
22 अक्टूबर 1870 को रूस के वोरोनिश में इवान अलेक्सेयेविच बुनिन का जन्म हुआ। इवान बुनिन साहित्य में नोबेल पुरस्कार पाने वाले पहले रूसी लेखक बने। उन्हें अपनी उस कलात्मकता के लिए जाना जाता था, जिसके जरिए उन्होंने गद्य और पद्य लेखन में शास्त्रीय रूसी परंपराओं को आगे बढ़ाया। #IvanBunin की कविताओं और कहानियों की रचना जिसे बुनिन ब्रोकेड (बुनिन की कशीदाकारी) भी कहा गया को रूसी भाषा की सबसे समृद्ध रचनाओं में से एक माना जाता है। इवान बुनिन मुख्य रूप से अपने लघु उपन्यासों द विलेज और ड्राई वैली आत्मकथात्मक उपन्यास द लाइफ ऑफ अर्सेनिएव लघु कथा संग्रह डार्क एवेन्यूज और 1917-1918 की डायरी कर्स्ड डेज के लिए जाने जाते हैं। कुछ लोग उन्हें लियो टॉल्स्टॉय और अंतोन चेखव द्वारा स्थापित रूसी साहित्य की यथार्थवादी परंपरा का उत्तराधिकारी मानते थे। इवान बुनिन जाहिरा तौर पर समाजवाद, साम्यवाद और मार्क्सवाद विरोधी नजर आते हैं। कर्स्ड डेज और सदर्न वर्ड में छपे बुनिन के लेख इसी बात पर जोर देते हैं, क्रांतियों को बेहद तीखी नफरत और बेहद तीखी तिरस्कार की भावना से देखा जाना चाहिए। 1952 में लिखी अपनी आत्मकथा में उन्होंने बताया कि वे एक पुराने और कुलीन परिवार से आते हैं, जिसने रूस को राजनीति और कला के क्षेत्र में कई महान हस्तियां दी हैं। इनमें 19वीं सदी की शुरुआत के दो कवि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं, अन्ना बुनिन और वासिली जुकोवस्की। वासिली जुकोवस्की रूसी साहित्य के महान नामों में से एक थे, जो अथानास बुनिन और तुर्क मूल की सलमा के पुत्र थे।
2 मई 1953 को, बुनिन ने अपनी डायरी में एक नोट लिखा, जो उनकी अंतिम प्रविष्टि दर्ज हुई। उन्होंने लिखा, फिर भी, यह कितना अद्भुत और चौंकाने वाला है। बहुत जल्द मेरा अस्तित्व नहीं रहेगा, दुनिया की तमाम चीजों, तमाम मामलों और नियतियों से मैं पूरी तरह अनजान हो जाऊंगा! और यहाँ मेरे पास बस यही करने को बचा है कि मैं जानबूझकर खुद को डर और विस्मय के भाव में डालने की कोशिश करूँ।
इवान बुनिन के विचारों को जानिए और आप खुद तय कीजिए
इस तरह के सार्वजनिक प्रदर्शन किसी विचारशील व्यक्ति की नजरों से बोल्शेविक (साम्यवादी) व्यवस्था वाले जीवन के बढ़ते खालीपन और भयावहता को छिपा नहीं सकते। बुनिन को लगता है कि नए सोवियत जीवन के भद्देपन और दिखावे में आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता कब्र की ओर जाता है।
क्रांतिकारी वर्षगाँठों और उपलब्धियों का जश्न मनाना सम्मान का मजाक उड़ाता है यहाँ हत्यारे, पाखंडी और यौन रोगों से ग्रस्त युवा समाजवाद के नायक बन जाते हैं और दुनिया के सामने सोवियत मुक्ति का ढिंढोरा पीटते हैं।
कहना एक बात है, और करना बिल्कुल दूसरी बात।
साल बीतते गए, दशक गुजर गए। लेकिन अब इसे और टाला नहीं जा सकता या तो अभी, या फिर कभी नहीं। यह आखिरी मौका है, जिसका फायदा उठा लेना चाहिए, क्योंकि अब बहुत देर हो चुकी है और कोई मेरी मदद के लिए नहीं आएगा।
सब लोग उस गीत के जादू में खोकर चुप हैं। लेकिन यह अजीब बात है, उस गीत में जो गहरा दुख और तीखी शिकायत झलकती है, वह सबसे बेहतरीन और सबसे तीव्र खुशी से भी कहीं ज्यादा मीठी है।
अक्टूबर में मैंने उससे अपने प्यार का इजहार किया, और उसने मुझे उसे चूमने की इजाजत दे दी।
हाँ, साल-दर-साल, दिन-प्रतिदिन, हमारे दिल की गहराइयों में हम बस एक ही चीज का इंतजार करते रहते हैं – एक ऐसी मुलाकात, जो अपने साथ खुशी और प्यार लाएगी। सच कहें तो, हम इसी उम्मीद के सहारे जीते हैं – और यह कितनी व्यर्थ है!
