7 अक्टूबर 1885 को कोपेनहेगन, डेनमार्क में नील्स बोहर (नील्स हेनरिक डेविड बोहर) का जन्म हुआ। नील्स बोहर विख्यात डेनिश थ्योरेटिकल फिजिसिस्ट बने जिन्होंने एटॉमिक स्ट्रक्चर और क्वांटम थ्योरी को समझने में अहम योगदान दिया इसके लिए उन्हें 1922 में फिजिक्स में नोबेल पुरस्कार मिला। नील्स बोहर फिलॉसफर और वैज्ञानिक रिसर्च को बढ़ावा देने वाले प्रमुख व्यक्ति थे। बोहर ने परमाणु का बोहर मॉडल विकसित किया, जिसमें उन्होंने बताया कि इलेक्ट्रॉनों के ऊर्जा स्तर अलग-अलग (डिस्क्रीट) होते हैं और इलेक्ट्रॉन परमाणु के केंद्र (न्यूक्लियस) के चारों ओर स्थिर कक्षाओं (ऑर्बिट) में घूमते हैं, लेकिन वे एक ऊर्जा स्तर (या कक्षा) से दूसरे में जा सकते हैं। बोहर मॉडल की जगह अब दूसरे मॉडल ले चुके हैं, लेकिन इसके मूल सिद्धांत आज भी सही माने जाते हैं। उन्होंने पूरकता (कॉम्प्लिमेंटैरिटी) का सिद्धांत दिया, कि चीजों का विश्लेषण अलग-अलग विरोधी गुणों के आधार पर किया जा सकता है, जैसे कि वे कभी तरंग (वेव) की तरह व्यवहार करती हैं तो कभी कणों की धारा (स्ट्रीम ऑफ पार्टिकल्स) की तरह।
नील्स बोहर ने 1920 में कोपेनहेगन यूनिवर्सिटी में इंस्टीट्यूट ऑफ थ्योरेटिकल फिजिक्स की स्थापना की, जिसका नाम नील्स बोहर इंस्टीट्यूट है। बोहर ने हंस क्रेमर्स, ऑस्कर क्लेन, जॉर्ज डी हेवेसी और वर्नर हाइजेनबर्ग जैसे भौतिकविदों का मार्गदर्शन किया और उनके साथ मिलकर काम किया। 1920 में जिरकोनियम जैसे एक नए तत्व के गुणों की भविष्यवाणी की, जिसका नाम हाफनियम रखा गया, यह नाम कोपेनहेगन के लैटिन नाम पर रखा गया है जहाँ इसकी खोज हुई। परमाणु संरचना पर उनके बेहतरीन काम के कारण एक कृत्रिम तत्व का नाम #NielsBohr के सम्मान में बोहरियम रखा गया।
1930 के दशक में बोहर ने नाजीवाद से भागकर आए शरणार्थियों की मदद की। डेनमार्क पर जर्मनों के कब्जे के बाद वे हाइजेनबर्ग (वर्नर हाइजेनबर्ग जर्मन सैद्धांतिक भौतिक विज्ञानी, क्वांटम मैकेनिक्स के सिद्धांत के मुख्य अग्रदूतों में से एक और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जर्मन परमाणु कार्यक्रम में एक प्रमुख वैज्ञानिक।) से मिले। सितंबर 1943 में बोहर को खबर मिली कि जर्मन उन्हें गिरफ्तार करने वाले हैं, इसलिए वे भागकर स्वीडन चले गए। वहाँ से उन्हें हवाई जहाज से ब्रिटेन ले जाया गया, जहाँ वे ब्रिटिश ट्यूब अलॉयज परमाणु हथियार प्रोजेक्ट में शामिल हुए और अमेरिका के मैनहट्टन प्रोजेक्ट के लिए ब्रिटिश मिशन का हिस्सा बने। युद्ध के बाद बोहर ने परमाणु ऊर्जा पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग की वकालत की। नील्स बोहर सर्न और डेनिश परमाणु ऊर्जा आयोग के रिसर्च एस्टेब्लिशमेंट रिसो की स्थापना में शामिल रहे और 1957 में नॉर्डिक इंस्टीट्यूट फॉर थ्योरेटिकल फिजिक्स के पहले चेयरमैन बने। 1999 में फिजिक्स वर्ल्ड ने उन्हें अब तक के चौथे सबसे महान भौतिकविद के रूप में नामित किया।
यहां प्रस्तुत हैं नील्स बोहर के कुछ गूढ़, गंभीर, विचारणीय कथन
सभी सबूतों का विवरण क्लासिकल शब्दों में ही बताया जाना चाहिए।, सीधी-सी बात यह है कि प्रयोग शब्द से हमारा मतलब ऐसी स्थिति से है जिसमें हम दूसरों को बता सकें कि हमने क्या किया और क्या सीखा इसलिए, प्रयोग के इंतजाम और उससे मिली जानकारी का ब्यौरा ऐसी साफ भाषा में दिया जाना चाहिए जिसमें क्लासिकल फिजिक्स की शब्दावली का सही इस्तेमाल हो।
किसी एटॉमिक ऑब्जेक्ट के लिए कोई काइनेमैटिक या डायनामिक वैल्यू बताने वाले वाक्यों की सच्चाई इस बात पर निर्भर करती है कि उसमें कौन-सा उपकरण इस्तेमाल हुआ यानी इन वाक्यों की सच्चाई तय करने के लिए प्रयोग के सेटअप और प्रयोग के असल नतीजे, दोनों का जिक्र करना जरूरी है।
एक्सपर्ट वह व्यक्ति होता है जिसने किसी बहुत ही सीमित क्षेत्र में वे सभी गलतियाँ की हों जो की जा सकती हैं।
सही बात का उल्टा गलत बात होती है। लेकिन एक गहरे सच का उल्टा भी एक गहरा सच हो सकता है।
