
14 अगस्त 2004 को क्राको, पोलैंड में पोलिश-अमेरिकी कवि, गद्य लेखक, अनुवादक और राजनयिक चेस्लाव मिलोश (जन्म 30 जून 1911 शेटेनियाई, कोव्नो गवर्नरेट, रूसी साम्राज्य) का निधन हुआ। चेस्लाव मिलोश 20वीं सदी के प्रमुख प्रतिष्ठित कवियों में से एक माने गए हैं। 1980 में उन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला। स्वीडिश अकादमी ने उन्हें एक ऐसे लेखक के रूप में सराहा जो गंभीर संघर्षों से भरी दुनिया में इंसान की बेबस हालत को आवाज देता है। #CzesławMiłosz ने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान वारसॉ पर जर्मन कब्जे का दौर देखा और युद्ध के बाद पोलिश सरकार के लिए सांस्कृतिक अटैची बने। कम्युनिस्टों से परेशान चेस्लाव मिलोश फ्रांस चले गए और फिर अमेरिका में निर्वासित जीवन चुना, जहाँ वह कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले में प्रोफेसर बने। उनकी कविता, खासकर युद्ध के समय के उनके अनुभवों पर आधारित, और गद्य पुस्तक द कैप्टिव माइंड (स्टालिनवाद का विश्लेषण) ने उन्हें एक प्रमुख प्रवासी कलाकार और बुद्धिजीवी के रूप में ख्याति दिलाई।
यहां पेश हैं चेस्लाव मिलोश के विचारणीय उद्धरण
ऐसा नहीं है कि मैं भगवान या हीरो बनना चाहता हूँ। बस एक पेड़ बन जाऊँ, सदियों तक बढ़ता रहूँ, किसी को चोट न पहुँचाऊँ।
यह मानना कि आप शानदार हैं। और धीरे-धीरे यह पता चलना कि आप शानदार नहीं हैं। एक इंसान की जिंदगी के लिए इतनी मेहनत काफी है।
कविता का मकसद हमें यह याद दिलाना है कि सिर्फ एक इंसान बने रहना कितना मुश्किल है, क्योंकि हमारा घर खुला है, दरवाजों में कोई चाबी नहीं है, और अनदेखे मेहमान अपनी मर्जी से आते-जाते रहते हैं।
भाषा ही एकमात्र वतन है।
जो लोग अब बोल नहीं सकते, उनकी कहानी सुनाना जिंदा लोगों का फर्ज है।
लोगों के लिए असली अफीम मौत के बाद कुछ न होने का विश्वास है, यह सोचकर बहुत सुकून मिलता है कि हमारे धोखे, लालच, कायरता और हत्याओं के लिए हमारा कोई हिसाब-किताब नहीं होगा।
फिर भी, प्यार में पड़ना और प्यार करने में सक्षम होना एक ही बात नहीं है।
मेरी बेवकूफी का इतिहास कई किताबों में समा सकता है।
जज्बे की आवाज तर्क की आवाज से बेहतर होती है। बिना जज्बे वाले लोग इतिहास नहीं बदल सकते।
जिसकी कोई परछाईं नहीं होती, उसमें जीने की ताकत नहीं होती।
कविता का मकसद हमें यह याद दिलाना है ध् कि सिर्फ एक इंसान बने रहना कितना मुश्किल है
इंसान का असली दुश्मन सामान्यीकरण (जनरलाइजेशन) है। मैं विरोधाभासों से बना हूँ, इसीलिए मेरे लिए दर्शनशास्त्र से बेहतर माध्यम कविता है।
व्यंग्य ही गुलामों की शान है।
हम सभी परम ज्ञान की चाह रखते हैं, लेकिन अंततः हमें खुद पर ही निर्भर रहना पड़ता है।
मैंने कविता को सत्य की भावपूर्ण खोज के रूप में परिभाषित किया है।
यह सोचना सुखद है कि मैं एक ऐसी यात्रा का साथी था जो कभी समाप्त नहीं होती।
जीवित लोगों का यह कर्तव्य है कि वे उन लोगों की कहानी सुनाएँ जो अब स्वयं बोल नहीं सकते।
कभी धर्म लोगों के लिए अफीम जैसा काम करता था। जो लोग अपमान, दर्द, बीमारी और गुलामी झेल रहे थे, उन्हें धर्म मरने के बाद इनाम मिलने का भरोसा दिलाता था। लेकिन अब हम एक बदलाव देख रहे हैं, लोगों के लिए असली अफीम है मरने के बाद कुछ न होने का विश्वास, यह सोचकर मिलने वाला बहुत बड़ा सुकून और राहत कि हमारी धोखेबाजी, लालच, कायरता और हत्याओं के लिए हमारा कोई हिसाब-किताब नहीं होगा।
बुराई बढ़ती है और फलती-फूलती है, जो समझ में आने वाली बात है, क्योंकि इसके पक्ष में तर्क और संभावना होती है और जाहिर है, ताकत भी। लेकिन अच्छाई के उन नन्हे बीजों का प्रतिरोध पूरी तरह से रहस्यमय है, जिन्हें कोई भी दूरगामी परिणाम लाने की शक्ति नहीं देता। ऐसी मामूली सी दिखने वाली चीज न केवल टिकी रहती है, बल्कि अपने भीतर अपार ऊर्जा भी समेटे होती है, जो धीरे-धीरे सामने आती है। -चेस्लाव मिलोश
Thought-provoking quote by the Nobel Prize-winning poet, writer, and diplomat Czesław Miłosz

