8 अगस्त 1694 को सेंटफील्ड काउंटी डाउन, अल्स्टर, आयरलैंड का साम्राज्य में फ्रांसिस हचेसन (दार्शनिक) का जन्म हुआ। फ्रांसिस हचेसन प्रसिद्ध आयरिश दार्शनिक बने, उन्हें शुरुआती स्कॉटिश ज्ञानोदय के प्रमुख लोगों में से एक माना जाता है। उन्होंने ग्लासगो विश्वविद्यालय में नैतिक दर्शन के प्रोफेसर के पद पर काम किया और नैतिक भावना सिद्धांत दृढ़ता से वकालत की। इस सिद्धांत के अनुसार, इंसानों में एक जन्मजात भावना होती है जो नैतिक फैसलों में उनकी मदद करती है। हचेसन मुख्य रूप से अपनी नैतिक रचनाओं के लिए जाने जाते हैं, जिनमें उन्होंने परोपकार को नैतिक गुण का मुख्य स्रोत बताया है और अधिकतम लोगों की अधिकतम खुशी का विचार देकर बाद के उपयोगितावादी सिद्धांतों की नींव रखी।
फ्रांसिस हचेसन ने नैतिकता के अलावा सौंदर्यशास्त्र, ज्ञानमीमांसा, तर्कशास्त्र और तत्वमीमांसा में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। वह सौंदर्य को आंतरिक भावना का परिणाम मानने वाले शुरुआती आधुनिक विचारकों में से एक बने। जिससे सौंदर्यशास्त्र को दर्शन की एक अलग शाखा के रूप में स्थापित करने में मदद मिली। ज्ञानमीमांसा में, उन्होंने जन्मजात प्रवृत्तियों का बचाव करते हुए जॉन लॉक के अनुभववाद की आलोचनात्मक समीक्षा की। तर्कशास्त्र और तत्वमीमांसा में उन्होंने सामान्य-बुद्धि यथार्थवाद के शुरुआती विचार पेश किए और सामान्य-बुद्धि के स्कॉटिश स्कूल के विकास में योगदान दिया।
हचेसन ने जानवरों के अधिकारों के लिए भी शुरुआती तर्क दिएय उनका कहना था कि संवेदनशील जीव खुशी और दर्द महसूस करने की अपनी क्षमता के आधार पर नैतिक सम्मान के हकदार हैं। उनका प्रभाव बाद के ज्ञानोदय विचारकों जैसे डेविड ह्यूम, एडम स्मिथ, जेरेमी बेंथम और थॉमस रीड पर भी पड़ा, और उनकी रचनाएँ ब्रिटेन और औपनिवेशिक अमेरिका दोनों जगहों पर खूब पढ़ी गईं।
फ्रांसिस हचेसन ने कहा है,
बुद्धिमानी का अर्थ है सर्वोत्तम तरीकों से सर्वोत्तम लक्ष्यों को प्राप्त करना।
अहस्तांतरणीय अधिकार सभी सरकारों के लिए आवश्यक सीमाएँ हैं।
वही कार्य सर्वोत्तम है जिससे अधिकतम खुशी मिलती है।
सही होने का अंतिम विचार वह है जो सार्वभौमिक भलाई की ओर ले जाता है, और जब किसी व्यक्ति के किसी खास तरह से काम करने में यह प्रवृत्ति होती है, तो उसे उस तरह से काम करने का अधिकार होता है।
बहुत से लोग वास्तव में गुणी होते हैं जो यह नहीं बता पाते कि गुण क्या है, लेकिन असल में अच्छी सेहत वाले लोगों में ये क्षमताएँ अपनी अलग-अलग गतिविधियाँ काफी हद तक एक जैसी और लगातार करती रहती हैं, चाहे उन क्षमताओं के बारे में लोगों की राय कुछ भी हो।
हचिसन के अनुसार, इंसान के पास कई तरह की इंद्रियाँ होती हैं, अंदरूनी और बाहरी, सहज और सीधी। इंद्रिय की आम परिभाषा यह हैरू हमारे मन की कोई ऐसी स्थिति जिससे हम अपनी इच्छा के बिना विचार ग्रहण करते हैं और सुख-दुख का अनुभव करते हैं। फ्रांसिस हचेसन इन इंद्रियों की पूरी सूची देने की कोशिश नहीं करते, लेकिन अपनी रचनाओं के अलग-अलग हिस्सों में वे आम तौर पर मानी जाने वाली पाँच बाहरी इंद्रियों (जिनके बारे में उनका इशारा है कि और भी जोड़ी जा सकती हैं) के अलावा निम्नलिखित इंद्रियों का जिक्र करते हैं।
चेतना, जिससे हर इंसान खुद को और अपने मन में चल रही हर चीज को महसूस करता है।
सुंदरता का बोध, कभी-कभी खास तौर पर अंदरूनी इंद्रिय कहा जाता है।
सार्वजनिक बोध, सेंसस कम्युनिस दूसरों की खुशी से खुश होने और उनके दुख से परेशान होने की प्रवृत्ति।
नैतिक बोध या कामों और भावनाओं में सुंदरता का नैतिक बोध, जिससे हम खुद में या दूसरों में अच्छाई या बुराई को पहचानते हैं।
सम्मान का बोध, या प्रशंसा और निंदा का बोध, जो दूसरों की मंजूरी या कृतज्ञता को खुशी का जरूरी कारण बनाता है, और हमारे द्वारा किए गए नुकसान पर उनकी नापसंदगी, निंदा या नाराजगी को उस बेचैनी का कारण बनाता है जिसे शर्म कहते है।
हास्यास्पद चीजों का बोध, इन सभी वर्गों से अलग अन्य अनुभव भी हो सकते हैं, और असल में, इस तरह के मनोवैज्ञानिक वर्गीकरण से कितनी इंद्रियाँ निकल सकती हैं, इसकी कोई सीमा नहीं निर्धारित नहीं की जा सकती। -फ्रांसिस हचेसन
The ultimate idea of ​​rightness leads us towards the universal good—a quote by Francis Hutcheson, the prominent Irish philosopher of the Scottish Enlightenment