15 अक्टूबर 1961 को इलाहाबाद में हिंदी साहित्य के छायावाद युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक, कवि, लेखक, संगीतकार और चित्रकार सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ (जन्म नाम सुरजोकुमार तिवारी, पिता का नाम पंडित रामसहाय त्रिपाठी, 21 फरवरी 1899 मेदिनीपुर, बंगाल प्रेसीडेंसी, ब्रिटिश भारत) का निधन हुआ। #SuryakantTripathiNirala को महाप्राण भी कहा गया। उन्होंने निराला उपनाम अपनाया। निराला ने पारंपरिक काव्य-छंदों पर पूरा अधिकार हासिल किया और उनकी कई रचनाएँ इन्हीं छंदों में रची गई हैं। निराला ने हिंदी कविता में मुक्त छंद का प्रयोग करके एक काव्य विधा में क्रांति ला दी, ऐसा करने वाले वे पहले हिंदी कवि थे। उन्होंने पाठकों को दिखाया कि कविता, पंक्तियों के अंत में तुकबंदी न होने पर भी अपनी काव्यात्मक सार और लय बनाए रख सकती है।
साहित्यिक! तुम कहाँ हो? तुम्हें केवल रस-प्रदान करने का अधिकार है, रस-ग्रहण करने का नहीं।
मन, बुद्धि और अहंकार का लय प्रलय है।
बिना इंद्रियों को जीते धर्माचरण निष्फल है।
दुःख को देवता समझो।
नेता? नेता कौन है? मनुष्य? एक मनुष्य सब विषयों की पूर्णता पा सकता है? न। इसीलिए नेता मनुष्य नहीं। सभी विषयों की संकलित ज्ञान-राशि का नाम नेता है।
साथ निवास करने वाले दुष्टों में जल तथा कमल के समान मित्रता का अभाव ही रहता है। सज्जनों के दूर रहने पर भी कुमुद और चंद्रमा के समान प्रेम होता है।
पेट जितना भी भरा रहे, आशा कभी नहीं भरती। वह जीवों को कोई-न-कोई अप्राप्य, कुछ नहीं तो केवल रंगों की माया का इंद्रधनुष प्राप्त करने के मायावी दलदल में फँसा ही देती है।
धन घर रह जाता है तथा बांधव श्मशान में छूट जाते हैं। आत्मा के प्रयाण काल में पाप तथा पुण्य ही जीवात्मा के साथ जाते हैं।
पापों का फल तत्काल समझ में नहीं आता। उसका जहर अवस्था की तरह ठीक अपने समय पर चढ़ता है।
जो गिरना नहीं चाहता, उसे कोई गिरा नहीं सकता।
जिंदा को मुर्दा और मुर्दा को जिंदा समझना भ्रम भी है और ज्ञान भी।
निःसीम काल का सौ वर्ष कितना सा अंश है? मनुष्य की वह परम आयु है अतः वह कैसे सो सकता है?
घी से सिक्त होने पर थोड़ी सी भी अग्नि धधक उठती है। एक बीज हजारों बीजों में परिणत हो जाता है। उत्थान और पतन बहुत अधिक हो सकता है। अतः मनुष्य को अपने थोड़े से धन की भी अवमानना नहीं करना चाहिए।
पेट में जब तक दीनता के पिल्ले कूँ-कूँ करते रहेंगे, मनुष्य को अपनी पहचान अपने आप न होगी, वह किसी ऊँची बात का अर्थ नहीं समझ सकता।
आनंद के समय जितना ही चुप रहा जाए, आनंद उतना ही स्थायी होता है, और तभी उसकी अनुभूति का सच्चा सुख भी प्राप्त होता है।
क्या किसी जात का आदमी तरक्की करके दूसरी जात में नहीं जा सकता?
मनुष्य के अज्ञान की मार मनुष्य ही तो सहते हैं।
असहाय आँखें प्रार्थना की अनिमेष दृष्टि।
लोग पहले किसी सुंदर वस्तु को उत्सुक आँखों से देखते हैं, पर जब किसी दूसरे स्वार्थ की याद आती है, आँखें फेरकर चल देते हैं।
संसार के सहस्रों प्राणों के पावन संगीत तुम्हारी कल्पना से निकलने चाहिए।
वह तोड़ती पत्थर
देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर
वह तोड़ती पत्थर।
कोई न छायादार
पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार
श्याम तन, भर बँधा यौवन,
नत नयन प्रिय, कर्म-रत मन,
गुरु हथौड़ा हाथ,
करती बार-बार प्रहार
सामने तरु-मालिका अट्टालिका, प्राकार।
चढ़ रही थी धूप
गर्मियों के दिन
दिवा का तमतमाता रूप
उठी झुलसाती हुई लू
रुई ज्यों जलती हुई भू,
गर्द चिनगीं छा गईं,
प्रायः हुई दुपहर
वह तोड़ती पत्थर।
देखते देखा मुझे तो एक बार
उस भवन की ओर देखा, छिन्नतार
देखकर कोई नहीं,
देखा मुझे उस दृष्टि से
जो मार खा रोई नहीं,
सजा सहज सितार,
सुनी मैंने वह नहीं जो थी सुनी झंकार
एक क्षण के बाद वह काँपी सुघर,
ढुलक माथे से गिरे सीकर,
लीन होते कर्म में फिर ज्यों कहा
मैं तोड़ती पत्थर। -सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’
Can a person from one caste, through their own progress, move into another caste? Thought-provoking quotes and a poem by Suryakant Tripathi ‘Nirala’ Chhayavadi poet, writer, musician and painter
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