जवानी तो सबके जीवन से गुजर जाती है, लेकिन प्यार .. वह बिल्कुल अलग चीज है।
वे झूठ बोले बिना नहीं रह सकते वे अपने झूठ में और भी बातें जोड़ते जाते हैं, जानी-मानी झूठी बातों को और बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं। और वे ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि उनके भीतर एक तड़प होती है कि सब कुछ ठीक वैसा ही हो, जैसा वे शिद्दत से चाहते हैं। वे किसी बुखार में धुन सवार होने की तरह बड़बड़ाते रहते हैं और जब मैं उनकी ये बातें सुनता हूँ, तो उन्हें बड़ी उत्सुकता से ग्रहण कर लेता हूँ और खुद भी उसी रंग में रंग जाता हूँ।
यह कहना बहुत कड़वा लग सकता है, लेकिन यही सच है अगर आम लोगों की जिंदगी में मुसीबतें न होतीं, तो हमारे हजारों बुद्धिजीवी लोग बेहद दुखी होते। वरना वे खाली बैठकर विरोध कैसे जताते? वे किस बात पर रोते और किस बारे में लिखते? आम लोगों के बिना, उनके लिए जिंदगी, जिंदगी ही नहीं होती। दोस्तोयेव्स्की ने एक बार कहा था, सभी शिक्षकों को पुराने समाज को नष्ट करने और एक नया समाज बनाने का पूरा मौका दे दीजिए, तो नतीजा यह होगा कि चारों ओर इतना अंधेरा, इतनी अराजकता, इतनी अभूतपूर्व असभ्यता, अंधी मानसिकता और अमानवीयता फैल जाएगी कि पूरी व्यवस्था पूरी होने से पहले ही इंसानों की बददुआओं के बोझ तले ढह जाएगी।
आपको कभी खाली नहीं बैठना चाहिए, आपको हमेशा काम करते रहना चाहिए। अपनी पूरी जिंदगी।
हर कोई कितनी शिद्दत से चाहता है कि बोल्शेविक खत्म हो जाएं! बाइबल में बताई गई सबसे भयानक सजा भी उनके लिए कम ही लगेगी। अगर शैतान खुद शहर में आ धमके और उसकी गर्दन तक बोल्शेविकों का खून लगा हो, तो ओडेसा के आधे लोग खुशी से रो पड़ेंगे।
चारों तरफ इतना झूठ बोला जा रहा है कि मेरा मन करता है चीख पड़ूं। मेरे सभी दोस्त, मेरे सभी परिचित जिनके बारे में मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि वे झूठे हो सकते हैं, वे अब हर कदम पर झूठ बोल रहे हैं।
अब सभी घरों में अंधेरा है। चोरों के अड्डों को छोड़कर पूरा शहर अंधेरे में डूबा हुआ है। वहां बालालाइका (एक वाद्य यंत्र) की धुनें सुनाई देती हैं, चमकते हुए झूमर दिखाई देते हैं, और दीवारें काले बैनरों से ढकी हैं, जिन पर सफेद खोपड़ियां बनी हैं और लिखा है बुर्जुआ (पूंजीपतियों) की मौत हो, मौत हो!
