
जब ताकतवर आदमी ने कहा
कि उसे और भी ताकत चाहिए
तो मुझे अपनी दुर्बल भंगुर देह दिखाई दी
जो शाम होते-होते थकान से चूर हो जाती थी और आराम चाहती थी
जब ताकतवर आदमी ने कहा कि वह गरीब माँ का बेटा पैदा हुआ
और यहाँ तक पहुँच गया
तो मुझे याद आई वह मेरी माँ जो अब दुनिया में नहीं है
जिसके योग्य बनने में मेरी पूरी उम्र निकल गई
जब ताकतवर आदमी ने कहा कि तमाम लोग उससे बेहद खघ्ुश हैं
तो मुझे हवा में बहुत से चेहरे तैरते हुए दिखाई दिए
जो लगता था कहीं न कही मुझसे रूठे हुए हैं
और मेरी किसी गलती की ओर इशारा कर रहे हैं
जब ताकतवर आदमी ने लगभग रोते हुए कहा
कि उसने देश के लिए घर त्याग दिया शादी नहीं की
तो मैंने सोचा मैं कितना खुशनसीब था
कि रात को लौटने के लिए मुझे एक जगह नसीब हुई
एक भली-सी पत्नी मिली
जिसने अपने प्रेम के एवज में मुझसे कुछ नहीं चाहा
जब ताकतवर आदमी ने कहा
कि उसे देश के शत्रुओं से घृणा है
और उनमें से बहुत से लोग देश के भीतर ही छिपे हुए है
तो मुझे गहरी चिंता हुई
कि कहीं मनुष्य के प्रति मेरे भीतर प्रेम घटने न लग जाए
जब ताकतवर आदमी ने परेशान होकर कहा
कि बहुत से लोग मेरी जान के पीछे पड़े हैं
वे मुझे मार देना चाहते हैं
तो मैंने अपने मामूली से अस्तित्व के बारे में सोचा
जिसे सँवारने में कितने ही हाथों ने मदद की
जब ताकतवर आदमी ने एक रात संदेश प्रसारित किया
कि वह अभी कई साल ताकतवर बने रहना चाहता है
तो मैंने सुबह उठकर किसी अज्ञात से प्रार्थना की
बस आज के दिन बचा रहे मेरा यह धुँधला-सा जीवन।
-मंगलेश डबराल (प्रख्यात हिंदी पत्रकार, जनसत्ता में फीचर संपादक, कई अन्य प्रकाशनों में संपादक, प्रमुख हिंदी कवि, जन्म 16 मई 1948 टिहरी गढ़वाल, उत्तराखंड)
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