31 जुलाई 1880 को लमही, वाराणसी में प्रेमचंद (धनपत राय श्रीवास्तव) का जन्म हुआ। प्रेमचंद हिंदी और उर्दू यथार्थवादी सामाजिक कथा साहित्य के अग्रणी, जातिगत पदानुक्रम और महिलाओं और मजदूरों की दुर्दशा के बारे में लिखने वाले पहले लेखकों में से एक भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे प्रसिद्ध लेखकों में से एक हैं। #Premchand के उपन्यासों में गोदान, कर्मभूमि, गबन, मानसरोवर आदि अनेक उपन्यास शामिल हैं। उन्होंने 1907 में सोज-ए-वतन (राष्ट्र का दुःख) नामक पुस्तक में पांच लघु कहानियों का अपना पहला संग्रह प्रकाशित किया। प्रेमचंद के कार्यों में एक दर्जन से अधिक उपन्यास, लगभग 300 कहानियां, कई निबंध और कई भारतीय और विदेशी साहित्यिक कृतियों का हिंदी में अनुवाद शामिल हैं। प्रेमचंद ने कहानियों, उपन्यासों के अतिरिक्त विविध विषयों पर लेख भी लिखे, पत्रकारिता, प्रकाशन और संपादन भी किया। धनपत राय सरकारी नौकरी में थे, भारत पर अंग्रेजों का शासन था, इसलिए उन्होंने अपना अधिकांश लेखन प्रेमचंद के छद्म नाम से किया। यही नाम बाद में स्थापित हो गया। यहां पेश हैं प्रेमचंद के कुछ प्रेरक, तीखे, विचारोत्तेजक उद्धरण
आप सीढ़ियों पर पाँव रखे बगैर छत की ऊँचाई तक नहीं पहुँच सकते।
धर्म का मुख्य स्तंभ भय है।
नारी केवल माता है, और इसके उपरांत वह जो कुछ है, वह सब मातृत्व का उपक्रम मात्र। मातृत्व संसार की सबसे बड़ी साधना, सबसे बड़ी तपस्या, सबसे बड़ा त्याग और सबसे महान विजय है। एक शब्द में उसे लय कहूँगा, जीवन के व्यक्तित्व का और नारीत्व का भी।
स्त्रियों की कोमलता पुरुषों की काव्य-कल्पना है।
अतीत चाहे दुखद ही क्यों न हो, उसकी स्मृतियाँ मधुर होती हैं।
स्त्री और पुरुष में मैं वही प्रेम चाहता हूँ, जो दो स्वाधीन व्यक्तियों में होता है। वह प्रेम नहीं, जिसका आधार पराधीनता है।
आत्मा की हत्या करके अगर स्वर्ग भी मिले, तो वह नरक है।
प्रेम सीधी-सादी गऊ नहीं, खूँखार शेर है, जो अपने शिकार पर किसी की आँख भी नहीं पड़ने देता।
क्रोध अत्यंत कठोर होता है। वह देखना चाहता है कि मेरा एक वाक्य निशाने पर बैठता है या नहीं, वह मौन को सहन नहीं कर सकता।
साहित्य अपने काल का प्रतिबिंब होता है। जो भाव और विचार लोगों के हृदयों को स्पंदित करते हैं, वही साहित्य पर भी अपनी छाया डालते हैं।
मक्कार आदमी को अपनी भावनाओं पर जो अधिकार होता है, वह किसी बड़े योगी के लिए भी कठिन है। उसका दिल रोता है मगर होंठ हँसते हैं, दिल खुशियों से मजे लेता है मगर आँखें रोती हैं, दिल डाह की आग से जलता है, मगर जुबान से शहद और शक्कर की नदियाँ बहती हैं।
आदमी अकेला भी बहुत कुछ कर सकता है। अकेले आदमियों ने ही आदि से विचारों में क्रांति पैदा की है। अकेले आदमियों के कृत्यों से सारा इतिहास भरा पड़ा है।
ईर्ष्या से उन्मत स्त्री कुछ भी कर सकती है, उसकी आप शायद कल्पना भी नहीं कर सकते।
