
5 अक्टूबर 1936 को प्राग, चेकोस्लोवाकिया में वाक्लाव हावेल का जन्म हुआ। वाक्लाव हावेल चेक राजनेता, लेखक, कवि, नाटककार और असंतुष्ट विचारक बने और 1989 से 1992 तक चेकोस्लोवाकिया के आखिरी राष्ट्रपति रहे (31 दिसंबर को चेकोस्लोवाकिया के विघटन से पहले) और फिर 1993 से 2003 तक चेक गणराज्य के पहले राष्ट्रपति बने। चेक साहित्य के लेखक के तौर पर, वे अपने नाटकों, निबंधों और संस्मरणों के लिए जाने जाते हैं। 1986 में हावेल को इरास्मस पुरस्कार, 1989 में फ्रीडेंसप्राइस डेस ड्यूशेन बुचहैंडल्स (जर्मन बुक ट्रेड का शांति पुरस्कार) और 1990 में व्यापक समुदाय की भलाई में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए गॉटलिब डटवीलर पुरस्कार और फ्रीडम मेडल मिला। 1993 में उन्हें रॉयल सोसाइटी ऑफ लिटरेचर का मानद फेलो चुना गया। अपनी मृत्यु से एक हफ्ते पहले वे प्राग में अपने पुराने दोस्त तिब्बती दलाई लामा से मिले, तब हावेल व्हीलचेयर पर थे। 18 दिसंबर 2011 की सुबह, 75 साल की उम्र में ह्रादेचेक में अपने घर पर #VáclavHavel का निधन हो गया।
यहां प्रस्तुत हैं वाक्लाव हावेल के कुछ प्रेरक, गंभीर, विचारोत्तेजक उद्धरण
इस इंसानी दुनिया की भलाई इंसानी दिल में, सोचने-समझने की इंसानी ताकत में, इंसानी विनम्रता और जिम्मेदारी में ही छिपी है।
उन लोगों का साथ करें जो सच की तलाश में हैं, उनसे दूर रहें जिन्हें सच मिल चुका है।
उम्मीद इस बात का पक्का भरोसा नहीं है कि सब कुछ अच्छा ही होगा। उम्मीद बस इस बात का एहसास है कि जिंदगी और काम का कोई मतलब है।
उम्मीद इस बात का यकीन नहीं है कि कुछ अच्छा होगा, बल्कि इस बात का भरोसा है कि किसी चीज का कोई मतलब है, चाहे नतीजा कुछ भी हो।
मुझे लगता है कि लोगों के अंदर छिपी अच्छाई को जगाने की जरूरत है। लोगों को यह सुनने की जरूरत है कि अच्छे से पेश आना या दूसरों की मदद करना, अपने फायदे से ऊपर सबके फायदे को रखना और साथ रहने के बुनियादी नियमों का सम्मान करना सही है।
आप सिर्फ इसलिए विद्रोही नहीं बन जाते क्योंकि आपने एक दिन यह बहुत अलग करियर चुनने का फैसला किया। आप अपनी निजी जिम्मेदारी की भावना और बाहरी हालात की पेचीदा स्थितियों की वजह से इसमें धकेल दिए जाते हैं। आपको मौजूदा ढांचों से बाहर निकाल दिया जाता है और उनके साथ टकराव की स्थिति में डाल दिया जाता है। इसकी शुरुआत अपना काम अच्छे से करने की कोशिश से होती है और अंत समाज का दुश्मन करार दिए जाने पर होता है।
जो कोई भी खुद को बहुत गंभीरता से लेता है, उसके मजाक का पात्र बनने का खतरा हमेशा बना रहता है, जो लगातार खुद पर हंस सकता है, उसके साथ ऐसा नहीं होता।
सिर्फ सोच का होना काफी नहीं है, उसे हिम्मत के साथ जोड़ना जरूरी है। सीढ़ियों को ऊपर तक घूरते रहना काफी नहीं है, हमें सीढ़ियां चढ़नी होंगी।
सच सिर्फ वह नहीं है जो आप सोचते हैं, सच वे हालात भी हैं जिनमें वह कहा जाता है और यह भी कि वह किससे, क्यों और कैसे कहा जाता है।
जैसे एंट्रॉपी (अव्यवस्था) का लगातार बढ़ना ब्रह्मांड का बुनियादी नियम है, वैसे ही ज्यादा व्यवस्थित होना और एंट्रॉपी के विरुद्ध संघर्ष करना जीवन का बुनियादी नियम है।
आधुनिक इंसान की त्रासदी यह नहीं है कि वह अपनी जिंदगी के मकसद के बारे में कम से कम जानता जा रहा है, बल्कि यह है कि उसे इसकी कम से कम परवाह होती जा रही है।
