
25 सितंबर 1897 को न्यू अल्बानी, मिसिसिपी, अमेरिका में विलियम कथबर्ट फॉकनर का जन्म हुआ। विलियम फॉकनर विख्यात अमेरिकी उपन्यासकार, कहानीकार और लेखक बने। 1949 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार जीतने वाले फॉकनर अमेरिकी साहित्य के सबसे मशहूर लेखकों में से एक हैं, उन्हें अक्सर दक्षिण अमेरिका के साहित्य का सबसे महान लेखक और 20वीं सदी के सबसे प्रभावशाली और महत्वपूर्ण लेखकों में से एक माना जाता है। विलियम फॉकनर को नेशनल बुक अवार्ड और पुलित्जर पुरस्कार सहित अनेक अन्य सम्मान और पुरस्कार मिले। #WilliamFaulkner की रचनाओं का दुनिया की तमाम भाषाओं में अनुवाद हुआ। 1956 में द पेरिस रिव्यू के साथ एक इंटरव्यू में फॉकनर ने कहा था, अगर किसी लेखक को तकनीक में दिलचस्पी है, तो उसे सर्जरी या ईंट-चिनाई का काम करना चाहिए। लेखन का कोई मशीनी तरीका या शॉर्टकट नहीं होता। कोई युवा लेखक अगर किसी थ्योरी का पालन करता है तो वह मूर्ख है। अपनी गलतियों से खुद सीखें, लोग गलतियों से ही सीखते हैं। एक अच्छा कलाकार मानता है कि कोई भी उसे सलाह देने लायक नहीं है। उसमें बहुत ज्यादा अहंकार होता है। चाहे वह पुराने लेखक की कितनी भी तारीफ क्यों न करे, वह उनसे आगे निकलना चाहता है।
विलियम फॉकनर के कुछ प्रेरक, मार्गदर्शक, विचारोत्तेजक उद्धरण
लेखक मत बनो। बस लिखते रहो।
पढ़ें, पढ़ें, पढ़ें। सब कुछ पढ़ें, बेकार की चीजें, क्लासिक्स, अच्छी और बुरी रचनाएँ, और देखें कि वे कैसे लिखते हैं। ठीक वैसे ही जैसे एक बढ़ई अप्रेंटिस के तौर पर काम करता है और मास्टर को देखता-सीखता है। पढ़ें! आप उसे आत्मसात कर लेंगे। फिर लिखें। अगर यह अच्छा होगा, तो आपको पता चल जाएगा। अगर नहीं, तो इसे खिड़की से बाहर फेंक दें।
जब तक आप किनारे से नजर हटाने की हिम्मत नहीं जुटाते, तब तक आप नई दिशाओं की ओर नहीं बढ़ सकते।
अन्याय, झूठ और लालच के विरुद्ध ईमानदारी, सच्चाई और दया के लिए आवाज उठाने से कभी न डरें। अगर दुनिया भर के लोग ऐसा करें, तो यह दुनिया बदल जाएगी।
बीता हुआ समय कभी मरता नहीं है। वह तो बीता हुआ भी नहीं होता।
हमें आजाद इसलिए होना चाहिए क्योंकि हम आजादी का दावा नहीं करते, बल्कि उसे अपनाते हैं।
हमेशा सपने देखें और अपनी क्षमता से कहीं ऊँचा लक्ष्य रखें। सिर्फ अपने समकालीनों या पूर्ववर्तियों से बेहतर बनने की चिंता न करें। खुद से बेहतर बनने की कोशिश करें।
अगर दर्द और कुछ न होने के बीच चुनाव करना हो, तो मैं दर्द को चुनूँगा।
मैं तुम्हें सारी उम्मीदों और चाहतों का मकबरा देता हूँ, मैं यह तुम्हें इसलिए नहीं देता कि तुम समय को याद रखो, बल्कि इसलिए कि तुम कभी-कभी पल भर के लिए उसे भूल सको और उस पर जीत पाने की कोशिश में अपनी सारी साँसें न गँवा दो। क्योंकि उसने कहा, कोई भी लड़ाई कभी जीती नहीं जाती। वे तो लड़ी भी नहीं जातीं। मैदान तो इंसान को बस उसकी अपनी बेवकूफी और निराशा दिखाता है, और जीत तो बस दार्शनिकों और मूर्खों का एक भ्रम है।
लिखते समय, तुम्हें अपनी सबसे प्यारी चीजों को भी छोड़ना पड़ सकता है।
प्यार के बारे में सबसे दुखद बात यह है, जो, कि न सिर्फ प्यार हमेशा नहीं टिकता, बल्कि दिल टूटने का दर्द भी जल्द ही भुला दिया जाता है।
