22 मई 1927 न्यूयॉर्क में पीटर मैथिएसेन का जन्म हुआ। पीटर मैथिएसेन अमेरिकी उपन्यासकार, प्रकृतिवादी, प्रमुख पर्यावरण कार्यकर्ता, वन्यजीव लेखक, जेन शिक्षक और एक समय के अमेरिकी खुफिया सेवा सीआईए के एजेंट बने। पीटर मैथिएसेन, ने चर्चित साहित्यिक पत्रिका द पेरिस रिव्यू के सह-संस्थापक बने। पीटर मैथिएसेन एकमात्र ऐसे लेखक हैं जिन्होंने नॉन-फिक्शन और फिक्शन दोनों ही श्रेणियों में नेशनल बुक अवार्ड जीता।
पीटर मैथिएसेन पेरिस में रहने लगे, विलियम स्टायरन, जेम्स बाल्डविन और इरविन शॉ जैसे अन्य प्रवासी अमेरिकी लेखकों के साथ जुड़ गए। 1953 में वे हैरोल्ड एल. ह्यूम्स, थॉमस गुइन्जबर्ग, डोनाल्ड हॉल, बेन मोरियाले और जॉर्ज प्लिम्प्टन के साथ मिलकर, मशहूर साहित्यिक पत्रिका द पेरिस रिव्यू प्रकाशन शुरु किया। 2006 की एक फिल्म में खुलासा हुआ था, उस समय वे अमेरिकी केंद्रीय खुफिया एजेंसी के लिए फ्रांस में काम कर रहे थे, और रिव्यू को अपने कवर (ढाल) के तौर पर इस्तेमाल कर रहे थे। चार्ली रोज के साथ 2008 के एक इंटरव्यू में, मैथिएसेन ने बताया कि उन्होंने अपनी सीआईए गतिविधियों के लिए कवर के तौर पर द पेरिस रिव्यू की शुरुआत की थी। सीआईए में काम करते हुए ही उन्होंने अपनोउपन्यास पार्टीशंस की रचना की। 1954 में पीटर मैथिएसेन अमेरिका लौट गए दि पेरिस रिव्यू की जिम्मेदारी अपने बचपन के दोस्त प्लिम्प्टन को सौंप दी। 1956 में मैथिएसेन का अपनी पत्नी तलाक हो गया और उन्होंने बड़े पैमाने पर यात्रा करना शुरू कर दिया। यहां प्रस्तुत हैं पीटर मैथिएसेन के कुछ विचारणीय उद्धरण
जब हम सापेक्ष दुनिया में फँस जाते हैं, और कभी भी अपनी नजर उस रहस्य की ओर नहीं उठाते, तो हमारा जीवन अवरुद्ध और अधूरा रह जाता है, हम उस स्वर्ग के लिए तरसते रहते हैं जो तब खो गया था, जब हम छोटे बच्चे थे और हमने उसकी जगह शब्दों, विचारों और अमूर्त धारणाओं को अपना लिया था, जैसे कि योग्यता, या अतीत, वर्तमान और भविष्य, और इस तरह, इस वर्तमान क्षण की सुंदरता और सटीकता में, उस चीज के अपने प्रत्यक्ष और सहज अनुभव को खो दिया था।
और केवल प्रबुद्ध लोग ही अपने पिछले जन्मों को याद कर सकते हैं, हम बाकी लोगों के लिए, पिछले जन्मों की यादें बस रोशनी की झलकियाँ हैं, कसक भरी चाहतें हैं, गुजरती हुई परछाइयाँ हैं, जो अजीब तरह से जानी-पहचानी लगती हैं, और जिन्हें हम थाम भी नहीं पाते कि वे ओझल हो जाती हैं, ठीक वैसे ही, जैसे धौलागिरी के ऊपर से उस चाँदी-रंगी चिड़िया का गुजरना। (धौलागिरी नेपाल में है और विश्व का सातवाँ सबसे ऊँचा पर्वत है)।
यह रहस्यमयी बोध (जो केवल तभी रहस्यमयी लगता है, जब हम वास्तविकता को केवल बुद्धि और इंद्रियों से मापी जा सकने वाली चीजों तक ही सीमित मान लें) हर युग और हर स्थान पर आश्चर्यजनक रूप से एक जैसा ही रहा है। सभी घटनाएँ असल में प्रक्रियाएँ हैं, आपसी जुड़ाव हैं सब कुछ निरंतर परिवर्तनशील है, अपने मन के पर्दों को हटाकर देखिए, तो आपको दिखेगा कि किसी भी चीज की कोई वास्तविक सीमा नहीं हैय इस ब्रह्मांड के अनंत आपसी जुड़ाव में, एक आणविक प्रवाह के रूप में, वही एक ब्रह्मांडीय ऊर्जा पत्थरों और इस्पात में भी वैसे ही जगमगा रही है, जैसे कि हमारे शरीर में।