कवि या साहित्यकार में अनुभूति की जितनी तीव्रता होती है, उसकी रचना उतनी ही आकर्षक और ऊँचे दर्ज की होती है।
साहित्य की बहुत-सी परिभाषाएँ की गई हैं, पर मेरे विचार से उसकी सर्वोत्तम परिभाषा ‘जीवन की आलोचना’ है। चाहे वह निबन्ध के रूप में हो, चाहे कहानियों के, या काव्य के, उसे हमारे जीवन की आलोचना और व्याख्या करनी चाहिए।
जो धर्म हमारी आत्मा का बंधन हो जाए, उससे जितनी जल्दी हम अपना गला छुड़ा लें उतना ही अच्छा है।
किसी को भी दूसरे के श्रम पर मोटे होने का अधिकार नहीं है। उपजीवी होना घोर लज्जा की बात है। कर्म करना प्राणी मात्र का धर्म है।
अपमान को निगल जाना चरित्र-पतन की अंतिम सीमा है।
धर्म का मूल तत्त्व आत्मा की एकता है। जो आदमी इस तत्त्व को नहीं समझता, वह वेदों और शास्त्रों का पंडित होने पर भी मूर्ख है, जो दुखियों के दुःख से दुःखी नहीं होता, जो अन्याय को देखकर उत्तेजित नहीं होता, जो समाज में ऊँच-नीच, पवित्र अपवित्र के भेद को बढ़ाता है, वह पंडित होकर भी मूर्ख है।
जीवन की दुर्घटनाओं में अक्सर बड़े महत्त्व के नैतिक पहलू छिपे हुआ करते हैं।
प्रकृति से अपने जीवन का सुर मिलाकर रहने में हमें इसीलिए आध्यात्मिक सुख मिलता है कि उससे हमारा जीवन विकसित और पुष्ट होता है।
धर्म ईश्वरीय कोप है, दैवीय वज्र है, जो मानव जाति के सर्वनाश के लिए अवतरित हुआ है।
साहित्य हमारे जीवन को स्वाभाविक और स्वाधीन बनाता है।
पश्चात्ताप के कड़वे फल कभी न कभी सभी को चखने पड़ते हैं
पसीने की कमाई खाने वालों का दिवाला नहीं निकलता, दिवाला उन्हीं का निकलता है जो दूसरों की कमाई खा-खाकर मोटे होते हैं।
जन-समूह विचार से नहीं, आवेश से काम करता है। समूह में ही अच्छे कामों का नाश होता है और बुरे कामों का भी।
शहर अमीरों के रहने और क्रय-विक्रय का स्थान है। उसके बाहर की भूमि उनके मनोरंजन और विनोद की जगह है।
संपत्ति और सहृदयता में वैर है।
गरीबी की जिल्लत नहीं रहती, अगर अजनबियों में जिंदगी बसर की जाए। यह जानने-पहचानने वालों की कर्नाखयाँ और कनबतियाँ हैं जो गरीबी को यंत्रणा बना देती हैं।
डरपोक प्राणियों में सत्य भी गूँगा हो जाता है।
यह जमाना खुशामद और सलामी का है। तुम विद्या के सागर बने बैठे रहो, कोई सेंत भी न पूछेगा।
निर्भीकता स्वतंत्रता की पहली सीढ़ी है।
पुस्तक पढ़ना तो चाहते हैं, पर गाँठ का पैसा खघ्र्च करके नहीं। जिनकी माकूल आमदनी है वह भी पुस्तकों की भिक्षा माँगने में नहीं शरमाते।
हम इतने बड़े आदमी हो गए हैं कि हमें नीचता और कुटिलता में ही निःस्वार्थ और परम आनंद मिलता है। हम देवतापन के उस दर्जे पर पहुँच गए हैं जब हमें दूसरों के रोने पर हँसी आती है। इसे तुम छोटी साधना मत समझो।
काम करके कुछ उपार्जन करना शर्म की बात नहीं, दूसरों का मुँह ताकना शर्म की बात है।
अभिव्यक्ति मानव हृदय का स्वाभाविक गुण है।
