
24 मई 1879 को न्यूयॉर्क में अमेरिकी दास-प्रथा विरोधी, पत्रकार और समाज सुधारक विलियम लॉयड गैरिसन (जन्म 10 दिसंबर, 1805, न्यूबरीपोर्ट, मैसाचुसेट्स) विलियम लॉयड गैरिसन का व्यापक रूप से पढ़ा जाने वाला दास-प्रथा विरोधी अखबार द लिबरेटर ऐसी प्रेरक शक्ति था जिसने दास-प्रथा उन्मूलन के आंदोलन को गति दी। गैरिसन ने इस अखबार की शुरुआत 1831 में की थी और 1865 में तेरहवें संविधान संशोधन द्वारा संयुक्त राज्य अमेरिका में दास-प्रथा समाप्त होने तक इसे बोस्टन से प्रकाशित करते रहे। उन्होंने महिलाओं के अधिकारों का समर्थन किया, और 1870 के दशक के दौरान महिलाओं के मताधिकार आंदोलन की एक प्रमुख आवाज बन गए।
1831 में गैरीसन ने, जो प्रेस को राजनीतिक बदलाव लाने का एक जरिया मानते थे, अपने दोस्त आइजैक नैप के साथ मिलकर द लिबरेटर गुलामी-विरोधी साप्ताहिक समाचार पत्र शुरू किया। पहले अंक में, गैरीसन ने कहा, 4 जुलाई, 1829 को पार्क-स्ट्रीट चर्च में मैंने बिना सोचे-समझे धीरे-धीरे गुलामी खत्म करने के लोकप्रिय लेकिन नुकसानदेह सिद्धांत का समर्थन कर दिया था। मैं इस मौके का इस्तेमाल अपनी बात को पूरी तरह और साफ-साफ वापस लेने के लिए कर रहा हूँ, और इस तरह सार्वजनिक रूप से अपने ईश्वर, अपने देश और अपने भाई-बंधुओं, गरीब गुलामों, से माफी माँगता हूँ, क्योंकि मैंने उस समय ऐसी बात कही थी जो डरपोकपन, अन्याय और बेतुकी बातों से भरी थी। मेरी कलम से लिखी ऐसी ही एक बात सितंबर 1829 में बाल्टीमोर के जीनियस ऑफ यूनिवर्सल एमान्सिपेशन में छपी थी। अब मेरा जमीर शांत है। मुझे पता है कि कई लोग मेरी भाषा की सख्ती पर ऐतराज करेंगे, लेकिन क्या सख्ती की कोई वजह नहीं है? मैं सच जितना ही सख्त रहूँगा, और न्याय जितना ही अडिग। इस विषय पर, मैं न तो नरम होकर सोचना चाहता हूँ, न बोलना, और न ही लिखना। नहीं! बिल्कुल नहीं! उस आदमी से कहो जिसका घर जल रहा हो कि वह धीरे से शोर मचाए, उससे कहो कि वह अपनी पत्नी को बलात्कारी के चंगुल से धीरे से बचाए, माँ से कहो कि वह अपने बच्चे को उस आग से धीरे-धीरे बाहर निकाले जिसमें वह गिर गया है, लेकिन मुझसे ऐसे मामले में नरमी बरतने की जिद मत करो। मैं पूरी तरह गंभीर हूँ, मैं अपनी बात से पलटूंगा नहीं, मैं कोई बहाना नहीं बनाऊँगा, मैं एक इंच भी पीछे नहीं हटूंगा, और मेरी बात सुनी जाएगी। लोगों की उदासीनता इतनी ज्यादा है कि कोई भी मूर्ति अपने चबूतरे से कूदकर खड़ी हो जाए और मरे हुए लोग भी जी उठें।
मई 2026 में भारत में बड़ी हलचल है। 15 मई को भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने एक मामले की सुनवाई करते हुए बेरोजगारों की तुलना काकरोचों और परजीवियों से कर दी। मोदी राज में भयंकर बेरोजगारी, कारोबारी मंदी, अल्पआय, जबरदस्त भ्रष्टाचार, परीक्षाओं के पेपर लीक, सांप्रदायिकता, नफरत की आंधी चल रही है तथा अभिव्यक्ति और प्रेस की स्वतंत्रता पर कड़ा प्रतिबंध जैसा है तब अमेरिका के बोस्टन विश्वविद्यालय में महाराष्ट्र के औरंगाबाद (छत्रपति संभाजीनगर) के युवा अभिजीत दीपके ने काकरोच जनता पार्टी एक वेबसाइट के जरिये वर्चुअली बना दी जिससे 2-4 दिन में ही करोड़ों युवा जुड़ गए। काकरोच जनता पार्टी ने विद्यार्थियों और युवाओं के मुद्दे उठाए। इससे देश-विदेश में हलचल मच गई। अपनी भयंकर किरकिरी होने पर भारत सरकार ने एक के बाद एक काकरोच जनता पार्टी के ट्विटर हैंडल, वेबसाइट आदि सोशल मीडिया एकाउंट बंद करवा दिए। ऐसे में पूर्व और वर्तमान के प्रतिरोध के योद्धाओं को याद करना प्रेरणा देता है। दास-प्रथा, अन्याय, अत्याचार, शोषण, दमन, भेदभाव के विरुद्ध संघर्षरत रहे और गुलामी की व्यवस्था को समाप्त करवाने में सफल रहे विलियम लॉयड गैरिसन के प्रेरक, विचारणीय, अनुकरणीय उद्धरण यहां प्रस्तुत हैं।
