
11 मई 1912 को समराला, पंजाब, भारत में सआदत हसन मंटो का जन्म हुआ। मंटो उर्दू साहित्य में सबसे मशहूर भारतीय, पाकिस्तानी लेखक, नाटककार और उपन्यासकार कहानीकार माने गए हैं। मंटो का एक उद्धरण, अगर आप इन कहानियों को बर्दाश्त नहीं कर सकते तो समाज असहनीय है। मैं कौन होता हूँ इस समाज के कपड़े उतारने वाला, जो खुद नंगा है। मैं इसे ढकने की कोशिश भी नहीं करता, क्योंकि यह मेरा काम नहीं है, यह दर्जियों का काम है।
हिंदुस्तान आजाद हो गया था। पाकिस्तान अपने बनने के तुरंत बाद आजाद हो गया था लेकिन इन दोनों देशों में इंसान अभी भी गुलाम था, पूर्वाग्रह का गुलाम, धार्मिक कट्टरता का गुलाम, बर्बरता और अमानवीयता का गुलाम।
अगर आपको मेरी कहानियाँ गंदी लगती हैं, तो जिस समाज में आप रह रहे हैं, वह गंदा है। अपनी कहानियों से मैं सिर्फ सच्चाई सामने लाता हूँ।
मुझे ऐसा लगता है कि मैं हमेशा सब कुछ फाड़ता रहता हूँ और फिर उसे हमेशा के लिए सिलता रहता हूँ।
अगर किसी आदमी को औरत को अपने प्यार का केंद्र बनाना है, तो उसे इस पवित्र मानवीय भावना में पशुता को क्यों शामिल करना चाहिए? क्या प्यार इसके बिना अधूरा है? क्या प्यार शारीरिक कसरत का नाम है?
लेकिन प्यार, चाहे मुल्तान में हो या साइबेरिया के बर्फीले टुंड्रा में, चाहे सर्दी हो या गर्मी, चाहे अमीर हों या गरीब, चाहे सुंदर हों या बदसूरत, चाहे असभ्य हों या सभ्य, प्यार हमेशा सिर्फ प्यार होता है। कोई फर्क नहीं होता।
मुझे हैरानी हुई कि लोग पलायनवाद को इतना बुरा क्यों मानते हैं, यहाँ तक कि उस समय जो पलायनवाद दिख रहा था, उसे भी। शुरू में यह अशोभनीय लग सकता है, लेकिन अंत में इसकी दिखावे की कमी इसे अपनी तरह की सुंदरता देती है। यहां मंटो के अपने शब्दों में, जिनसे वह अपनी कब्र पर निशान लगाना चाहते थे, भगवान के नाम पर, जो दयालु और रहम करने वाला है।
जमाने के जिस दौर से हम गुजर रहे हैं, अगर आप उससे वाकिफ नहीं हैं तो मेरे अफसाने पढ़िये और अगर आप इन अफसानों को बरदाश्त नहीं कर सकते तो इसका मतलब है कि जमाना नाकाबिले-बरदाश्त है। मेरी तहरीर (लेखन) में कोई नुक्स नहीं। जिस नुक्स को मेरे नाम से मनसूब किया जाता है, वह दरअसल मौजूदा निजाम का एक नुक्स है। मैं हंगामा-पसंद नहीं हूं और लोगों के ख्यालात में हैजान पैदा करना नहीं चाहता। मैं तहजीब, तमद्दुन और सोसाइटी की चोली क्या उतारुंगा, जो है ही नंगी।
इधर-उधर से कई अफसर दौड़े आए और उन्होंने देखा कि वह आदमी जो 15 बरस तक दिन-रात अपनी दाँगों पर खड़ा रहा था, औंधे मुँह लेटा है-उधर खारदार तारों के पीछे हिंदुस्तान था, इधर वैसे ही तारों के पीछे पाकिस्तान, दरमियान में जमीन के उस टुकड़े पर जिसका कोई नाम नहीं था, टोबा टेक सिंह पड़ा था।
सच कहूँ तो, दुनिया दुखी लोगों से भरी हुई लगती थी, वे लोग जो दुकानों के खुले बरामदों पर सोते थे, और वे लोग भी जो ऊँची-ऊँची इमारतों में रहते थे। जो आदमी पैदल चलता है, उसे चिंता होती है कि उसके पास पहनने के लिए अच्छे जूते नहीं हैं। जो आदमी गाड़ी चलाता है, उसे चिंता होती है कि उसके पास लेटेस्ट मॉडल की कार नहीं है। हर आदमी की शिकायत अपने तरीके से सही है। हर आदमी की इच्छा अपने आप में जायज है।
एक लेखक के तौर पर मुझे यह रिश्ता बहुत दिलचस्प लगता है। इस पर सोचिए। आदमी और औरत के मिलन में, और राज्य और नागरिक के रिश्ते में भी तनाव होता है और अक्सर अप्रियता भी होती है। इसमें बहुत ज्यादा पाखंड भी होता है, लेकिन यह रिश्ता कभी टूटता नहीं है। राज्य और नागरिकों के बीच का संबंध (इसे जबरदस्ती का संबंध कहना सही होगा) भी शादी की तरह ही बच्चे पैदा करता है। लेकिन डरावने बच्चे, जैसे सुरक्षा अधिनियम और अध्यादेश। ऐसे बच्चे जो नागरिकों से ज्यादा अपने पिता, यानी राज्य से मिलते-जुलते हैं।
यहां सआदत हसन मंटो लेटे हैं और उनके साथ कहानी लिखने की कला के सभी राज और रहस्य दफन हैं, टन मिट्टी के नीचे वह लेटे हैं, और अब भी सोच रहे हैं कि दोनों में से कौन ज्यादा बड़ा कहानीकार है, भगवान या वह। -सआदत हसन मंटो
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