मैं प्रकृति का पुजारी हूँ और मनुष्य को उसके प्राकृतिक रूप में देखना चाहता हूँ, जो प्रसन्न होकर हँसता है, दुखी होकर रोता है और क्रोध में आकर मार डालता है। जो दुःख और भूख दोनों का दमन करते हैं, जो रोने को कमजोरी और हँसने को हल्कापन समझते हैं, उनसे मेरा कोई मेल नहीं। जीवन मेरे लिए आनंदमय कीड़ा है। सरल, स्वच्छंद, जहाँ कुत्सा, ईर्ष्या, और जलन के लिए कोई स्थान नहीं।
गँवारों की धर्मं-पिपासा इंट-पत्थर पूजने से शांत हो जाती है, भद्रजनों की भक्ति सिद्ध पुरुषों की सेवा से।
ईमान का सबसे बड़ा शत्रु अवसर है।
हमारे किसानों की निरक्षरता की दुहाई देना एक फैशन-सा हो गया है, लेकिन किसान निरक्षर होकर भी बहुत से साक्षरों से ज्यादा चतुर है। साक्षरता अच्छी चीज है और उससे जीवन की कुछ समस्याएँ हल हो जाती हैं, लेकिन यह समझना कि किसान निरा मूर्ख है, उसके साथ अन्याय करना है। वह परोपकारी है, त्यागी है, परिश्रमी है, किफायती है, दूरदर्शी है, हिम्मत का पूरा है, नीयत का साफ है, दिल का दयालु है, बात का सच्चा है, धर्मात्मा है, नशा नहीं करता, और क्या चाहिए। कितने साक्षर हैं जिनमें ये गुण पाए जाएँ। हमारा तजरबा तो ये है कि साक्षर होकर आदमी काइयाँ, बदनीयत, कानूनी और आलसी हो जाता है।
युवा काल की आशा पुआल की आग है जिसके जलने और बुझने में देर नहीं लगती।
बहुत विद्वान होने से मनुष्य आत्मिक गौरव नहीं प्राप्त कर सकता। इसके लिए सच्चरित्र होना परमावश्यक है। चरित्र के सामने विद्वत्ता का मूल्य बहुत कम है।
हम भी दान देते हैं, कर्म करते हैं। लेकिन जानते हो क्यों? केवल अपने बराबर वालों को नीचा दिखाने के लिए। हमारा दान और धर्म कोरा अहंकार है, विशुद्ध अहंकार।
उदासीनता बहुधा अपराध से भी भयंकर होती है।
संसार को तुम जैसे साधकों की जरूरत है, जो अपनेपन को इतना फैला दें कि सारा संसार अपना हो जाए। संसार में अन्याय की, आतंक की, भय की दुहाई मची हुई है। अंधविश्वास का, कपट-धर्म का, स्वार्थ का प्रकोप छाया हुआ है। तुमने वह आर्त-पुकार सुनी है। तुम भी न सुनोगे, तो सुनने वाले कहाँ से आएँगे?
गरीबों में अगर ईर्ष्या और बैर है तो स्वार्थ के लिए या पेट के लिए। ऐसी ईर्ष्या और बैर को मैं क्षम्य समझता हूँ। हमारे मुँह की रोटी कोई छीन ले तो उसके गले में उँगली डालकर निकालना हमारा धर्म हो जाता है। अगर हम छोड़ दें, तो देवता हैं। बड़े आदमियों की ईर्ष्या और बैर केवल आनंद के लिए हैं।
संयम वह मित्र है, जो जरा देर के लिए चाहे आँखों से ओझल हो जाए, पर धारा के साथ बह नहीं सकता, संयम अजेय है, अमर है।
खूबसूरती को गहनों की जरूरत नहीं होती. कोमलता आभूषणों का भार नहीं सह सकती।
जिस तरह सूखी लकड़ी जल्दी से जल उठती है, उसी तरह क्षुधा (भूख) से पानी निकलता है, इंसान जरा-जरा सी बात पर तिनक जाता है।
संसार जिसे दुःख कहता है वह कवि के लिए वास्तव में आनन्द है।
वह प्रेम जिसका लक्ष्य मिलन है, प्रेम नहीं वासना है।
अतीत के सुखों और वर्तमान के दुखों और भविष्य के विनाश के लिए वरदानों से अधिक मनोरंजन और कोई प्रसंग नहीं होता।