इतने गुस्से से तो इंसान खुद को फांसी ही लगा ले!
मजदूर गुस्से और एक तरह की कुटिल खुशी से हांफने लगा। यह तो बहुत कम है! यह बहुत ही कम है! उसने कहा। जाहिर है, उसके लिए बोल्शेविक ही असली मजदूर-किसान शक्ति थे। वे लोगों की सबसे प्यारी उम्मीदों को सच कर रहे थे। हर कोई जानता है कि इन लोगों की कैसी उम्मीदें हैं, क्योंकि उन्हें दुनिया पर राज करने और तमाम संस्कृति, कानून, सम्मान, अंतरात्मा, धर्म और कला की बागडोर संभालने के लिए कहा गया है।
मुझे एक बूढ़ा मजदूर याद है, जो उस इमारत के गेट के पास खड़ा था जहां कभी ओडेसा न्यूज का दफ्तर हुआ करता था। यह वह पहला दिन था जब बोल्शेविकों ने सत्ता पर कब्जा किया था। अचानक लड़कों की एक भीड़ फाटकों के पीछे से निकली, जिनके हाथों में ताजी छपी इजवेस्टिया (अखबार) के ढेर थे। वे चिल्ला रहे थे, ओडेसा के बुर्जुआ (अमीर वर्ग) को सरकार को 50 करोड़ रूबल देने होंगे!
क्रांति की एक सबसे खास पहचान यह होती है कि इसमें दिखावे, छल-कपट, बनावटीपन और कठपुतली के तमाशों की एक बेतहाशा भूख होती है। इंसान के भीतर का बंदर जाग गया है। और मौत के ये सपने? हमारे छोटे से जीवन में मौत कितनी बड़ी जगह घेर लेती है! और सालों की तो बात ही छोड़िए हम दिन-रात मौत के एक उन्माद में जी रहे हैं। वे किसी उज्ज्वल भविष्य की बातें करते रहते हैं, जो शायद इस शैतानी अंधेरे से निकलकर आएगा। इस धरती पर ऐसे विशेषज्ञों और ठेकेदारों की एक पूरी फौज आ गई है, जो इंसानी भलाई को अपने हिसाब से गढ़ना चाहती है।
क्या इसका मतलब यह है कि आप क्रांति के खिलाफ हैं? ये सारी क्रांतियाँ कितनी एक जैसी होती हैं! फ्रांसीसी क्रांति के दौरान, अचानक नए प्रशासनिक संस्थानों की एक गहरी खाई सी खुल गई थी। आदेशों और निर्देशों की मानो बाढ़ आ गई। कमिसारों (अधिकारियों) की संख्या आखिर उन्हें कमिसार ही क्यों कहा जाता था? और अन्य तरह के सत्ताधारियों का तो कोई अंत ही नहीं था कमेटियाँ, यूनियनें और पार्टियाँ कुकुरमुत्तों की तरह उग आईं और हर कोई एक-दूसरे को निगलने पर उतारू हो गया।
लोगों ने इसे तब बहुत सख्ती और क्रूरता से दिखाया, जब उन्होंने अनंतिम सरकार (प्रोविजनल गवर्नमेंट), संविधान सभा और जैसा कि आपने खुद कहा है उन सभी चीजों को, जिनके लिए बेहतरीन रूसी पीढ़ियाँ कुर्बान हो गईं, शैतान के हवाले कर दिया और इसमें आपकी जीत का अंत भी शामिल था। -इवान बुनिन
The laborer began to pant with a mixture of anger and a kind of malicious glee — the views of Ivan Bunin, the first Russian author to win the Nobel Prize in Literature and an opponent of socialism
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