
28 सितंबर 1930 को न्यूयॉर्क, संयुक्त राज्य अमेरिका में इमैनुएल मॉरिस वालरस्टीन का जन्म हुआ। इमैनुएल वालरस्टीन प्रसिद्ध अमेरिकी समाजशास्त्री और आर्थिक इतिहासकार बने। उन्हें समाजशास्त्र में वर्ल्ड-सिस्टम्स अप्रोच (विश्व-प्रणाली दृष्टिकोण) विकसित करने के लिए सबसे ज्यादा जाना गया। इमैनुएल वालरस्टीन 2000 से लेकर 2019 में अपनी मृत्यु तक येल यूनिवर्सिटी में सीनियर रिसर्च स्कॉलर रहे और अक्टूबर 1998 से जुलाई 2019 तक एजेंस ग्लोबल के जरिए विश्व मामलों पर हर दो महीने में अपनी टिप्पणियाँ प्रकाशित करते रहे।
इमैनुएल वालरस्टीन इंटरनेशनल सोशियोलॉजिकल एसोसिएशन के 13वें अध्यक्ष थे। वालरस्टीन ने अपने करियर की शुरुआत उपनिवेश-बाद के अफ्रीकी मामलों के विशेषज्ञ के तौर पर की थी। 1951 और 1952 में अंतरराष्ट्रीय युवा सम्मेलनों में भाग लेने के बाद उन्होंने इसी विषय को अपनी पढ़ाई का मुख्य केंद्र बनाया। 1970 के दशक की शुरुआत तक उनके प्रकाशन लगभग पूरी तरह से इसी विषय पर केंद्रित थे, जिसके बाद इमैनुएल वालरस्टीन को बड़े पैमाने पर वैश्विक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के इतिहासकार और सिद्धांतकार के तौर पर पहचान मिली। वैश्विक पूंजीवाद की #ImmanuelWallerstein की शुरुआती आलोचना और व्यवस्था-विरोधी आंदोलनों के समर्थन ने उन्हें नोम चॉम्स्की और पियरे बॉर्डियू के साथ-साथ, एकेडमिक समुदाय के अंदर और बाहर वैश्वीकरण-विरोधी आंदोलन में एक सम्मानित और प्रभावशाली व्यक्ति बना दिया। वालरस्टीन ने तीसरी दुनिया की अवधारणा को खारिज कर दिया और कहा कि आर्थिक लेन-देन के जटिल नेटवर्क से जुड़ी केवल एक ही दुनिया है यानी, एक विश्व-अर्थव्यवस्थाष्या विश्व-प्रणाली जिसमें पूंजी और श्रम का विभाजन और प्रतिस्पर्धी एजेंटों (जिनमें ऐतिहासिक रूप से राष्ट्र-राज्य शामिल हैं, लेकिन केवल वे ही नहीं) द्वारा पूंजी का अंतहीन संचय टकराव का कारण बनते हैं। इस दृष्टिकोण को विश्व-प्रणाली सिद्धांत के रूप में जाना जाता है।
यहां प्रस्तुत हैं इमैनुएल वालरस्टीन के कुछ विचारणीय कथ्न –
बढ़ते अंतर को न देख पाने का दूसरा कारण यह है कि हमारे ऐतिहासिक और सामाजिक विज्ञान विश्लेषण इस बात पर केंद्रित रहे हैं कि मध्यम वर्गों के भीतर क्या हो रहा है यानी, विश्व-अर्थव्यवस्था की आबादी का वह दस से पंद्रह प्रतिशत हिस्सा जो अपने उत्पादन से कहीं ज्यादा अतिरिक्त का उपभोग करता था। इस सेक्टर में सबसे ऊपर वाले हिस्से (कुल आबादी का एक प्रतिशत से भी कम) और असल में बीच वाले हिस्से या ग्रुप (बाकी दस से पंद्रह प्रतिशत) के बीच का अंतर काफी कम हो गया है।
इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि लिबरल लोग तरक्की में यकीन रखते थे। तरक्की के विचार ने सामंतवाद से पूंजीवाद में हुए पूरे बदलाव को सही ठहराया। इसने हर चीज को कमोडिटी (बिकने वाली चीज) बनाने के खिलाफ बचे-खुचे विरोध को खत्म करने को जायज ठहराया, और पूंजीवाद की सभी बुराइयों को यह कहकर नजरअंदाज कर दिया कि इसके फायदे नुकसान से कहीं ज्यादा हैं।