स्त्री पृथ्वी की भाँति धैर्यवान है, शांिन्-सम्पन्न है, सहिष्णु है। पुरुष में नारी के गुण आ जाते हैं, तो वह महात्मा बन जाता है। नारी में पुरुष के गुण आ जाते हैं तो वह कुलटा हो जाती है।
हमें कोई दोनों जून खाने को दे, तो हम आठों पहर भगवान का जाप ही करते रहेंगे।
जीत कर आप अपने धोखेबाजों की डींग मार सकते हैं, जीत में सब-कुछ माफ है। हार की लज्जा तो पी जाने की ही वस्तु है।
जिन वृक्षों की जड़ें गहरी होती हैं, उन्हें बार-बार सींचने की जरूरत नहीं होती।
मासिक वेतन तो पूर्णमासी का चाँद है, जो एक दिन में आता है और घटते-घटते लुप्त हो जाता है।
बच्चों के लिए पिता एक फालतू-सी चीज, एक विलास की वस्तु है, जैसे घोड़े के लिए चने या बाबूओं के लिए मोहनभोग। माँ रोटी-दाल है। मोहनभोग उम्र-भर न मिले तो किसका नुकसान है, मगर एक दिन रोटी-दाल के दर्शन न हों, तो फिर देखें, क्या होता है।
धर्म और अधर्म, सेवा और परमार्थ के झमेलों में पढ़कर मैंने बहुत चुनौती दी। मैंने देखा कि दुनिया, दुनिया के लिए है, जो अवसर और काल देखने का काम करते हैं। सिद्धांतवादियों के लिए यह उपयुक्त स्थान नहीं है।
उदासों के लिए स्वर्ग भी उदास है।
मृत्यु इसलिये नहीं आएगी क्योंकि तुमने उसे बुलाया है।
पुरुष में कुछ-कुछ ऐसा जानवर होता है, जिसे वह इरादा करके भी नहीं हटा सकता, पशु पुरुष उसका नाम है। विकास के क्रम से वह महिला से पीछे है। जिस दिन वह पूर्ण विकास कोसगा, वह भी महिला होगी। वात्सल्य, स्नेह, कोमलता, दया, मित्रता के आधार पर यह सृजन थमी हुई है और यह मनोरंजन के गुण हैं।
लाइफ एक दीर्घकालिक कंपनी का व्यवसाय और क्या है!
एक छोटे से बीज पर मंडराती चिड़िया अंततः बीज पर गिर पड़ी। उसका जीवन कैसे समाप्त होगा, पिंजरे में या कसाई की चाकू के नीचे, कौन जानता है कि क्या होगा?
लज्जा ने हमेशा वीरों की पूजा की है।
न्याय और नीति सब लक्ष्मी के ही खिलौने हैं। वह जैसी इच्छाएँ हैं, नचाती हैं।
विज्ञान का उपासक कहता है कि शरीर से एक सूक्ष्म तेज निकल जाता है। कल्पना विज्ञान के भक्तों का कहना है कि महत्वपूर्ण सार आंखों से, मुंह से, सिर के ऊपर से निकल सकता है। कोई उनसे पूछे कि जब कोई तरंग अवशोषित होती है तो क्या चिंगारी निकलती है? जब कोई ध्वनि लुप्त हो रही हो तो क्या वह अवतरित हो जाती है? यह उस अंतहीन यात्रा के दौरान महज एक विश्राम है, न कि जहां यात्रा समाप्त होती है, बल्कि जहां यह नए सिरे से शुरू होती है।
जीवन में सफल होने के लिए आपको शिक्षा की आवश्यकता है, साक्षरता और डिग्री की नहीं।
विश्वास प्यार की पहली सीढ़ी है.
विश्वास से विश्वास और अविश्वास से अविश्वास पैदा होता है। यह स्वाभाविक है।
कायरता की तरह बहादुरी भी संक्रामक होती है। -प्रेमचंद
Fear is the main pillar of religion—thought-provoking quotes from Premchand, the eminent storyteller, novelist, thinker, guide, organizer, journalist, Editor
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