नई दिल्ली। सरकारी तंत्र, सिविल सोसायटी, आम जन और मीडिया प्रायः अदालती मामलों में तारीख पर तारीख जुमला बहुत बोलते हैं, जल्दी न्याय नहीं मिलता इत्यादि, यह जाने बिना कि वास्तविक हाल क्या है। आपको जानना चाहिए कि अदालतों से जल्द फैसले या न्याय क्यों बाहर नहीं आता ?
8वीं कक्षा के लिए एनसीईआरटी की सामाजिक विज्ञान की नयी पाठ्यपुस्तक में कहा गया है कि भ्रष्टाचार, लंबित मुकदमों की बड़ी संख्या और जजों की पर्याप्त कमी न्यायिक प्रणाली के सामने आने वाली चुनौतियों में शामिल हैं। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की नयी किताब के न्यायपालिका में भ्रष्टाचार नामक खंड में कहा गया है कि न्यायाधीश एक आचार संहिता से बंधे होते हैं, जो न केवल अदालत में उनके व्यवहार को नियंत्रित करती है, बल्कि अदालत के बाहर उनके आचरण को भी नियंत्रित करती है। हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिकाश् शीर्षक वाले संशोधित अध्याय में न्यायालयों के पदानुक्रम और न्याय तक पहुंच की व्याख्या करने से आगे बढ़कर न्यायिक प्रणाली के सामने आने वाली चुनौतियों के समाधान तक का जिक्र है।
अध्याय में लिखा है, न्यायपालिका के विभिन्न स्तरों पर लोगों को भ्रष्टाचार का सामना करना पड़ता है। गरीबों और वंचितों के लिए इससे न्याय तक पहुंच का मुद्दा और भी गंभीर हो सकता है। इसलिए न्यायिक प्रणाली में विश्वास और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए राज्य और केंद्र स्तर पर लगातार प्रयास किए जा रहे हैं, जिनमें प्रौद्योगिकी का उपयोग भी शामिल है और जहां भी भ्रष्टाचार के मामले सामने आएं, उनके खिलाफ त्वरित और निर्णायक कार्रवाई की जा रही है। पुस्तक के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में लंबित मुकदमों की अनुमानित संख्या 81000 है, हाईकोर्ट में 62.40 लाख और जिला एवं अधीनस्थ न्यायालयों में 4.70 करोड़ मामले लंबित हैं। पाठ्यपुस्तक में भारत के पूर्व चीफ जस्टिस बीआर गवई का भी उल्लेख किया गया है, जिन्होंने जुलाई 2025 में कहा था कि न्यायपालिका के भीतर भ्रष्टाचार और कदाचार की घटनाओं का जनता के भरोसे पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
असल में देश बहुत बड़ा है, जनसंख्या अथवा जरूरत के मुताबिक जांच के लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। अदालतों की संख्या बहुत कम है। जो अदालतें हैं उनमें भी जजों और दूसरे स्टाफ की जबरदस्त कमी है। अगर समय से सही जांच हो जाए, अदालतों में सुनने के लिए पर्याप्त जज उपलब्ध हों तो न्याय जल्दी मिल सकता है। लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है, यह सरकार की नाकामी है। आगे से जब भी आप अदालतों से जल्द निर्णय न आने की शिकायतें करें उससे पहले जान लें कि ऐसा क्यों हो रहा है।

