21 अक्टूबर 1833 को स्वीडन के स्टॉकहोम में अल्फ्रेड बर्नहार्ड नोबेल का जन्म हुआ। अल्फ्रेड नोबेल दिग्गज स्वीडिश रसायनज्ञ, आविष्कारक, इंजीनियर और व्यवसायी बने। नोबेल को डायनामाइट के आविष्कार के लिए जाना जाता है। उन्होंने अपनी संपत्ति नोबेल पुरस्कारों की स्थापना के लिए दान कर दी थी। उन्होंने विज्ञान के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण योगदान दिए और आविष्कार किए अपने जीवनकाल में उनके नाम 355 पेटेंट दर्ज थे। बताया जाता है कि नोबेल में बचपन से ही विज्ञान और सीखने के प्रति गहरी रुचि थी, रसायन विज्ञान और भाषाओं में। अल्फ्रेड नोबेल छह भाषाओं के जानकार बने और 24 साल की उम्र में उन्होंने अपना पहला पेटेंट कराया। उन्होंने अपने परिवार के साथ कई व्यावसायिक उपक्रम शुरू किए, जिनमें बोफोर्स कंपनी सबसे प्रमुख है। बोफोर्स प्रारंभ में लोहे और स्टील का उत्पादन करती थी, इसे बाद में नोबेल ने तोपों और अन्य हथियारों के एक बड़े निर्माता के रूप में विकसित किया। नोबेल का सबसे प्रसिद्ध आविष्कार डायनामाइट बना, एक विस्फोटक जिसे नाइट्रोग्लिसरीन का उपयोग करके बनाया गया था और 1867 में इसका पेटेंट कराया गया था। 1875 में उन्होंने जेलिग्नाइट और 1887 में बैलिस्टाइट का आविष्कार किया।
अपनी मृत्यु पूर्व वसीयत में नोबेल ने अपनी संपत्ति एक फाउंडेशन को दान कर दी, जिसका उद्देश्य नोबेल पुरस्कारों के लिए फंड देना था। ये पुरस्कार हर साल उन लोगों को दिए जाते हैं जिन्होंने मानवता के लिए सबसे बड़ा योगदान दिया हो। नोबेलियम नामक सिंथेटिक तत्व का नाम उन्हीं के नाम पर रखा गया है। डायनामाइट नोबेल और अक्जोनोबेल जैसी कंपनियों के माध्यम से उनका नाम और विरासत आज भी जीवित है। ये कंपनियां उन्हीं के द्वारा स्थापित व्यवसायों के विलय से बनी हैं। नोबेल को रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज का सदस्य चुना गया था। उनकी वसीयत के अनुसार यही संस्था भौतिकी और रसायन विज्ञान के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार विजेताओं का चयन करती है।
बोफोर्स लूथरन (ईसाई धर्म की एक शाखा) थे। पेरिस में रहने के दौरान वे नियमित रूप से चर्च ऑफ स्वीडन एब्रॉड में जाते थे। इस चर्च का नेतृत्व पादरी नाथन सोडरब्लॉम करते थे, जिन्हें 1930 में नोबेल शांति पुरस्कार मिला। युवावस्था में वे अज्ञेयवादी थे और बाद के जीवन में नास्तिक बन गए, फिर भी वे चर्च को दिल खोलकर दान देते थे। नोबेल स्वभाव से एकांतप्रिय थे और अक्सर अवसाद के दौर से गुजरते थे। वह शादी न कर पाए, मीत न मिला रे मन का .. उनके जीवनवृत्त लिखने वालों अनुसार अल्फ्रेड नोबेल के जीवन में कम से कम तीन प्रेम प्रसंग रहे थे। उनका पहला प्यार रूस में एलेक्जेंड्रा नाम की एक लड़की से था, जिसने उनके विवाह प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। हेस को लिखे गए पत्रों में #AlfredNobel के विचारों में पुरुष-प्रधान सोच की झलक मिलती है, जिसमें उन्होंने अन्य बातों के अलावा यह भी लिखा था, तुम न तो काम करते हो, न लिखते हो, न पढ़ते हो, और न ही सोचते हो। उसने उस महिला से यह भी कहा कि उसका दिमाग बहुत छोटा है, और उसे यह महसूस कराकर दोषी ठहराने की कोशिश की कि उसने उसके (महिला के) लिए अपना बौद्धिक जीवन, अपनी प्रतिष्ठा (जो दूसरों के साथ हमारे संबंधों पर टिकी होती है), और सभ्य दुनिया के साथ अपना पूरा संपर्क त्याग दिया है।