दास-प्रथा के साथ कोई समझौता नहीं होना चाहिए, बिल्कुल भी नहीं। सिद्धांतों को सुविधा के अधीन करने से कुछ भी हासिल नहीं होता, बल्कि सब कुछ खो जाता है।
मैं सत्य जितना कठोर और न्याय जितना अडिग रहूँगा, मैं पूरी तरह गंभीर हूँ, मैं गोलमोल बातें नहीं करूँगा, मैं कोई बहाना नहीं बनाऊँगा, मैं एक इंच भी पीछे नहीं हटूंगा, और मेरी बात सुनी जाएगी।
हर किसी के साथ निष्पक्ष व्यवहार किया जाना चाहिए, चाहे वह दिखने में कैसा भी हो।
जहाँ कहीं भी कोई इंसान है, मैं उस इंसान में ईश्वर-प्रदत्त अधिकार देखता हूँ, चाहे उसका लिंग या रंग-रूप कुछ भी क्यों न हो।
यदि आप केवल एक इंसान की आजादी को गुलाम बनाते हैं, तो पूरी दुनिया की आजादी खतरे में पड़ जाती है।
मेरा अपराध यह है कि मैं बुराई करने वाली भीड़ के साथ नहीं चलूँगा। मेरी विशिष्टता यह है कि जब मैं कहता हूँ कि आजादी ईश्वर की देन है और दास-प्रथा शैतान की, तो मेरा मतलब ठीक वही होता है जो मैं कहता हूँ। मेरा जुनून यह है कि मैं अमेरिकी लोगों से इस बात पर जोर देता हूँ कि वे या तो दास-प्रथा को समाप्त करें, या फिर मानवाधिकारों की बड़ी-बड़ी बातें करना बंद कर दें।
समझदार लोगों के साथ मैं तर्क-वितर्क करूँगा, दयालु लोगों के साथ मैं विनती करूँगा, लेकिन अत्याचारियों के सामने मैं जरा भी नरमी नहीं बरतूँगा और न ही वहाँ अपने तर्क बर्बाद करूँगा जहाँ उनका कोई असर नहीं होने वाला।
कोई भी इंसान मेरी सहमति के बिना मुझ पर शासन नहीं करेगा। और न ही मैं किसी इंसान पर शासन करूँगा।
जहाँ शक्ति नहीं, वहाँ सुरक्षा नहीं, बिना एकता के शक्ति नहीं, बिना न्याय के एकता नहीं, और जहाँ आस्था और सत्य की कमी हो, वहाँ न्याय नहीं। आजाद रहने का अधिकार एक ऐसा सत्य है जो इंसानों के दिलों में बसा हुआ है।
मुझे पूरी तरह से जोश और उत्साह से भरा रहने की जरूरत है, क्योंकि मेरे चारों ओर बर्फ के ऐसे पहाड़ हैं जिन्हें मुझे पिघलाना है।
हमारा देश ही पूरी दुनिया है, और समस्त मानव जाति ही हमारे देशवासी हैं। हम अपनी जन्मभूमि से उतना ही प्रेम करते हैं, जितना कि हम अन्य सभी देशों से करते हैं। अमेरिकी नागरिकों के हित, अधिकार और स्वतंत्रताएँ हमारे लिए पूरे मानव समाज के हितों, अधिकारों और स्वतंत्रताओं से बढ़कर प्रिय नहीं हैं। इसलिए, हम किसी भी राष्ट्रीय अपमान या चोट का बदला लेने के लिए देशभक्ति की दुहाई देने की अनुमति नहीं दे सकते।
वफादार बनिए, सतर्क रहिए, हर प्रकार के बंधन को तोड़ने के अपने प्रयासों में कभी न थकिए और दबे-कुचले लोगों को आजाद होने दीजिए। चाहे कुछ भी हो जाए, चाहे कितनी भी कीमत चुकानी पड़े, उस झंडे पर, जिसे आप हवा में लहरा रहे हैं, अपने धार्मिक और राजनीतिक आदर्श-वाक्य के रूप में ये शब्द अंकित कर दीजिए, गुलामी से कोई समझौता नहीं! गुलाम-मालिकों के साथ कोई मेल नहीं!
