27 मई 1332 को ट्यूनिस, हफ्सिद सल्तनत में इब्न खल्दून का जन्म हुआ। इब्न खल्दून बहुत मशहूर और इज्जत पाने वाले ट्यूनिशियन विद्वान, इतिहासकार, दार्शनिक और समाजशास्त्री बने। इब्न खल्दून के दर्शन को अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रेगन ने अपनी आर्थिक नीतियों में जोड़ा। उन्हें मध्य युग के महानतम सामाजिक वैज्ञानिकों में से एक माना जाता है, और अनेक विद्वान उन्हें इतिहासलेखन, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र और जनसांख्यिकी अध्ययनों का एक प्रमुख अग्रदूत मानते हैं। उन्होंने लोगों को जागरूक करने के लिए तर्क दिए तो शासक और अमीर लोग परेशान हो गए। नतीजतन इब्न खल्दून को अपना स्थान छोड़ना पड़ा। इब्न खल्दून ने पाँच वर्ष काहिरा में बिताए, जहाँ उन्होंने अपनी आत्मकथा और विश्व इतिहास लेखन पूरा किया साथ ही शिक्षक व न्यायाधीश के रूप में भी कार्य किया। इसी दौरान उन पर एक गुप्त संगठन, रिजाल हवा रिजाल में शामिल होने का आरोप लगा। इस संगठन के सुधारवादी आदर्शों ने स्थानीय राजनीतिक अधिकारियों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। वृद्ध इब्न खल्दून को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। जबकि वे एक महीने पहले ही मालिकी काजी (न्यायाधीश) के पद पर छठी बार चुने थे, जेल में 17 मार्च 1406 को उनका निधन हो गया। इब्न खल्दून के विचारों से तब के शासक, नीति निर्धारक, समाज के अग्रणी लोग हिल गए और इब्न खल्दून उनकी आंख की किरकिरी बन गए। बहुत बाद में इब्न खल्दून का दुनिया भर में सम्मान हुआ। यहां पेश हैं इब्न खल्दून के कुछ विचारणीय उद्धरण
जिम्मेदार और सुव्यवस्थित व्यापारियों के स्वामित्व वाले व्यवसाय, अंततः उन व्यवसायों से कहीं आगे निकल जाते हैं जिनका स्वामित्व धनवान शासकों के हाथों में होता है।
अतीत, भविष्य से कहीं अधिक मिलता-जुलता है, ठीक वैसे ही, जैसे पानी की एक बूँद दूसरी बूँद से मिलती है।
लोग अपनी सुख-सुविधाओं के प्रति अपनी अधीनता को यह तर्क देकर सही ठहराते हैं कि अतीत के स्त्री-पुरुषों ने भी कथित तौर पर वही कार्य किए थे, जो वे स्वयं आज कर रहे हैं।
अतः, इतिहास की जड़ें दर्शनशास्त्र में गहराई से जमी हुई हैं। इसे दर्शनशास्त्र की ही एक शाखा माना जाना चाहिए।
मुहम्मद ने कहा, प्रत्येक शिशु एक स्वाभाविक अवस्था में जन्म लेता है। उसके माता-पिता ही उसे यहूदी, ईसाई अथवा विधर्मी बनाते हैं।
मानव जीवन का उद्देश्य केवल उसका सांसारिक कल्याण करना ही नहीं है। यह संपूर्ण संसार तुच्छ और निरर्थक है। इसका अंत मृत्यु और विनाश में ही होता है। मानव जीवन का वास्तविक उद्देश्य उसका धर्म है, जो उसे परलोक में सुख की ओर ले जाता है।
सरकारी निर्णय प्रायः अन्यायपूर्ण ही होते हैं, क्योंकि विशुद्ध न्याय केवल उसी वैधानिक खिलाफत में देखने को मिलता था, जो बहुत ही अल्पकाल तक अस्तित्व में रही थी।
जो ज्ञान हम तक नहीं पहुँच पाया है, वह उस ज्ञान की तुलना में कहीं अधिक विशाल है, जो हम तक पहुँच चुका है।
अन्याय केवल उन्हीं लोगों द्वारा किया जा सकता है, जिन पर किसी का हाथ नहीं पहुँच सकता, अर्थात केवल उन्हीं लोगों द्वारा, जिनके पास सत्ता और अधिकार मौजूद हों।
मानवीय गुणों के संदर्भ में, किसी भी गुण की अति (चरम सीमा) सदैव निंदनीय होती है, जबकि उसका मध्यम मार्ग ही सदैव प्रशंसनीय माना जाता है।
सुख और लाभ की प्राप्ति प्रायः उन्हीं लोगों को होती है, जो अत्यंत विनम्र (अधीनस्थ) होते हैं और चाटुकारिता का सहारा लेते हैं। स्वभाव की यह प्रवृत्ति ही सुख-समृद्धि प्राप्त करने के प्रमुख कारणों में से एक है। लोग अतीत के पुरुषों और महिलाओं के कथित कार्यों का हवाला देकर, सुख-भोग के प्रति अपनी अधीनता को सही ठहराते हैं।
हर राज्य के पास उतनी ही बड़ी सेना हो सकती है, जितनी वह रख और संभाल सकता है उससे ज्यादा नहीं।