इतिहास गवाह है कि विश्व-अर्थव्यवस्था में शामिल होने वाले लगभग हर नए इलाके ने असल कमाई का ऐसा स्तर तय किया जो विश्व-व्यवस्था के वेतन-स्तर के पदानुक्रम में सबसे नीचे था।
इसीलिए हम कह सकते हैं कि पूंजीवाद के ऐतिहासिक विकास में हर चीज को कमोडिटी बनाने की कोशिश शामिल रही है।
मेरा कहना है कि ऐतिहासिक पूंजीवाद के अलग-अलग समय-स्थान वाले इलाकों में जातीयता और पेशे, आर्थिक भूमिका के बीच काफी गहरा संबंध रहा है और हमेशा से रहा है।
जब सिस्टम संतुलन की स्थिति से बहुत दूर हो जाते हैं, तो वे बंटवारे के बिंदुओं तक पहुँच जाते हैं, जहाँ अस्थिरता के लिए एक ही समाधान के बजाय कई समाधान संभव हो जाते हैं।
हम बीमारी के खिलाफ लड़ाई में पूंजीवादी सभ्यता को एक सकारात्मक, भले ही भौगोलिक रूप से बहुत असमान, रिकॉर्ड का श्रेय दे सकते हैं।
नया विज्ञान हमारे हिसाब-किताब के लिए जो बुनियादी सवाल उठाता है, वह यह है कि पिछले 500 सालों में कौन से वैज्ञानिक सवाल नहीं पूछे गए, किन वैज्ञानिक जोखिमों पर काम नहीं किया गया। यह सवाल उठाता है कि किसने तय किया कि कौन से वैज्ञानिक जोखिम उठाना सही था, और दुनिया के सत्ता-ढांचों के लिहाज से इसके क्या नतीजे निकले।
उन्हें बनाने, सामाजिक रूप से ढालने और आगे बढ़ाने वाली मुख्य विचारधारा नस्लवाद की विचारधारा नहीं थी। वह सार्वभौमिकता की विचारधारा थी।
आधुनिक दुनिया की पहचान मुनाफा कमाने वालों की कल्पना और दबे-कुचले लोगों के विरोध से होती है। शोषण और शोषण को न तो जरूरी और न ही सही मानने से इनकार करना, आधुनिक युग का लगातार चलने वाला विरोधाभास है। ये दोनों एक ऐसी प्रक्रिया में जुड़े हैं जो बीसवीं सदी में अपने चरम पर नहीं पहुँची है।
दुनिया का सिस्टम एक ढाँचागत संकट की ओर बढ़ रहा है।
अनिश्चितता अद्भुत है, और निश्चितता, अगर वह सच होती, तो नैतिक मौत के बराबर होती।
बेशक, बाजार के लेन-देन में अपनी कीमत बेहतर करने के लिए एक पक्ष द्वारा ताकत का इस्तेमाल करना पूँजीवाद की खोज नहीं थी। असमान लेन-देन एक पुरानी प्रथा है। एक ऐतिहासिक सिस्टम के तौर पर पूँजीवाद की खास बात यह थी कि इस असमान लेन-देन को कैसे छिपाया जा सकता था। असल में इसे इतनी अच्छी तरह छिपाया गया कि इस सिस्टम के खुले विरोधियों ने भी पाँच सौ साल तक इसके चलने के बाद ही इसे व्यवस्थित रूप से उजागर करना शुरू किया है।
स्पेक्ट्रम के दूसरे छोर पर दुनिया की 50 से 85 प्रतिशत आबादी, जिन्हें कोई विशेषाधिकार नहीं मिलता, उनके लिए दुनिया निश्चित रूप से उनके पूर्वजों की दुनिया से बदतर है। तकनीकी बदलावों के बावजूद, संभावना है कि उनकी आर्थिक स्थिति खराब है। औपचारिक के बजाय वास्तविक अर्थों में वे मनमानी पाबंदियों के ज्यादा शिकार हैं, कम नहीं, क्योंकि मुख्य सिस्टम अधिक व्यापक और अधिक कुशल हैं। और वे कई तरह की मानसिक परेशानियों के साथ-साथ गृहयुद्धों की तबाही का भी सामना करते हैं।
लोग शोषण का विरोध करते हैं। वे उतनी सक्रियता से विरोध करते हैं जितना वे कर सकते हैं, और उतनी निष्क्रियता से जितना उन्हें करना पड़ता है।