मुझे अमेरिकी सीमांत क्षेत्रों और पूँजीवाद के विकास में गहरी दिलचस्पी थी, खासकर उन विशाल संपत्तियों में, जो अक्सर गरीब लोगों, अश्वेत लोगों और मूल-निवासी लोगों के खून-पसीने की कीमत पर खड़ी की जा रही थीं। असल में वे ही लोग थे जिन्होंने उन विशाल संपत्तियों के लिए सबसे बड़ी कीमत चुकाई थी।
जल्द ही बच्चे की निर्मल दृष्टि विचारों, पूर्वाग्रहों और अमूर्त अवधारणाओं से ढक जाती है। सरल, स्वतंत्र अस्तित्व अहंकार के बोझिल कवच से जकड़ जाता है। वर्षों बाद ही यह अहसास होता है कि रहस्य का एक महत्वपूर्ण बोध छिन गया है। चीड़ के पेड़ों से छनकर सूरज की किरणें चमकती हैं और हृदय एक पल के लिए सुंदरता और विचित्र पीड़ा से भर उठता है, मानो स्वर्ग की स्मृति में खो गया हो। उस दिन के बाद हम खोजी बन जाते हैं।
हमारे जीवन का उद्देश्य दूसरों को जीवन के माध्यम से सहायता करना है।
इन परिदृश्यों की वह महान शांति, जिसने कभी मुझे बेचैन कर दिया था, दिन-प्रतिदिन मुझमें समाती जा रही है, और इसके साथ ही यह अतार्किक भावना भी कि मैंने वह पा लिया है जिसकी मुझे तलाश थी, जबकि वास्तव में मैंने कभी यह जाना ही नहीं था कि वह क्या था।
सादगी ही सुख का संपूर्ण रहस्य है।
जेन वास्तव में जीवित रहने और जागृत रहने की याद दिलाता है। हम अक्सर दिवास्वप्न देखते रहते हैं, भविष्य के बारे में अटकलें लगाते हैं और अतीत में खोए रहते हैं। जेन अभ्यास का अर्थ है इस क्षण में अपने जीवन की सराहना करना। यदि आप दिन में पाँच मिनट भी सचमुच सचेत रहते हैं, तो आप बहुत अच्छा कर रहे हैं। हम भविष्य और अतीत दोनों से घिरे हुए हैं, और वर्तमान के सिवा कोई वास्तविकता नहीं है।
इस साँस में, जो हम अभी ले रहे हैं, वह रहस्य छिपा है जो सभी महान शिक्षक हमें बताने का प्रयास करते हैं।
साथ ही मैं स्वयं हूँ, वह बच्चा जो मैं था, वह बूढ़ा जो मैं बनूँगा।
संरक्षण की अवधारणा सभ्यता का कहीं अधिक सच्चा प्रतीक है, उस महाद्वीप के विनाश से कहीं अधिक जिसे हमने कभी प्रगति समझ लिया था।
मैं घंटों तक हाथियों (और केवल हाथियों) को देख सकता हूँ, क्योंकि देर-सवेर हाथी कुछ बहुत ही विचित्र करेगा… उस नकाबपोश धूसर चेहरे के पीछे रहस्य छिपा है, एक प्राचीन जीवन शक्ति, कोमल और शक्तिशाली, विस्मयकारी और मंत्रमुग्ध कर देने वाली, जो उस मौन को धारण करती है जो आमतौर पर पर्वत चोटियों, विशाल अग्नि और समुद्र के लिए आरक्षित होता है।
यदि हम अनंत काल तक जीवित रहने के लिए अभिशप्त होते, तो हम अपने आसपास की सुंदरता से शायद ही अवगत होते।
पर्वतों का रहस्य यह है कि पर्वत बस अस्तित्व में हैं, जैसे मैं स्वयं अस्तित्व में हूँ, पर्वत बस अस्तित्व में हैं, जबकि मैं नहीं। पर्वतों का कोई ष्अर्थष् नहीं है, वे स्वयं अर्थ हैंय पर्वत अस्तित्व में हैं। सूर्य गोलाकार है। मैं जीवन से भरपूर हूँ, और पर्वत भी गूंजते हैं, और जब मैं इसे सुन पाता हूँ, तो एक ऐसी गूंज होती है जिसे हम साझा करते हैं। मैं यह सब अपने दिमाग से नहीं, बल्कि अपने दिल से समझता हूँ, यह जानते हुए कि जिस चीज को शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता, उसे पकड़ने की कोशिश करना कितना बेमानी है, यह जानते हुए कि जब मैं किसी और दिन यह सब दोबारा पढ़ूंगा, तो मेरे पास सिर्फ शब्द ही बचेंगे।
