
जो जीवन की धूल चाट कर बड़ा हुआ है
जो जीवन की धूल चाट कर बड़ा हुआ है
तूफानों से लड़ा और फिर खड़ा हुआ है
जिसने सोने को खोदा लोहा मोड़ा है
जो रवि के रथ का घोड़ा है
वह जन मारे नहीं मरेगा
नहीं मरेगा
जो जीवन की आग जला कर आग बना है
फौलादी पंजे फैलाए नाग बना है
जिसने शोषण को तोड़ा शासन मोड़ा है
जो युग के रथ का घोड़ा है
वह जन मारे नहीं मरेगा
नहीं मरेगा।
-केदारनाथ अग्रवाल
लौह का घन गल रहा है
वह थका, हारा, बहुत ऊबा मनुज है!
भूमि उसको प्रिय नहीं है।
वर्ग के संघर्ष से वह काँपता है,
दूर उसके क्षेत्र से ही भागता है।
वह पुरानी सभ्यता के राज-पथ पर
पेट के बल मंद गति से रेंगता है,
श्वान के संग भूख अपनी मेटता है,
शासकों के कटु दमन की यंत्रणा से,
शोषकों के अपहरण की यातना से,
रक्त के कुल्ले उगल कर मर रहा है,
लाश अपनी ढो रहा है।
वह कला के, काव्य के डैने लगा कर,
सांत्वना की प्राप्ति के हित,
कल्पना के नील नभ में
प्राण अपने खो रहा है।
वह नहीं जग जीत सकता,
वह नहीं इतिहास को
जीवन-रुधिर से सींच सकता।
मौन मन वह सह रहा है
जो यहाँ पर हो रहा है,
लौह का घन
मोम के दीपक सदृश ही गल रहा है।
-केदारनाथ अग्रवाल
(केदारनाथ अग्रवाल प्रोग्रेसिव राइटर्स मूवमेंट से प्रेरित वामपंथी प्रगतिशील लेखक संघ के सदस्य थे। उनकी रचनाओं का अंग्रेजी, जर्मन, रूसी सहित कई भाषाओं में अनुवाद किया गया। जन्म 1 अप्रैल 1911 निधन 22 जून 2000)
On the death anniversary of the eminent Hindi poet Kedarnath Agrawal, here are two of his poems in his honor
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