शायद किताबों में प्यार को समेटना सही था। शायद वह और कहीं जिंदा नहीं रह सकता था।
कितनी बार मैं किसी अजनबी छत पर बारिश के नीचे लेटा हुआ घर के बारे में सोचता रहा हूँ।
बातें, बातें, बातें, शब्दों की पूरी तरह से बेवकूफी भरी और दिल तोड़ने वाली हरकत।
अगली बार जब तुम किसी को रिझाने की कोशिश करो, तो बातों या शब्दों का सहारा मत लेना। औरतें शब्दों के बारे में मर्दों से कहीं ज्यादा जानती हैं। और वे जानती हैं कि शब्दों का मतलब कितना कम हो सकता है।
यह शर्म की बात है कि इंसान दिन में आठ घंटे सिर्फ काम ही कर सकता है। वह आठ घंटे खा नहीं सकता, आठ घंटे पी नहीं सकता, आठ घंटे प्यार नहीं कर सकता। इंसान आठ घंटे में सिर्फ काम ही कर सकता है।
यादें जानने से पहले ही यकीन कर लेती हैं। वे याद करने या जानने से कहीं ज्यादा समय तक यकीन बनाए रखती हैं।
मैं बुरा हूँ और नरक में जाऊँगा और मुझे इसकी परवाह नहीं। मैं उस जगह के बजाय नरक में रहना पसंद करूँगा जहाँ तुम हो।
घड़ियाँ समय की हत्या करती हैं जब तक छोटी-छोटी गियर घूमती रहती हैं, समय मरा हुआ रहता है, घड़ी के रुकने पर ही समय में जान आती है।
मुझे गर्म, अंधी जमीन में पड़े एक गीले, जंगली बीज जैसा महसूस होता है।
तुम इसलिए प्यार नहीं करते क्योंकि, तुम सब कुछ जानते हुए भी प्यार करते हो, खूबियों के लिए नहीं, बल्कि कमियों के बावजूद।
अगर कोई कहानी तुम्हारे अंदर है, तो उसे बाहर आना ही होगा।
सपनों का एक बार में एक ही मालिक होता है। इसीलिए सपने देखने वाले अकेले होते हैं।
हैरानी। बस हैरान होते रहो।
उसके पास भी एक शब्द था। उसने उसे प्यार कहा। लेकिन मैं लंबे समय से शब्दों से वाकिफ था। मैं जानता था कि वह शब्द भी दूसरों जैसा ही थारू बस किसी कमी को भरने का एक जरिया, कि जब सही समय आएगा, तो तुम्हें उसके लिए किसी शब्द की जरूरत नहीं होगी, ठीक वैसे ही जैसे गर्व या डर के लिए नहीं होती, एक दिन मैं कोरा से बात कर रहा था। उसने मेरे लिए प्रार्थना की क्योंकि उसे लगता था कि मैं पाप को देख नहीं पा रहा हूँ, वह चाहती थी कि मैं भी घुटने टेककर प्रार्थना करूँ, क्योंकि जिन लोगों के लिए पाप बस शब्दों की बात है, उनके लिए मुक्ति भी बस शब्द ही है।
वह ऊब गई थी। वह प्यार करती थी, उसमें प्यार करने की क्षमता थी, प्यार देने और पाने की। बस, उसने दो बार कोशिश की और दो बार नाकाम रही, ऐसा कोई इंसान ढूँढ़ने में जो न सिर्फ उस प्यार के लायक हो, उसे पाने और उसके बराबर होने की काबिलियत रखता हो, बल्कि उसे स्वीकार करने की हिम्मत भी रखता हो।
अगस्त के आखिर में घर पर कुछ दिन ऐसे ही होते हैं, हवा पतली और बेचैन सी, जिसमें कुछ उदासी, पुरानी यादें और जानी-पहचानी सी कोई बात घुली होती है।
लिखने लायक अगर कोई चीज है, तो वह है इंसान का दिल, जो खुद से ही उलझा हुआ है।
मेरा तो यही मानना है जो औरत एक बार बिच (बदमिजाज या कमीनी) बन गई, वह हमेशा वैसी ही रहती है।
इंसान अपनी बदकिस्मती का ही जोड़ होता है। एक दिन आपको लगता है कि बदकिस्मती भी थक जाएगी, लेकिन फिर पता चलता है कि समय ही आपकी बदकिस्मती है। -विलियम फॉकनर
If I had to choose between pain and nothing, I would choose pain. — Thought-provoking quote by the Nobel Prize-winning American novelist William Faulkner