हर एक के लिए, सभी के लिए, और हमेशा के लिए स्वतंत्रता!
हो सकता है कि हम व्यक्तिगत रूप से हार जाएँ, लेकिन हमारे सिद्धांत कभी नहीं हारेंगे!
क्या सही और गलत ऐसे शब्द हैं जिन्हें आपस में बदला जा सकता है, और जो केवल लोगों की राय पर निर्भर करते हैं?
उत्तर और दक्षिण के बीच जो समझौता मौजूद है, वह असल में मौत के साथ एक अनुबंध और नरक के साथ एक इकरारनामा है।
और अब, मैं उस भावना को व्यक्त करना चाहता हूँ जो हमेशा से मेरी आत्मा का मार्गदर्शक जुनून रही है, और हमेशा रहेगी, हर एक के लिए, सभी के लिए, और हमेशा के लिए स्वतंत्रता! भगवान के साथ हमेशा अकेले खड़े रहना बेहतर है, भले ही आपको पागल, आग लगाने वाला, कट्टरपंथी, विधर्मी या नास्तिक कहा जाए, सत्ता में बैठे लोग आपसे नाराज हों और आम जनता आप पर टूट पड़े, या फिर आपको अपमानजनक तरीके से फाँसी पर चढ़ा दिया जाए, जैसे उस व्यक्ति को, जिसकी आत्मा आगे बढ़ रही है, भले ही उसका शरीर कब्र में सड़ रहा हो, या विक्लिफ की तरह आपको खंभे से बांधकर जलाकर राख कर दिया जाए, या उस व्यक्ति की तरह आपको सलीब पर कीलों से जड़ दिया जाए, जिसने खुद को दुनिया के लिए कुर्बान कर दिया था यह सब सही की रक्षा के लिए करना बेहतर है, बजाय इसके कि आप हेरोद की तरह हों, जिसके लिए भीड़ चिल्लाती है, यह तो किसी भगवान की आवाज है, किसी इंसान की नहीं!
तो फिर उन लोगों के बारे में क्या कहा जाए, जो गुलामी के सवाल को नजरअंदाज करने पर अड़े हैं, यह कहकर कि इस जानलेवा झगड़े से गुलामी का कोई लेना-देना नहीं है, और जो यह मानते हैं कि असली मुद्दा तो बस सरकार का समर्थन करना और यूनियन (संघ) को बचाए रखना है? यकीनन, वे मूर्ख और अंधेष् हैं क्योंकि ये गुलामों के मालिक ही हैं, जिन्होंने मिलकर एक (सरकार) पर कब्जा करने और दूसरे (यूनियन) को उखाड़ फेंकने की साजिश रची है। जब तक इस धरती पर किसी एक भी इंसान को गुलाम बनाने की इजाजत रहेगी, तब तक भगवान का अभिशाप इस धरती पर बना रहेगा।
मैं सच की तरह कठोर और न्याय की तरह अडिग रहूँगा।
मुझे पता है कि बहुत से लोगों को मेरी भाषा की सख्ती पर एतराज है, लेकिन क्या इस सख्ती का कोई कारण नहीं है?
इसने गुलामी ने, अमेरिकी चर्च पर पूरी तरह से अपना कब्जा जमा लिया है, बाइबल को अपने हाथों में लेकर, वहाँ के पादरियों ने यह साबित करने की कोशिश की है कि गुलामी तो सीधे भगवान की तरफ से, स्वर्ग से आई है। वे खुद गुलामों के मालिक और इंसानी जिस्मों के सौदागर बन बैठे हैं।
बदनाम और दुष्ट लोगों के विचारों और तौर-तरीकों पर हमला करने के लिए ज्यादा हिम्मत की जरूरत नहीं होती, लेकिन महान और अच्छे लोगों को उनके बर्ताव के लिए टोकना, और उनकी समझ-बूझ पर सवाल उठाना, यह ही नैतिक साहस की सबसे बड़ी मिसाल है।
जो चीज न्यायसंगत नहीं है, वह कानून नहीं हो सकती। -विलियम लॉयड गैरिसन
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