किया गया। यह पोल नवंबर में होने वाले मिडटर्म चुनावों से कुछ महीने पहले आया है। इन चुनावों में ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स पर अपना कंट्रोल बनाए रखने की कोशिश करते हुए, राष्ट्रपति की बेहद खराब अप्रूवल रेटिंग का सामना करना पड़ेगा।
ईरान पर लादा गया यह युद्ध अमेरिका के वोटरों के बीच खासा अलोकप्रिय हो रहा है, जिसमें रिपब्लिकन पार्टी के वोटरों का एक बड़ा तबका भी शामिल है। पिछले हफ्ते जारी मार्क्वेट लॉ स्कूल के एक सर्वे में बताया गया कि सिर्फ 32 प्रतिशत वोटर ही युद्ध को संभालने के ट्रंप के तरीके से सहमत हैं। रिपब्लिकन वोटरों के बीच यह आंकड़ा बढ़कर 65 प्रतिशत हो गया, लेकिन फिर भी यह दिखाता है कि इस मुद्दे पर पार्टी के भीतर काफी मतभेद हैं। पिछले हफ्ते एसोसिएटेड प्रेस और एनओआरसी के एक अलग पोल में भी इसी तरह के नतीजे सामने आए, ट्रंप की कुल अप्रूवल रेटिंग 33 प्रतिशत, युद्ध के लिए समर्थन 32 प्रतिशत और अर्थव्यवस्था को संभालने का तरीका 30 प्रतिशत रहा। अमेरिका और ईरान के बीच 8 अप्रैल को दो हफ्ते के लिए सीजफायर (युद्धविराम) पर सहमति बनी थी, जिसे ट्रंप ने अनिश्चितकाल के लिए बढ़ा दिया, लेकिन इस इलाके में तनाव अभी भी बना हुआ है। ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करना और अमेरिका द्वारा ईरानी बंदरगाहों की नौसैनिक घेराबंदी करने की वजह से सीजफायर के बावजूद दुनिया भर में एनर्जी सप्लाई से जुड़ी दिक्कतें बनी हुई हैं। अमेरिका में 1 गैलन (3.8 लीटर) पेट्रोल की औसत कीमत अभी 4.17 डालर है, जो युद्ध से पहले 3 डालर से भी कम थी। फिर भी ट्रंप ने संकेत दिया है कि वे मौजूदा स्थिति से सहज हैं, और बार-बार यह दावा किया है कि ईरानी अर्थव्यवस्था ढह रही है और समय उनके पक्ष में है।
अमेरिकी राष्ट्रपति ने मंगलवार को एक सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा, ईरान ने अभी-अभी हमें बताया है कि वे श्पतन की स्थितिश् में हैं, वे चाहते हैं कि हम जल्द से जल्द होरमुज जलडमरूमध्य खोल दें, ताकि वे अपनी नेतृत्व की स्थिति को सुलझा सकें (और मुझे विश्वास है कि वे ऐसा कर पाएंगे!) ट्रंप के दावे पर सवाल उठ रहे हैं। यह स्पष्ट नहीं है कि ईरान, जो फिलहाल नौसैनिक नाकेबंदी हटाए बिना अमेरिका के साथ सीधी बातचीत करने से इनकार कर रहा है, ट्रंप को यह जानकारी कैसे या क्यों देगा कि उसकी अपनी अर्थव्यवस्था ढह रही है।
डोनाल्ड ट्रंप ने खुद के साथ-साथ अमेरिकी सरकार, संस्थाओं और जनता को बुरा फंसा दिया। इस्राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की बातों में आकर अति-उत्साहित अमेरिकी राष्ट्रपति ने युद्ध तो थोप दिया लेकिन अब उससे निकलने का रास्ता नहीं सूझ रहा। अमेरिका सहित इस जबरन, गैरकानूनी युद्ध पूरी दुनिया आर्थिक रूप से परेशान है। अमेरिकी खुफिया एजेंसियां इस समय एक बेहद संवेदनशील सवाल का जवाब तलाश रही हैं कि यदि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दो महीने से चल रहे ईरान युद्ध में एकतरफा जीत की घोषणा करते हैं, तो तेहरान का रुख क्या होगा। यह युद्ध न केवल हजारों लोगों की जान ले चुका है, बल्कि अब व्हाइट हाउस के लिए एक बड़ा राजनीतिक जोखिम बन गया है। ईरान को दुनिया भर से समर्थन मिल रहा है।