हिमालय की इस साफ हवा में, पहाड़ और करीब आ जाते हैं, और इस अद्भुत नजारे को देखकर, मेरी आँखों में चुपके से आँसू आ जाते हैं, जो मेरे धूप से झुलसे गालों पर ठंडे हो जाते हैं। यह सिर्फ कोमल-हृदयता नहीं है, और न ही मैं इतनी ऊंचाई पर आकर कोई नासमझी कर रहा हूँ। इन कुछ हफ्तों में, जब कोई दखल देने वाला नहीं था, न डाक, न फोन, न लोग और न ही उनकी जरूरतें, मेरा दिमाग पूरी तरह साफ हो गया है, और अब मैं हर चीज पर बिना किसी बचाव या संकोच के, सहज रूप से प्रतिक्रिया देता हूँ। फिर भी, यह सारी भावनाएँ मुझे हैरान कर देती हैं, कुछ ही समय पहले तक मैं सच-सच कह सकता था कि पिछले बीस सालों में मेरी आँखों से एक भी आँसू नहीं गिरा था।
आप देखिए, मुझ जैसा इंसान, एक बेहद सावधान इंसान, अपनी जिंदगी को एक तय ढर्रे के हिसाब से जीता है, और फिर अचानक वह ढर्रा पूरी तरह बिखर जाता है। आप काफी समय तक उसे ठीक करने की कोशिश में इधर-उधर भागते रहते हैं, जब तक कि एक दिन आप टूटे हुए टुकड़ों से भरी अपनी बाहों के साथ सीधे खड़े होते हैं, और यह देखते हैं कि दुनिया आपके बिना ही आगे बढ़ गई है, और अब आप अपनी पुरानी जिंदगी को कभी नहीं पकड़ सकते, इसलिए आपको सब कुछ फिर से, बिल्कुल नए सिरे से शुरू करना होगा।
हल्के रहो, हल्के रहो, बिल्कुल हल्के, पूरी तरह से रोशनी से भरे हुए!
क्या आपने कभी हिम-तेंदुए को देखा है? नहीं! है न यह कितनी अद्भुत बात?
आप अपना सबसे बेहतरीन काम तब करते हैं, जब आप अपने बारे में बिल्कुल भी सचेत या जागरूक नहीं होते।
मेरे अंदर वह चीज थी, जिसे कीर्केगार्ड ने अनंतता की बीमारी कहा था, मैं एक रास्ते से दूसरे रास्ते पर भटकता रहा, मुझे इस बात का जरा भी एहसास नहीं था कि मैं असल में किसी चीज की तलाश में निकला हूँ, और न ही मुझे कोई अंदाजा था कि मैं आखिर किस चीज की खोज कर रहा हूँ। मुझे बस इतना पता था कि मेरी हर साँस की गहराई में एक खालीपन छिपा है, जिसे भरना बेहद जरूरी है।
ध्यान करने का मकसद सिर्फ ज्ञानोदय पाना नहीं है, बल्कि इसका असली मकसद यह है कि आप असाधारण पलों में भी पूरी तरह से सचेत रहें, पूरी तरह से श्वर्तमानश् में जिएँ, और अपनी इस वर्तमान-जागरूकता को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी के हर छोटे-बड़े पल में भी बनाए रखें।
जो कोई भी यह सोचता है कि वह पूरी दुनिया को बचा सकता हैकृवह न सिर्फ गलत है, बल्कि बेहद खतरनाक भी है।
अमेरिकी बीहड़ या जंगल, को धीरे-धीरे खत्म होते देखना, अपने आप में एक उदासी भरी, शोकपूर्ण अनुभूति है, क्योंकि यह हमारा अपना ही एक मिथक है, अमेरिकी सीमांत का मिथक, जो हमारी आँखों के सामने ही धीरे-धीरे मिटता जा रहा है। मुझे इस बात का गहरा दुख है कि मेरे बच्चे कभी वह सब नहीं देख पाएँगे जो मैंने देखा है, और उनके बच्चे तो कुछ भी नहीं देख पाएँगेय अब जब भी मैं प्रकृति की ओर देखता हूँ, तो मेरे मन में एक गहरी उदासी छा जाती है।
यह कितनी हैरानी की बात है कि हम यह मानकर चलते हैं कि जीवित रहने की सहज वृत्ति, यानी मौत का डर, हमें उस शुद्ध और बिना किसी व्याख्या वाले अनुभव के सुख से अलग कर देगी, जिसमें शरीर, मन और प्रकृति, ये तीनों एक ही होते हैं। विस्मय से मुँह मोड़ना, लॉबस्टर की तरह पीछे हटकर सुरक्षित ठिकानों में छिप जाना, और यह बेचैन करने वाली सहज वृत्ति कि हमारा जीवन बिना जिए ही बीतता जा रहा है, ये सारी बातें उस आनंद-विहीन विस्तार में, पैसे की उस विनाशकारी सड़ांध में, और धरती, हवा तथा पानी के उस घोर प्रदूषण में साफ झलकती हैं, जिनसे ही हमारा जन्म हुआ है। -पीटर मैथिएसेन
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