जैसे ही इंसान ने खुद को दुनिया में सबसे बड़े मकसद का स्रोत और हर चीज का पैमाना मानना शुरू किया, दुनिया ने अपना इंसानी पहलू खोना शुरू कर दिया और इंसान का उस पर से नियंत्रण खत्म होने लगा। आप अपनी पूरी जिंदगी किसी चीज की बुराई करते हुए नहीं बिता सकते और फिर जब उसे बेहतर करने का मौका मिले, तो उससे दूर भागें।
सच और प्यार, झूठ और नफरत पर जीत हासिल करेंगे।
इंसान की असली परीक्षा तब नहीं होती जब वह अपनी पसंद का रोल निभाता है, बल्कि तब होती है जब वह उस रोल को निभाता है जो किस्मत ने उसके लिए तय किया है।
विचारधारा दुनिया को देखने का एक दिखावटी नजरिया है। यह इंसानों को पहचान, सम्मान और नैतिकता का भ्रम देती है जबकि साथ ही उन्हें इन चीजों को छोड़ने के लिए आसान भी बनाती है।
इंसान ब्रह्मांड का सर्वशक्तिमान मालिक नहीं है जिसे बिना किसी रोक-टोक के कुछ भी करने की आजादी हो, चाहे वह जो सोचे या जो उसे उस पल सही लगे। हम जिस दुनिया में रहते हैं, वह बहुत ही जटिल और रहस्यमयी ताने-बाने से बनी है, जिसके बारे में हम बहुत कम जानते हैं और जिसके प्रति हमें बहुत विनम्र रहना चाहिए।
उम्मीद इंसानी आत्मा का वह गहरा भाव है जिसे सबसे मुश्किल समय में भी बनाए रखा जा सकता है।
हर किसी में गुमनाम भीड़ में घुल-मिल जाने और दिखावटी जिंदगी की धारा के साथ आराम से बहते रहने की इच्छा होती है। यह दो पहचानों के बीच के साधारण टकराव से कहीं ज्यादा है। यह उससे भी कहीं बुरी चीज हैरू यह पहचान की मूल अवधारणा के लिए ही एक चुनौती है। इंसान की हर तकलीफ हर इंसान से जुड़ी है।
क्या गहरे शक का पल ही नई यकीन की चीजों को जन्म नहीं देता? शायद मायूसी ही वह जमीन है जो इंसान की उम्मीद को पनपाती है शायद जिंदगी का मतलब तब तक समझ नहीं आ सकता जब तक बेतुकेपन का अनुभव न किया जाए।
इस मोड़ पर मैं बस एक ही चीज की सलाह दे सकता हूँरू मजाक-मजाक में चीजों को देखने का नजरिया, चीजों के बेतुके और अजीब पहलुओं को समझने की काबिलियत, दूसरों पर और खुद पर हँसने की आदत, और दुनिया में जो भी चीज पैरोडी या मजाक की माँग करती है, उसे विडंबना की नजर से देखने का भाव। दूसरे शब्दों में मैं बस सही नजरिया और थोड़ी दूरी बनाए रखने की सलाह दे सकता हूँ।
जीतने वाले पक्ष के किसी बुद्धिजीवी के बारे में हमेशा कुछ न कुछ शक की गुंजाइश रहती है।
एक ही बात है जिसे मैं कभी नहीं मानूँगा, कि किसी नेक काम के लिए कोशिश करना बेकार हो सकता है।
सबसे बुरी बात यह है कि हम नैतिक रूप से दूषित माहौल में जी रहे हैं। हम नैतिक रूप से बीमार महसूस करते हैं क्योंकि हमें जो हम सोचते थे उससे अलग कुछ कहने की आदत हो गई है। प्यार, दोस्ती, दया, विनम्रता या माफी जैसी चीजों ने अपनी गहराई और अहमियत खो दी है।
यह सच है कि देश शांत है। मुर्दाघर या कब्र जैसी शांति, है न?
यहाँ तक कि पूरी तरह से नैतिक काम, जिसका कोई तुरंत दिखने वाला राजनीतिक असर होने की उम्मीद न हो, वह भी धीरे-धीरे और परोक्ष रूप से, समय के साथ राजनीतिक महत्व हासिल कर सकता है।
असहमति रखने वाला व्यक्ति असल सत्ता के दायरे में काम नहीं करता। वह सत्ता नहीं चाहता। उसे किसी पद की चाहत नहीं होती और न ही वह वोट इकट्ठा करता है। वह जनता को लुभाने की कोशिश नहीं करता, न ही कुछ देता है और न ही कोई वादा करता है। उसके काम बस एक नागरिक के तौर पर उसकी गरिमा को जाहिर करते हैं, चाहे इसके लिए कोई भी कीमत चुकानी पड़े। -वाक्लाव हावेल
Truth and love will triumph over lies and hatred – an inspiring quote by Václav Havel Czech politician, writer, poet, playwright, and president
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