Reporters Without Borders Report INDIA Decline in the Press Freedom Index to a Low of 157
पेरिस, नई दिल्ली। भारत प्रेस की आजादी के मामले में बेहद गंभीर गिरावट का सामना कर रहा है। केंद्र सरकार, राज्य सरकारें प्रेस का गला घोंटने में लगी हैं। इसके अलावा सत्ता से जुड़े लोग, सत्ता का समर्थन हासिल लोग प्रेस को लगातार दबाने के लिए लगातार तत्पर हैं। यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्विटर आदि कंपनियों को इतनी अधिक संख्या में हर समय कुछ लोगों के एकाउंट बंद करने या कंटेट हटाने, ब्लाक करने के लिए नोटिस जा रहे हैं कि उनका तय समय सीमा में पालन करना कंपनियों के लिए मुश्किल हो रहा है। भारत के बंपर नोटिसों से परेशान कंपनियों ने अमेरिकी सरकार के समक्ष अपनी शिकायत दर्ज कराई है। हजारों पत्रकार, लेखक, आलोचक, डिजीटल और सोशल मीडिया से जुड़े सूचना प्रदाता जेलों में डाल दिए गए हैं, लाखों की संख्या में कंटेंट, एकाउंट ब्लाक या डिलीट करवाए गए हैं और बहुतों पर जुर्माने लगाए गए हैं और तरह-तरह से परेशान किया गया है। अनेक पत्रकारों की हत्याएं की गई हैं। पत्रकारों, सरकारों और पूंजीपतियों के काम-काज पर टिप्पणी करने वाले आम लोगों की जुबान को सिलने का काम भी भारत की केंद्र और राज्य सरकारें कर रही हैं। जगह-जगह पत्रकारों, आम टिप्पणीकारों को निशाना बनाया जा रहा है। उपरोक्त सबको कानूनों के दुरुपयोग और अन्यान्य तरीकों से उत्पीड़ित किया जा रहा है। यह तब है जब भारत के प्रधानमंत्री, पूरा सरकारी तंत्र भारत को लोकतंत्र की जननी और फ्री प्रेस की आजादी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता वाला देश होने के दिन-रात दावे करता है। प्रेस पर खतरों और पत्रकारिता के पतन में मीडिया मालिकों सहित भारी संख्या में मेन स्ट्रीम मीडिया के पत्रकारों और जनता का भी बड़ा रोल है जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ हैं और सरकारों तथा धन्नासेठों के साथ एकजुटता दिखाते हैं।
पेरिस स्थित रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स के 2026 के वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत 180 देशों में से 157वें स्थान पर रहा, जो 2025 के 151वें स्थान से नीचे गिर गया है। यह भारत की पत्रकारिता, अखबार, टेलीविजन चैनल मालिकों और पत्रकारों के साथ ही लोकतंत्र के लिए बहुत गंभीर या मुश्किल स्थिति का द्योतक है, जिसकी पहचान जबरदस्त न्यायिक उत्पीड़न, कानूनी धमकियों और स्वतंत्र मीडिया पर दबाव से होती है। इसने हाल के वर्षों में भारत की रैंकिंग को उसके सबसे निचले स्तर पर पहुँचा दिया है। (रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स, फ्रांसीसी भाषा में रिपोर्टस सेंस फ्रॉन्टिएरेस -आरएसएफ) की रिपोर्ट पत्रकारिता के अपराधीकरण पर प्रकाश डालती है, जिसमें पत्रकारों के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा और मानहानि कानूनों का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है। 2026 के नतीजों के अनुसार, भारत की रैंकिंग अपने कई पड़ोसी देशों, जिनमें नेपाल (87वां), श्रीलंका (134वां), पाकिस्तान (153वां) और बांग्लादेश (152वां) शामिल हैं, से भी नीचे है। भारत में मीडिया की आजादी को हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा से खतरा है, यह सार्वजनिक चर्चा को प्रभावित करती है इसके साथ ही हिंसा, उत्पीड़न और टेलीकम्युनिकेशन एक्ट तथा डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट जैसे कानूनों के जरिए सख्त नियामक जाँच का दबाव भी है। 2026 का इंडेक्स वैश्विक प्रेस की आजादी में 25 साल के सबसे निचले स्तर को दर्शाता है, जिसमें 180 में से 100 देशों के स्कोर में गिरावट आई है। एशिया में अफगानिस्तान की स्थिति सबसे खराब देशों में से एक है। इस क्षेत्र में केवल चीन (178), ईरान (177) और उत्तर कोरिया (179) जैसे देश ही उससे नीचे रैंक पर हैं।
