
5 मई 1818 को ट्रियर, जर्मनी में कार्ल मार्क्स का जन्म हुआ। कार्ल मार्क्स जर्मन दार्शनिक, राजनीतिक विचारक, अर्थशास्त्री, पत्रकार और क्रांतिकारी समाजवादी, संगठनकर्ता और नेतृत्वकर्ता बने। उन्होंने ऐतिहासिक भौतिकवाद का सिद्धांत विकसित किया, जिसमें पूंजीवाद के तहत वर्ग संघर्ष का विश्लेषण किया गया और सर्वहारा वर्ग द्वारा इस व्यवस्था को उखाड़ फेंककर साम्यवाद की स्थापना पर जोर दिया गया। मार्क्स ने अपने अभिन्न मित्र फ्रेडरिक एंगेल्स के साथ मिलकर द कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो (1848) का लेखन किया जिसने दुनिया भर में तहलका मचा दिया। अपनी महान कृति दास कैपिटल (1867दृ1894) में शास्त्रीय राजनीतिक अर्थव्यवस्था की आलोचना प्रस्तुत की। मार्क्स के विचार और उनका बाद का विकास, जिसे सामूहिक रूप से मार्क्सवाश् के नाम से जाना जाता है, का व्यापक प्रभाव पड़ा है और इसने कई देशों में क्रांतियों और विद्रोहों को प्रेरित किया है। कार्ल मार्क्स के निर्देशन में पेरिस में पहली समाजवादी सरकार बनी जिसने व्यापक और प्रभावी रूप से आम आदमी के लिए काम किए। हालांकि राजसत्ता ने कुछ ही समय में भारी शक्ति जुटाकर समाजवादी सरकार पर जोरदार हमला किया। हजारों कत्ल कर पेरिस कम्यून की क्रांतिकारी सरकार को बर्बर तरीके से खत्म कर दिया। उन्होंने मजदूर, गरीब, किसान की सरकार बनाने का आह्वान किया जिससे सामंती, राजशाही और तथाकथित लोकतांत्रिक सत्ता तंत्र बुरी तरह हिल गया। यहां पेश हैं कार्ल मार्क्स के कुछ विचारणीय, प्रेरक और अनुकरणीय उद्धरण
उत्पीड़ित लोगों को हर कुछ वर्षों में एक बार यह तय करने की अनुमति दी जाती है कि उत्पीड़क वर्ग के कौन से विशिष्ट प्रतिनिधि उनका प्रतिनिधित्व करेंगे और उनका दमन करेंगे।
दार्शनिकों ने दुनिया की केवल व्याख्या ही की है, वह भी अलग-अलग तरीकों से। लेकिन मुख्य बात तो इसे बदलना है।
अपने आस-पास ऐसे लोगों को रखें जो आपको खुश रखते हैं। ऐसे लोग जो आपको हंसाते हैं, जो जरूरत पड़ने पर आपकी मदद करते हैं। ऐसे लोग जो सचमुच आपकी परवाह करते हैं। यही वे लोग हैं जिन्हें अपनी जिंदगी में बनाए रखना चाहिए। बाकी सब तो बस गुजरने वाले मुसाफिर हैं।
हेगेल कहीं टिप्पणी करते हैं कि सभी महान, विश्व-ऐतिहासिक तथ्य और व्यक्तित्व, मानो, दो बार घटित होते हैं। वह यह जोड़ना भूल गए, पहली बार एक त्रासदी के रूप में, और दूसरी बार एक प्रहसन के रूप में।
आप जितना कम खाते हैं, पीते हैं, किताबें खरीदते हैं, थिएटर या नाच-गाना या पब जाते हैं, और जितना कम सोचते हैं, प्यार करते हैं, सिद्धांत गढ़ते हैं, गाते हैं, चित्रकारी करते हैं, तलवारबाजी करते हैं, आदि, उतना ही अधिक आप बचत कर पाएंगे और उतना ही बड़ा आपका खजाना बनता जाएगा, जिसे न तो दीमक खा सकती है और न ही जंग उसे खराब कर सकती है, यही आपकी पूंजी है। आप स्वयं जितने कम होते हैं, अपने जीवन को जितना कम अभिव्यक्त करते हैं, आपके पास चीजें उतनी ही अधिक होती हैं, और आपका यह पराया हुआ जीवन उतना ही विशाल होता जाता है, तथा आपके इस पराए हुए अस्तित्व की बचत उतनी ही बढ़ती जाती है।
शासक वर्ग कम्युनिस्ट क्रांति से भले ही कांप उठे। सर्वहारा वर्ग के पास खोने के लिए अपनी बेड़ियों के सिवा कुछ भी नहीं है। उनके पास जीतने के लिए पूरी दुनिया है। दुनिया के सभी मजदूरों, एक हो जाओ!