भविष्य के बारे में भविष्यवाणी करना बहुत मुश्किल है।
हम जिसे भी असली कहते हैं, वह ऐसी चीजों से बना है जिन्हें असली नहीं माना जा सकता।
जो लोग पहली बार क्वांटम थ्योरी के बारे में सुनकर हैरान नहीं होते, वे शायद इसे समझ ही नहीं पाए हैं।
कितनी अच्छी बात है कि हमें एक विरोधाभास (पैराडॉक्स) मिला है। अब हमें आगे बढ़ने की कुछ उम्मीद है।
नहीं, नहीं, आप सोच नहीं रहे हैं, आप बस लॉजिकल हो रहे हैं।
कुछ बातें इतनी गंभीर होती हैं कि उन पर हँसना ही पड़ता है।
अपनी बात को उतना ही साफ तौर पर कहें जितना आप सोच सकते हैं।
फिजिसिस्ट असल में एटम का खुद को देखने का एक तरीका है।
भगवान को यह बताना बंद करें कि उन्हें अपने पासे (डाइस) के साथ क्या करना चाहिए।
जिंदगी का मतलब इस बात में है कि यह कहना बेमानी है कि जिंदगी का कोई मतलब नहीं है।
हर बड़ी और गहरी मुश्किल में उसका समाधान भी छिपा होता है। यह हमें समाधान खोजने के लिए अपनी सोच बदलने पर मजबूर करती है।
कुछ सच मामूली होते हैं और कुछ सच बहुत बड़े होते हैं। मामूली सच का उल्टा साफ तौर पर गलत होता है। बड़े सच का उल्टा भी सच होता है।
हम सब इस बात पर सहमत हैं कि आपकी थ्योरी अजीब है। हमारे बीच मतभेद इस बात पर है कि क्या यह इतनी अजीब है कि इसके सही होने की कोई गुंजाइश हो। मुझे लगता है कि यह उतनी अजीब नहीं है।
हमें यह साफ तौर पर समझना चाहिए कि जब एटम की बात आती है, तो भाषा का इस्तेमाल सिर्फ कविता की तरह ही किया जा सकता है। कवि भी तथ्यों का वर्णन करने के बजाय इमेज बनाने और मानसिक संबंध स्थापित करने में ज्यादा दिलचस्पी रखता है।
मेरे कहे हर वाक्य को किसी बात की पुष्टि के तौर पर नहीं, बल्कि एक सवाल के तौर पर समझा जाना चाहिए। आप एक छोटे सच को पहचान सकते हैं क्योंकि उसका उल्टा झूठ होता है। एक बड़े सच का उल्टा एक और सच होता है।
क्वांटम थ्योरी की प्रकृति ही हमें स्पेस-टाइम कोऑर्डिनेशन और कॉजैलिटी (कारण-प्रभाव का संबंध) के दावे को जो क्लासिकल थ्योरी की खासियत हैं विवरण की ऐसी विशेषताओं के रूप में देखने पर मजबूर करती है जो एक-दूसरे की पूरक तो हैं लेकिन अलग-अलग हैं ये क्रमशः अवलोकन और विवरण के आदर्श रूप को दर्शाती हैं।
फिजिक्स इस बारे में नहीं है कि दुनिया कैसी है, बल्कि इस बारे में है कि हम दुनिया के बारे में क्या कह सकते हैं।
हम जिसे भी असली कहते हैं, वह ऐसी चीजों से बना है जिन्हें असली नहीं माना जा सकता। अगर क्वांटम मैकेनिक्स ने आपको गहराई से चैंकाया नहीं है, तो आपने इसे अभी तक समझा नहीं है।
हम भाषा में ही बंधे हुए हैं।
सिर्फ गलत होना ही काफी नहीं है, विनम्र होना भी जरूरी है।
किसी गहरे सच की पहचान यही है कि उसका उल्टा भी एक गहरा सच होता है।
मुझे खुद दुनिया को ऑब्जेक्टिव (वस्तुनिष्ठ) और सब्जेक्टिव (व्यक्तिपरक) पक्षों में बांटना बहुत मनमाना लगता है। सदियों से धर्मों ने जिन छवियों, दृष्टांतों और विरोधाभासों का इस्तेमाल किया है, उनका सीधा सा मतलब है कि जिस वास्तविकता की वे बात करते हैं, उसे समझने का कोई और तरीका नहीं है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वह कोई असली वास्तविकता नहीं है। और इस वास्तविकता को ऑब्जेक्टिव और सब्जेक्टिव पक्षों में बांटने से हमें कोई खास फायदा नहीं होगा।
पाषाण युग इसलिए खत्म नहीं हुआ क्योंकि दुनिया में पत्थर खत्म हो गए थे।
हमारे साथ काम करने के लिए आपको कोपेनहेगन आना होगा। हमें ऐसे लोग पसंद हैं जो असल में थॉट एक्सपेरिमेंट (विचार-प्रयोग) कर सकें! -नील्स बोहर
No, no, you aren’t thinking; you are just being logical – Brief introduction to and thoughts of Nobel Prize-winning Danish theoretical physicist Niels Bohr
समाचार पत्र / पत्रिका प्रकाशन, समाचार पोर्टल, फेसबुक पेज, यूट्यूब चैनल, कंटेंट राइटिंग इत्यादि कार्यों, रिपोर्टर बनने के लिए संदेश के जरिये व्हाट्सऐप 9045290693 पर संपर्क करें। धन्यवाद ! -एपी भारती (पत्रकार, रुद्रपुर, उत्तराखंड)