ट्रंप प्रशासन सूत्रों के अनुसार, खुफिया विष्लेषक इस विश्लेषण में जुटा है कि क्या युद्ध से अचानक पीछे हटने से ईरान और अधिक शक्तिशाली होकर उभरेगा। अधिकारियों को डर है कि युद्ध लंबा खिंचने की स्थिति में इस साल होने वाले मध्यावधि चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी को बड़ी हार का सामना करना पड़ सकता है। राष्ट्रपति ट्रंप पर इस समय युद्ध खत्म करने का जबरदस्त घरेलू दबाव है। रायटर-इप्सोस ओपिनियन पोल के आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका की अधिकांश जनता इस सैन्य अभियान के खिलाफ है। सर्वे में शामिल केवल 26 प्रतिशत लोगों ने ही इस युद्ध को सही ठहराया है। ट्रंप इस बात से भली-भांति वाकिफ हैं कि युद्ध की राजनीतिक कीमत उन्हें और उनकी पार्टी को चुकानी पड़ सकती है। खुफिया एजेंसियों का आकलन है कि यदि अमेरिका भारी सैन्य उपस्थिति के बिना जीत का दावा करता है, तो ईरान इसे अपनी सफलता के तौर पर देखेगा और भविष्य में अपने परमाणु कार्यक्रम को फिर से तेज कर सकता है।
युद्ध का सबसे बड़ा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था और आम नागरिकों की जेब पर पड़ा है। 8 अप्रैल को घोषित युद्धविराम के 20 दिन बाद भी दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण जलमार्ग स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पूरी तरह नहीं खुल सका है। अमेरिका ने होर्मुज स्ट्रेट की नाकेबंदी कर रखी है। ईरान का कहना है कि पहले अमेरिका अपनी नाकेबंदी हटाए तो वह होर्मुज स्ट्रेट को सुचारू करेगा। ईरान द्वारा जहाजों पर हमलों और समुद्री बारूद (माइन) बिछाने के कारण कच्चे तेल की आवाजाही ठप है। दुनिया के 20 प्रतिशत कच्चे तेल की सप्लाई रुकने से अमेरिका में पेट्रोल की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं। ट्रंप प्रशासन के लिए चुनौती यह है कि वह सुरक्षा से समझौता किए बिना पेट्रोल की कीमतों को कैसे कम करे।
जमीन पर स्थिति अब और जटिल होती जा रही है। खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, ईरान ने युद्धविराम के समय का उपयोग अपने उन मिसाइल लॉन्चरों और हथियारों को फिर से दुरुस्त करने में किया है जो युद्ध के शुरुआती हफ्तों में नष्ट हो गए थे। अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि अब पूर्ण स्तर का युद्ध फिर से शुरू करना सैन्य रूप से अधिक खर्चीला और जोखिम भरा होगा। कूटनीतिक स्तर पर भी गतिरोध बना हुआ है। हाल ही में ट्रंप ने अपने विशेष दूतों की पाकिस्तान में ईरानी अधिकारियों से होने वाली मुलाकात को यह कहकर रद्द कर दिया कि इसमें बहुत समय लग रहा है। व्हाइट हाउस का स्पष्ट कहना है कि ट्रंप केवल उसी समझौते को स्वीकार करेंगे जो अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में हो।
यहां सवाल यह है कि पिछले साल जून में भी अमेरिका ने ईरान पर हमला करके बहुत कुछ तबाह करने का दावा किया था। इस साल 28 फरवरी को अमेरिका-इस्राइल ने बातचीत के बीच भीषण हमला कर दिया। लगातार हमले कर स्कूल इत्यादि लगभग हर चीज को निशाना बनाया गया। सुप्रीम लीडर अली खामनेई सहित तमाम बड़े अधिकारियों की हत्या कर दी। ट्रंप ने एक के बाद एक दावे किए कि ईरान पूरी तरह बर्बाद किया जा चुका है, हम जीत चुके हैं। ईरान के पास कुछ नहीं बचा। लेकिन ईरान ने जो जवाबी कार्रवाई की उससे पड़ोसी खाड़ी देश और इस्राइल तक में भारी तबाही मची। हारकर कई बार अमेरिका को संघर्ष विराम करना पड़ा। बातचीत के लिए आगे आना पड़ा। ईरान पर अमेरिका ने क्यों हमला किया, इस सवाल का जवाब आज तक ट्रंप से लेकर कोई भी शीर्ष अधिकारी अमेरिका सहित पूरी दुनिया को नहीं दे पाए। दुनिया को संकट में डालने वाले ट्रंप ने खुद को और अमेरिका को भी संकट में डाल दिया है।
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