मैं कुछ भी नहीं हूँ, लेकिन मुझे सब कुछ होना ही है।
कट्टरपंथी होने का अर्थ है, चीजों को उनकी जड़ से पकड़ना।
तर्क-बुद्धि का अस्तित्व हमेशा से रहा है, लेकिन हमेशा एक तर्कसंगत रूप में नहीं।
जाओ, बाहर निकलो! अंतिम शब्द तो उन मूर्खों के लिए होते हैं जिन्होंने अपनी बात अभी तक पूरी नहीं कही है! यह इंसानों की चेतना नहीं है जो उनके अस्तित्व को तय करती है, बल्कि इसके विपरीत, उनका सामाजिक अस्तित्व ही उनकी चेतना को तय करता है।
किसी भी बहाने से हथियार और गोला-बारूद नहीं सौंपे जाने चाहिए, मजदूरों को निहत्था करने की किसी भी कोशिश को नाकाम किया जाना चाहिए, जरूरत पड़ने पर बलपूर्वक भी।
धर्म, मानवीय मन की उस असमर्थता का नाम है जिसके चलते वह उन घटनाओं से निपट नहीं पाता जिन्हें वह समझ नहीं सकता।
विज्ञान तक पहुँचने का कोई शाही रास्ता नहीं है, केवल वही लोग इसके ऊँचे-नीचे और थका देने वाले रास्तों पर चढ़ने से नहीं घबराते, उन्हीं के पास इसकी प्रकाशमान चोटियों तक पहुँचने का अवसर होता है।
हमारे मन में कोई दया-भाव नहीं है और न ही हम आपसे किसी दया की अपेक्षा करते हैं। जब हमारी बारी आएगी, तो हम उस आतंक के लिए कोई बहाना नहीं बनाएँगे।
सर्वहारा वर्ग के पास खोने के लिए अपनी बेड़ियों के सिवा और कुछ नहीं है। उनके पास जीतने के लिए पूरी दुनिया है।
यदि कोई बात निश्चित है, तो वह यह है कि मैं स्वयं कोई मार्क्सवादी नहीं हूँ।
यदि पैसा ही वह बंधन है जो मुझे मानवीय जीवन से जोड़ता है, समाज को मुझसे जोड़ता है, और मुझे प्रकृति तथा मनुष्य से जोड़ता है, तो क्या पैसा ही सभी बंधनों का बंधन नहीं है? क्या यह सभी रिश्तों को तोड़ और जोड़ नहीं सकता? इसलिए, क्या यह अलगाव का भी एक सार्वभौमिक माध्यम नहीं है?
मेरे जीवन का उद्देश्य ईश्वर को गद्दी से हटाना और पूंजीवाद को नष्ट करना है।
लोगों को उनके इतिहास से दूर रखो, और उन पर आसानी से नियंत्रण पाया जा सकता है।
एक तरफ धन का संचय, तो दूसरी तरफ उसी समय दुख, परिश्रम की पीड़ा, गुलामी, अज्ञानता, क्रूरता और मानसिक पतन का संचय होता है।
सभी बच्चों की शिक्षा, जिस क्षण से वे माँ की देखभाल के बिना अपना काम चला सकते हैं, राज्य के संस्थानों में होनी चाहिए।
साम्यवाद के सिद्धांत को एक वाक्य में संक्षेप में कहा जा सकता है, सभी निजी संपत्ति को समाप्त कर दो।
किसी आदमी के लिए मछली पकड़ो, और तुम उसे वह मछली बेच सकते हो। किसी आदमी को मछली पकड़ना सिखाओ, और तुम एक शानदार व्यावसायिक अवसर को बर्बाद कर दोगे।
साम्यवाद वहीं से शुरू होता है जहाँ से नास्तिकता शुरू होती है।
लोकतंत्र ही समाजवाद की ओर जाने वाला मार्ग है।
लोगों की खुशी के लिए पहली शर्त धर्म का उन्मूलन है। -कार्ल मार्क्स
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