
ये बंदे, बंदगी कर के भी बंदे बन नहीं सकते और हम मयखाने से निकलते हैं खुदा बन कर खुशवंत सिंह का शेर उन लोगों पर कटाक्ष है जो धर्म का आडंबर (बंदगी) करते हैं लेकिन इंसानियत नहीं अपनाते जबकि कुछ लोग (शराबखाने या मस्तीभरी जिंदगी से) भी मानवता और खुदापन (खुदा बनकर) के साथ बाहर निकलते हैं। खुशवंत सिंह ने यह शेर उन लोगों को जवाब देने के लिए कहा था, जो उन्हें नास्तिक, रंगीला या लुच्चा-बदमाश कहते थे। खुशवंत सिंह का विचार जीवन को खुलकर जीने, पाखंड से दूर रहने और दिल की पवित्रता को बाहरी दिखावे से बेहतर मानने का संदेश देता है।
20 मार्च 2014, सुजान सिंह पार्क, नई दिल्ली में वैश्विक पहचान रखने वाले भारतीय अंग्रेजी लेखक, वकील, राजनयिक, पत्रकार, टिप्पणीकार, संपादक और राजनयिक खुशवंत सिंह (जन्म 2 फरवरी 1915, हडाली, पाकिस्तान) का निधन हुआ। सन 1947 में भारत के विभाजन के दौरान मिले अनुभवों ने उन्हें 1956 में ट्रेन टू पाकिस्तान लिखने के लिए प्रेरित किया (जिस पर 1998 में एक फिल्म भी बनी), और ट्रेन टू पाकिस्तान उनका सबसे मशहूर उपन्यास बन गया। यहां पेश हैं खुशवंत सिंह के कुछ उद्धरण
नैतिकता पैसों की चीज है। गरीब लोग नैतिकता का खर्च नहीं उठा सकते। इसलिए उनके पास धर्म होता है।
अभी तक किसी ने कलम के लिए कंडोम नहीं बनाया है। मेरी कलम अब भी सेक्सी है।
मैं अकेला हूँ, लेकिन कभी अकेलापन महसूस नहीं करता। आपके आस-पास हमेशा किताबें होती हैं।
आपका सिद्धांत यह होना चाहिए कि आप सब कुछ देखें, लेकिन कुछ भी न कहें। दुनिया इतनी तेजी से बदलती है कि अगर आप आगे बढ़ना चाहते हैं, तो आप किसी भी व्यक्ति या दृष्टिकोण से खुद को पूरी तरह जोड़कर नहीं रख सकते।
जब पूरी दुनिया रात के आंचल में लिपटी होती है, तो मन का दर्पण आसमान जैसा हो जाता है, जिसमें विचार तारों की तरह टिमटिमाते हैं।
मुझे लगता है कि जुड़ाव या अपनेपन का एहसास आपको एक हद तक मानसिक संतुष्टि जरूर देता है।
बुलबुल हमेशा बागों की ठंडी छांव में नहीं गाती, न ही बसंत हमेशा रहता है, और न ही फूल हमेशा खिले रहते हैं। खुशियाँ भी हमेशा कायम नहीं रहतीं सुख भरे दिनों का सूरज भी ढल जाता है। दोस्ती भी हमेशा नहीं टिकती, जो लोग इस सच्चाई को नहीं जानते, वे जीवन को भी नहीं जानते।
मेरा कोई बहुत करीबी दोस्त नहीं है। दोस्ती के लिए समय चाहिए, मिलने-जुलने, साथ बैठने और गपशप करने के लिए। मेरे पास उतना समय नहीं है।
यही तो दिल्ली है। जब जिंदगी का बोझ बहुत ज्यादा लगने लगे, तो बस एक घंटा निगमबोध घाट पर बिताइए, वहाँ जलते हुए शवों को देखिए और उनके परिजनों को विलाप करते सुनिए। फिर घर आइए और व्हिस्की के दो-एक पैग लगाइए। दिल्ली में, मौत और शराब ही जिंदगी को जीने लायक बनाते हैं।
गपशप या अफवाहों के बारे में सबसे आखिर में उन्हीं लोगों को पता चलता है, जिनके बारे में वे अफवाहें होती हैं।
आजादी सिर्फ उन पढ़े-लिखे लोगों के लिए है, जिन्होंने इसके लिए संघर्ष किया था। हम पहले अंग्रेजों के गुलाम थे, अब हम पढ़े-लिखे भारतीयों, या फिर पाकिस्तानियोंकृके गुलाम बनकर रहेंगे।
मुझे कभी गुस्सा नहीं आया। अगर मुझे अपना गुस्सा या भड़ास निकालनी होती है, तो मैं उसे अपनी लेखनी के जरिए निकाल देता हूँ, लेकिन आमने-सामने की बातचीत में, मैंने कभी अपना आपा नहीं खोया और न ही कभी किसी के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल किया। जब आप अस्सी साल या उससे ज्यादा के हो जाएँगे, तो समय और किस्मत आपके दरवाजे पर दस्तक देंगे, लेकिन अगर आप सौ साल तक जिंदा रह गए, तो आपकी जिंदगी अंदर से पूरी तरह से मौत जैसी हो जाएगी।
