16 जून 1938 को लॉकपोर्ट, न्यूयॉर्क में जॉयस कैरोल ओट्स का जन्म हुआ। जॉयस कैरोल प्रसिद्ध अमेरिकी लेखिका हैं। जॉयस कैरोल ने 1963 में अपनी पहली किताब प्रकाशित की और फिर उन्होंने 58 उपन्यास, कई नाटक और छोटी किताबें (नोवेला), और लघु कथाओं, कविताओं और नॉन-फिक्शन की कई किताबें प्रकाशित की हैं। उनके उपन्यास ब्लैक वॉटर (1992), व्हाट आई लिव्ड फॉर (1994), और ब्लॉन्ड (2000) और उनकी लघु कथाओं का संग्रह लवली, डार्क, डीप स्टोरीज (2014) पुलित्जर पुरस्कार के फाइनलिस्ट रहे हैं। उन्हें अपनी लेखन कला के लिए कई पुरस्कार मिले हैं, जिनमें उनके उपन्यास देम (1969) के लिए नेशनल बुक अवार्ड, दो ओ. हेनरी अवार्ड, नेशनल ह्यूमैनिटीज मेडल और जेरूसलम प्राइज (2019) शामिल हैं। यहां प्रस्तुत हैं जॉयस कैरोल ओट्स के कुछ विचारणीय उद्धरण
हम कहाँ जाते हैं और वहाँ पहुँचकर क्या करते हैं, यही हमें बताता है कि हम असल में कौन हैं।
मैं कभी बदलती नहीं, मैं बस और ज्यादा मैं बनती जाती हूँ।
पढ़ना ही एकमात्र ऐसा जरिया है जिससे हम अनजाने में, और अक्सर बेबस होकर, किसी और की जिंदगी, किसी और की आवाज और किसी और की रूह में उतर जाते हैं।
यह दुनिया सच में कितनी खूबसूरत है, बस देखने की जरूरत है।
खूब पढ़ें, और बिना किसी झिझक के। वही पढ़ें जो आप पढ़ना चाहते हैं, न कि वह जो कोई और आपको पढ़ने के लिए कहे।
दिल को हल्का और उम्मीदों से भरा रखें। लेकिन सबसे बुरे हालात के लिए भी तैयार रहें।
चुनौती हालात का सामना करने की है। कोई भी बेवकूफ अच्छी जगह पर खुश रह सकता है, लेकिन नरक जैसी जगह पर खुश रहने के लिए नैतिक हिम्मत की जरूरत होती है।
समय का अजीबपन। इसके गुजरने में नहीं, जो कभी-कभी कभी न खत्म होने वाला लग सकता है, जैसे कोई ऐसी सुरंग जिसका अंत न दिखे और जिसकी शुरुआत हम भूल चुके हों, बल्कि इस अचानक एहसास में कि कोई ऐसी चीज जो सीमित थी, गुजर चुकी है और उसे वापस नहीं लाया जा सकता।
असलियत में कुछ भी आम नहीं होता।
मेरा मानना है कि कला को सुकून देने वाला नहीं होना चाहिए, सुकून के लिए हमारे पास मास एंटरटेनमेंट और एक-दूसरे का साथ है। कला को उकसाने वाला, बेचैन करने वाला और हमारी भावनाओं को जगाने वाला होना चाहिए, उसे हमारी सहानुभूति को ऐसी दिशाओं में बढ़ाना चाहिए जिनकी हमने उम्मीद न की हो या शायद हम चाहते भी न हों। नॉवेल पन्ने पर नहीं, बल्कि ध्यान और ख्यालों की दुनिया में शुरू होते हैं, यानी सोचने से, लिखने से नहीं।
कला इंसानी आत्मा की सबसे ऊँची अभिव्यक्ति है।
पहला ड्राफ्ट पूरा करना ऐसा है जैसे बहुत गंदे फर्श पर नाक से मूँगफली को धकेलना।
सिर्फ वह नहीं जो आँखें देखती हैं, बल्कि वह भी जो मन कल्पना करता है कि आँखें क्या देखेंगी।
मैंने खुद को तब भी लिखने के लिए मजबूर किया है जब मैं बुरी तरह थक चुकी थी, जब मुझे लगा कि मेरी आत्मा ताश के पत्ते जितनी पतली हो गई है और किसी तरह लिखने का काम सब कुछ बदल देता है।
अकेलापन खतरनाक है, क्योंकि अगर अकेलापन ईश्वर तक नहीं ले जाता, तो वह शैतान की ओर ले जाता है। वह इंसान को खुद में ही उलझा देता है।
हमारा घर काँच का बना है और हमारी जिंदगी भी काँच की है, और खुद को बचाने के लिए हम कुछ नहीं कर सकते।
सबसे बुरी बात, काफी प्यार न मिलने के बदले में खुद को ही सौंप देना।
मैं इतना इसलिए लिखती हूँ क्योंकि मेरी बिल्ली मेरी गोद में बैठी रहती है। वह म्याऊँ-म्याऊँ करती है, इसलिए मेरा उठने का मन नहीं करता। वह मेरे पति से कहीं ज्यादा सुकून देने वाली है।
सिर्फ समय बीतने से ही हम सब बेघर या परदेसी हो जाते हैं।
अपने खुद के एडिटर या आलोचक बनिए। हमदर्दी रखने वाले, लेकिन बिना किसी रियायत के!
एक ऐसा पल या घड़ी आती है जिसे आप हमेशा याद रखेंगे जब आपको बिना किसी ठोस सबूत के, बस सहज एहसास से पता चल जाता है कि कुछ गड़बड़ है। आपको पता नहीं होता पता हो भी नहीं सकता कि यह उन गलत घटनाओं की एक ऐसी कड़ी की शुरुआत है जो आपकी जानी-पहचानी जिंदगी को पूरी तरह तबाह कर देंगी।
देखिए, लोग आपकी जिंदगी में किसी वजह से आते हैं। हो सकता है उन्हें खुद पता न हो कि क्यों। हो सकता है आपको भी पता न हो। लेकिन कोई वजह जरूर होती है। होनी ही चाहिए।
होमो सेपियन्स (इंसान) ही वह प्रजाति है जो ऐसे प्रतीक बनाती है जिनमें वह अपना जुनून और अधिकार डालती है, और फिर भूल जाती है कि वे प्रतीक तो बस इंसानी खोज हैं। -जॉयस कैरोल ओट्स #JoyceCarolOates
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