एक अकेले विद्वान के पास ज्ञान का जो भंडार होता है, वह सीमित ही होता है। (अपनी कमियों को) स्वीकार कर लेने से आलोचना से बचाव हो जाता है।
दूसरी ओर, हमें ईश्वर से प्रेरणा मिली। उन्होंने ही हमें एक ऐसे विज्ञान की ओर अग्रसर किया, जिसके सत्य को हमने पूरी निर्भीकता के साथ सबके सामने रखा। यदि मैं इस विज्ञान की समस्याओं को पूरी तरह से प्रस्तुत करने में, और यह दिखाने में सफल रहा हूँ कि यह अपने विभिन्न पहलुओं और विशेषताओं में अन्य सभी शिल्पों से किस प्रकार भिन्न है, तो इसका श्रेय ईश्वरीय मार्गदर्शन को ही जाता है। इसके विपरीत, यदि मैंने कोई बिंदु छोड़ दिया है, या यदि समस्याएँ किसी अन्य विषय के साथ उलझ गई हैं, तो उन्हें सुधारने का कार्य तो किसी पारखी आलोचक के लिए ही शेष रह जाता है, किंतु इसका श्रेय मुझे ही मिलना चाहिए, क्योंकि मैंने ही इस मार्ग को प्रशस्त किया और इसकी रूपरेखा तैयार की।
ईश्वर अपनी ज्योति के माध्यम से, जिसका चाहें, मार्गदर्शन करते हैं।
कोई भी अकेला व्यक्ति अपने बलबूते पर जीवन की सभी आवश्यक वस्तुएँ प्राप्त नहीं कर सकता। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए, सभी मनुष्यों को अपनी सभ्यता के अंतर्गत एक-दूसरे का सहयोग करना अनिवार्य है। किंतु, मनुष्यों के किसी समूह के आपसी सहयोग से जो कुछ भी प्राप्त होता है, वह उस समूह की अपनी संख्या से कई गुना अधिक लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सक्षम होता है। उदाहरण के लिए, कोई भी अकेला व्यक्ति अपने भोजन के लिए आवश्यक गेहूँ का हिस्सा स्वयं प्राप्त नहीं कर सकता। परंतु जब छह या दस व्यक्ति, जिनमें औजार बनाने के लिए एक लोहार और एक बढ़ई, तथा बैलों की देखभाल करने वाले, हल चलाने वाले, पकी हुई फसल की कटाई करने वाले और अन्य सभी कृषि-संबंधी कार्यों का दायित्व संभालने वाले लोग शामिल हों, अपने भोजन की व्यवस्था करने का बीड़ा उठाते हैं, और इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु चाहे अलग-अलग रूप में अथवा सामूहिक रूप से मिलकर कार्य करते हैं, और इस प्रकार अपने श्रम के माध्यम से भोजन की एक निश्चित मात्रा प्राप्त करते हैं, तो भोजन की वह मात्रा, उन कार्य करने वाले लोगों की अपनी संख्या से कई गुना अधिक लोगों के लिए पर्याप्त होती है। मिलकर किया गया श्रम, श्रमिकों की जरूरतों और आवश्यकताओं से कहीं ज्यादा पैदा करता है।
इब्न खल्दून की ऐतिहासिक पद्धति के उनके समय में बहुत कम उदाहरण या अनुयायी थे। हालाँकि इब्न खल्दून को धार्मिक विज्ञानों के अंतर्गत न्यायशास्त्र पर एक सफल व्याख्याता के रूप में जाना जाता है, फिर भी उनके बहुत कम छात्र ही उनकी मुकद्दीमा से परिचित थे और उससे प्रभावित थे। ऐसे ही एक छात्र अल-मकरीजी ने मुकद्दीमा की प्रशंसा की, हालाँकि कुछ विद्वानों ने उनकी और दूसरों की इस प्रशंसा को आम तौर पर खोखला और इब्न खल्दून की पद्धतियों की समझ से रहित पाया है।
2007 में इस्तांबुल, तुर्की में इब्न खल्दून के सम्मान में इब्न खल्दून विश्वविद्यालयश् खोला गया। यह विश्वविद्यालय त्रिभाषी नीति को बढ़ावा देता है। इसमें शामिल भाषाएँ अंग्रेजी, आधुनिक तुर्की और अरबी हैं, और इसका मुख्य जोर सामाजिक विज्ञानों के शिक्षण पर है। 1981 में अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने इब्न खल्दून को अपनी सप्लाई-साइड आर्थिक नीतियों (जिन्हें रीगनोमिक्स के नाम से भी जाना जाता है) पर एक प्रेरक प्रभाव के रूप में उद्धृत किया। उन्होंने इब्न खल्दून के विचारों को अपने शब्दों में दोहराते हुए कहा कि किसी भी राजवंश के शुरुआती दौर में, कम कर-निर्धारण (टैक्स असेसमेंट) से भी भारी कर-राजस्व प्राप्त होता था, और यह कि राजवंश के अंतिम दौर में भारी कर-निर्धारण के बावजूद बहुत कम कर-राजस्व प्राप्त होता था। रीगन ने कहा कि उनका लक्ष्य कम कर-निर्धारण के साथ-साथ भारी राजस्व प्राप्त करने की स्थिति तक पहुँचना है। -इब्न खल्दून
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