अल्फ्रेड नोबेल की फ्रांस से लेकर इटली तक कई फैक्ट्रियां थीं और नोबल लगातार यात्रा करते रहते थे इसलिए उन्हें चलता-फिरता उद्योगपति भी कहा गया। दिन रात काम ही काम और यात्राएं। कहीं कोई इंतजार और प्यार करने वाली स्त्री नहीं। बस, हर जगह पैसा मांगने वालों का तांता लगा रहता, चैरिटी वाले, फैक्ट्री कार्मिक तन्ख्वाह बढ़ाने की मांग करने वाले, भिखमंगे या अन्य अनेक प्रकार के लोग। नोबल ने पढ़ा भी खूब और मन बहलाव के लिए कुछ लिखा भी। नोबल अक्सर तनाव और चिड़चिड़पन का शिकार हो जाते। कहते हैं कि डायनामाइट और अपने बनाए हथियारों का सरकारों, निजी ग्राहकों द्वारा अत्यधिक दुरुपयोग करने और हत्याओं और नरसंहारों के लिए इस्तेमाल से अपने अंतिम दिनों में नोबल काफी दुखी रहे और बहुत पछताए, इसलिए मानवता के पक्ष में काम करने वाले लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए अपनी वसीयत से ईनाम देने की व्यवस्था कर इस दुनिया – ए – फानी को अलविदा कह गए।
यहां पेश हैं अल्फ्रेड नोबेल के कुछ चुनिंदा कथन –
अगर मेरे पास हजार विचार हों और उनमें से सिर्फ एक भी अच्छा निकल आए, तो मैं संतुष्ट हूँ।
कांट (जर्मन दार्शनिक इमेनुएल कांट) की लेखन शैली इतनी भारी-भरकम है कि उनकी शुद्ध तर्क वाली रचनाओं को पढ़ने के बाद पाठक का मन करता है कि उसे कुछ तर्कहीन पढ़ने को मिल जाए।
जिस दिन सेना की दो टुकड़ियाँ एक ही सेकंड में एक-दूसरे को पूरी तरह नष्ट कर सकेंगी, उम्मीद है कि तब सभी सभ्य राष्ट्र युद्ध से पीछे हट जाएंगे और अपनी सेनाओं को भंग कर देंगे।
बिना किताबों और स्याही के रहने वाला एकांतवासी, जीते-जी एक मरे हुए इंसान के समान है।
मेरी स्पष्ट इच्छा है कि नोबेल पुरस्कार, देते समय उम्मीदवारों की राष्ट्रीयता पर कोई ध्यान न दिया जाए बल्कि जो सबसे योग्य हो, उसे ही पुरस्कार मिले, चाहे वह स्कैंडिनेवियाई हो या न हो।
विद्वान लोग बेहतरीन किताबें लिखेंगे। पुरस्कार विजेता भी होंगे। लेकिन युद्ध तब तक होते रहेंगे, जब तक कि हालात ऐसे न हो जाएं कि युद्ध करना ही असंभव हो जाए।
मैं अपनी कविताओं को कविता कहने का कोई दावा नहीं करता मैं बस कभी-कभी अवसाद को कम करने या अपनी अंग्रेजी सुधारने के लिए लिख लेता हूँ।
मेरे लिए किसी की जीवनी लिखना असंभव है, सिवाय तब जब वह बहुत संक्षिप्त और सटीक हो और मुझे लगता है कि ऐसी ही संक्षिप्त जीवनियाँ सबसे प्रभावशाली होती हैं।
मैंने पहली बार नाइट्रोग्लिसरीन को क्रीमियन युद्ध की शुरुआत में देखा था। सेंट पीटर्सबर्ग में प्रोफेसर जिनिन ने मेरे पिता और मुझे यह दिखाया था। उन्होंने एक निहाई पर थोड़ा सा नाइट्रोग्लिसरीन रखकर उस पर हथौड़ा मारा, यह दिखाने के लिए कि केवल हथौड़े से छुआ गया हिस्सा ही फटता है, और विस्फोट चारों ओर नहीं फैलता।
मैं इंसानों से दूर रहने वाला हूँ, लेकिन बहुत परोपकारी भी हूँ, मैं बहुत चिड़चिड़ा हूँ, और एक कट्टर आदर्शवादी हूँ। मैं भोजन से कहीं बेहतर दर्शनशास्त्र को पचा सकता हूँ।
नोबल ने अपनी भाभी से, हम दोनों में कितना बड़ा अंतर है! तुम एक खुशहाल और जीवंत जीवन जी रही हो, अपने उन प्रियजनों से घिरी हुई जिनकी तुम परवाह करती हो और जो तुम्हारी परवाह करते हैंय तुम पूरी तरह से संतुष्ट और स्थिर हो। जबकि मैं बिना किसी दिशा या सहारे के जीवन के समंदर में एक टूटे हुए जहाज की तरह भटक रहा हूँ। मेरे पास ऐसी कोई यादें नहीं हैं जो मुझे खुश कर सकें, भविष्य के ऐसे कोई सुखद सपने नहीं हैं जो मुझे तसल्ली दे सकें, और न ही मेरे बारे में ऐसा कुछ है जिससे मेरा अहंकार संतुष्ट हो सके। मेरे पास कोई परिवार नहीं है जो मुझे वह सहारा दे सके जिसकी हमें असल में जरूरत होती है न ही कोई दोस्त हैं जिनसे मेरी भावनाएँ पूरी तरह विकसित हो सकें, और न ही कोई दुश्मन हैं जिन पर मैं अपनी नफरत निकाल सकूँ। – अल्फ्रेड नोबेल
Wars will continue until waging war becomes impossible — a thought from Alfred Nobel, Swedish chemist, inventor, engineer, businessman, and philanthropist
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