बीते गुरुवार, 30 अप्रैल की सुबह, रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स आरएसएफ द्वारा प्रकाशित 2026 के वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत 180 देशों में से छह स्थान नीचे खिसककर 157वें स्थान पर आ गया। पिछले साल वैश्विक मीडिया स्वतंत्रता इंडेक्स में भारत 151वें स्थान पर था। भारत का परमाणु पड़ोसी देश पाकिस्तान 153वें स्थान पर है, जो पिछले साल के 158वें स्थान से ऊपर आया है।
आरएसएफ ने कहा कि उसने यह सूची ऐसे समय में जारी की है जब प्रेस पर राजनीतिक दबाव बढ़ रहा है, सत्तावादी प्रवृत्तियाँ बढ़ रही हैं और मीडिया बाजार बहुत कमजोर हो गया है। ताजा रिपोर्ट में कहा गया है, इंडेक्स का विश्लेषण दुनिया के कई हिस्सों में पत्रकारिता की स्थितियों में चिंताजनक गिरावट को दिखाता है। कुछ जगहों पर सुधार भी हुए हैं, लेकिन 180 देशों और क्षेत्रों में से 100 में प्रेस की आजादी का स्कोर कम हुआ है।
नॉर्वे लगातार 10वें साल पत्रकारों के लिए सबसे अच्छा देश बना हुआ है, जबकि इरिट्रिया लगातार तीसरे साल आखिरी पायदान पर है। भारत के बारे में आरएसएफ ने कहा, आजाद मीडिया का कानूनी उत्पीड़न बढ़ रहा है। इसकी वजह आपराधिक कानूनों का बढ़ता इस्तेमाल है, जिनमें मानहानि और राष्ट्रीय सुरक्षा कानून शामिल हैं, जो सीधे तौर पर पत्रकारों को निशाना बनाते हैं।
आरएसएफ ने कहा कि पाकिस्तान में प्रेस को लगातार पाबंदियों का सामना करना पड़ रहा है। वहां का राजनीतिक माहौल काफी तनावपूर्ण है, जिसमें अधिकारी पत्रकारिता से जुड़ी सामग्री के प्रसार को नियंत्रित करने, और कुछ मामलों में उसे दबाने की कोशिश करते हैं। अमेरिका 64वें स्थान पर है, जो पिछले साल के 57वें स्थान से नीचे गिरा है। आरएसएफ ने कहा, पत्रकार जो पहले से ही आर्थिक मुश्किलों और जनता के भरोसे की कमी जैसी अन्य चुनौतियों से जूझ रहे थे, अब उन्हें राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा सरकारी संस्थानों के व्यवस्थित दुरुपयोग का भी सामना करना पड़ रहा है। इसमें एपीआर और पीबीएस जैसे सार्वजनिक प्रसारकों की फंडिंग में कटौती, मीडिया के स्वामित्व में राजनीतिक दखल और कुछ खास पत्रकारों व मीडिया संस्थानों को निशाना बनाने वाली राजनीतिक रूप से प्रेरित जांचें शामिल हैं।
आरएसएफ का कहना है कि ट्रंप के सत्ता में लौटने के बाद से विरोध प्रदर्शनों के दौरान जमीन पर भी पत्रकारों को निशाना बनाया गया है। यह एक व्यापक गिरावट को दर्शाता है, जो आधुनिक अमेरिकी इतिहास में प्रेस की आजादी के लिए सबसे गंभीर संकटों में से एक है। ने कहा कि वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स के इतिहास में पहली बार, दुनिया के आधे से ज्यादा देश अब प्रेस की आजादी के मामले में मुश्किल या बहुत गंभीर श्रेणियों में आ गए हैं। पिछले 25 सालों में, इंडेक्स में शामिल सभी 180 देशों और क्षेत्रों का औसत स्कोर कभी भी इतना कम नहीं रहा है। 2001 से लगातार सख्त होते कानूनी हथियारों, खासकर राष्ट्रीय सुरक्षा नीतियों से जुड़े कानूनों के विस्तार ने सूचना के अधिकार को धीरे-धीरे कमजोर किया है। रिपोर्ट के अनुसार इंडेक्स का कानूनी संकेतक पिछले एक साल में सबसे ज्यादा गिरा है। यह एक साफ संकेत है कि दुनिया भर में पत्रकारिता को तेजी से अपराध के दायरे में लाया जा रहा है।
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