अगर आप चीजों को वैसे ही देखें जैसी वे हैं, तो ऐसा कोई नियम, न तो इंसान का और न ही भगवान का, नजर नहीं आता जिसके आधार पर कोई अपना आचरण तय कर सके। गलत सही पर उतना ही हावी होता है जितना सही गलत पर। कभी-कभी तो गलत की जीत ज्यादा बड़ी होती है। आखिर में क्या होगा, यह आप नहीं जानते। ऐसे हालात में आप क्या कर सकते हैं, सिवाय इसके कि आप सभी मूल्यों के प्रति पूरी तरह से उदासीन हो जाएँ? किसी भी चीज से कोई फर्क नहीं पड़ता। बिल्कुल भी नहीं।
मैं अपनी लिखाई में अश्लील भाषा का इस्तेमाल करता हूँ। या उन लोगों के लिए जिन्हें मैं पसंद नहीं करता, लेकिन मुझे कभी गुस्सा नहीं आया और मुझे लगता है कि यह काफी हद तक महात्मा गांधी का असर है। जब आप अपना आपा खो देते हैं, तो आप अपना मकसद भी खो देते हैं।
सेक्स, हर इंसान के लिए सचमुच दिलचस्प होता है, तो फिर इसे नजरअंदाज क्यों किया जाए? यह मजेदार है, दिलचस्प है और इसके कई पहलू हैं।
मुझे अब भी लगता है कि जब भी किसी भारतीय को किसी राजनीतिक या सामाजिक मुद्दे पर कोई दुविधा होती है, तो उसके लिए संदर्भ बिंदु यही होता है कि वह सोचे,ष्इन हालात में महात्मा गांधी क्या करते? मैं उनकी कुछ सनकों, जैसे शराबबंदी, ब्रह्मचर्य, डॉक्टरों से परहेज को नहीं मानता था, लेकिन आम तौर पर वे हमेशा सही होते थे। मेरे लिए वे मेरे किसी भी गुरु से ज्यादा मायने रखते थे।
प्रकृति का नियम यह है कि जो इंसान दिन भर कड़ी मेहनत करता है, वह रात के घंटे परियों से भरे महल में बिताता है, जबकि वह राजा जो दिन में राजदंड चलाता है, उसकी नींद विद्रोह और हत्या के बुरे सपनों से टूट जाती है।
मैं 15 साल तक पुलिस सुरक्षा में रहा क्योंकि मैं उनकी हिट-लिस्ट पर था। मैंने खालिस्तान का विरोध किया क्योंकि मुझे लगा कि सिख समुदाय के लिए एक अलग राज्य की मांग करना आत्महत्या जैसा होगा, और उन्होंने मेरी बात सुनी क्योंकि वे जानते थे कि मैं उन्हीं में से एक हूँ। मुझे लगता है कि मैंने कम से कम समझदार सिखों का नजरिया तो जरूर बदला, और इससे मुझे बहुत ज्यादा संतोष मिला।
मैं मानता हूँ कि मेरे अंदर माफ करने की भावना नहीं है। अगर कोई मेरे साथ कभी भी बदतमीजी करता है, तो चाहे वह कितनी भी कोशिश क्यों न कर ले, मैं उसके साथ अपने पुराने ख्संबंध, फिर से नहीं जोड़ पाता। और जब वे मुझे छोड़ देते हैं, तो मुझे एक तरह की राहत महसूस होती है। मुझे लंबे समय तक जीने वाले माता-पिता मिले। मेरी माँ का 94 साल की उम्र में निधन हो गया। पिता का 90 साल की उम्र में निधन हुआ, उनके हाथ में व्हिस्की का गिलास था। मुझे लगता है कि लंबी उम्र का यही राज है – ऐसे माता-पिता का होना जो खुद लंबी उम्र जिए हों। बाकी सब तो अनुशासन है।
ख्एक वकील होने के नाते, मुझे वह सब पढ़ने के लिए बहुत समय मिला, जो मैंने अपने स्कूल और कॉलेज के दिनों में नहीं पढ़ा था। एक कमजोर छात्र होने के नाते, मैं मुश्किल से ही परीक्षाएँ पास कर पाता था और किताबों की मुझे जरा भी परवाह नहीं थी। हर समय बस खेल-कूद ही चलता रहता था। मैंने पढ़ना शुरू किया और साहित्य तथा लेखन में मेरी रुचि जाग उठी। मैंने जितने भी कुछ केस लड़े, उनसे ही मुझे अपनी शुरुआती लघुकथाओं के लिए सामग्री मिली।
मैं नहीं चाहता कि मेरा दाह-संस्कार किया जाएय मैं चाहता हूँ कि मुझे दफनाया जाए। मैं लकड़ी बर्बाद करने में विश्वास नहीं रखता और मुझे लगता है कि इंसान को धरती माँ को कुछ न कुछ लौटाना चाहिए।
लेकिन बड़े लोगों की बीमारियों को हमेशा बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है। शाही लोगों के गुदा-द्वार के बस खुलने और बंद होने जैसी साधारण सी बात को भी ऐसे पेश किया जाता है, मानो दुनिया का अंत होने वाला हो।
मैं कभी किसी पार्टी का कार्ड-धारक सदस्य नहीं रहा। लेकिन मैं इस मायने में वामपंथी था कि मैं कम्युनिस्ट पार्टी को वोट देता था।