क्या कोई और संभावनाएँ भी हैं? बेशक हैं। यह समझना जरूरी है कि तीनों ऐतिहासिक विकल्प वास्तव में मौजूद हैं, और चुनाव अगले पचास वर्षों में हमारे सामूहिक वैश्विक व्यवहार पर निर्भर करेगा। जो भी विकल्प चुना जाएगा, वह इतिहास का अंत नहीं, बल्कि असल मायने में उसकी शुरुआत होगी। ब्रह्मांडीय समय के हिसाब से इंसानी सामाजिक दुनिया अभी बहुत नई है। 2050 या 2100 में जब हम पूँजीवादी सभ्यता को पीछे मुड़कर देखेंगे, तो हम क्या सोचेंगे? ऐतिहासिक पूँजीवाद एक भौतिकवादी सभ्यता है।
इस संकट का पहला और शायद सबसे बुनियादी पहलू यह है कि अब हम हर चीज को एक कमोडिटी (बिकने वाली चीज) बनाने के करीब पहुँच गए हैं। यानी, ऐतिहासिक पूँजीवाद संकट में इसलिए है क्योंकि पूँजी को लगातार जमा करने की होड़ में, यह उस स्थिति के करीब पहुँच रहा है जिसे एडम स्मिथ ने इंसान के लिए स्वाभाविक बताया था, लेकिन जो असल में कभी अस्तित्व में नहीं रही। चीजों की अदला-बदली और व्यापार करने की इंसान की, प्रवृत्ति अब उन क्षेत्रों और दायरों में भी पहुँच गई है जहाँ पहले ऐसा नहीं होता था, और चीजों को कमोडिटी बनाने के दायरे को बढ़ाने का दबाव बिना किसी रोक-टोक के जारी है।
साम्यवाद (कम्युनिज्म) एक यूटोपिया (काल्पनिक आदर्श लोक) है, यानी ऐसी जगह जो कहीं नहीं है। यह हमारी सभी धार्मिक भविष्यवाणियों का ही एक रूप है, मसीहा का आगमन, ईसा मसीह का दोबारा आना, या निर्वाण। यह कोई ऐतिहासिक संभावना नहीं, बल्कि आज की एक मिथक-कथा है। इसके उलट, समाजवाद एक ऐसी ऐतिहासिक व्यवस्था है जिसे हकीकत में बदला जा सकता है और जिसे शायद एक दिन दुनिया में लागू किया जा सके।
मैं यह कहना चाहूँगा कि यह बात बिल्कुल भी साफ नहीं है कि आज की दुनिया में एक हजार साल पहले की तुलना में ज्यादा आजादी, समानता और भाईचारा है। कोई यह भी कह सकता है कि असल में इसका उल्टा सच है। मैं ऐतिहासिक पूँजीवाद से पहले की दुनिया को कोई आदर्श दुनिया के तौर पर पेश नहीं करना चाहता। वे ऐसी दुनियाएँ थीं जहाँ आजादी, समानता और भाईचारा बहुत कम था। सवाल बस यह है कि क्या ऐतिहासिक पूँजीवाद ने इन मामलों में तरक्की की या गिरावट।
एक सांस्कृतिक आदर्श के तौर पर सत्य ने अफीम (नशे) का काम किया है, और शायद आधुनिक दुनिया में यही एकमात्र गंभीर नशा रहा है। कार्ल मार्क्स ने कहा था कि धर्म आम लोगों के लिए अफीम की तरह है। रेमंड एरॉन ने जवाब दिया कि मार्क्सवादी विचार बदले में बुद्धिजीवियों के लिए अफीम का काम करते हैं। इन दोनों ही तीखी बातों में गहरी समझ छिपी है। लेकिन क्या गहरी समझ ही सच है? मैं यह कहना चाहता हूँ कि शायद सत्य ही आम लोगों और बुद्धिजीवियों, दोनों के लिए असली नशा रहा है।
बुनियादी मानवाधिकारों की भाषा, दुनिया के धर्मों की पिछली भाषा की तुलना में एक बड़ी प्रगति थी, क्योंकि यह हर जगह और हर किसी पर लागू होती थी और इसका संबंध इसी दुनिया से था।
पूँजीवाद सबसे पहले और सबसे मुख्य रूप से एक ऐतिहासिक सामाजिक व्यवस्था है। हमें उस तरह के ढांचागत बदलाव और उस बदलाव के बीच फर्क करना होगा जो मजदूरों के शोषण की सच्चाई को बनाए रखे (या बढ़ा भी दे), और उस बदलाव के बीच जो इस तरह के शोषण को खत्म कर दे या कम से कम उसे काफी हद तक कम कर दे। पूंजीवादी सभ्यता में दो बातें अलग रही हैं। पहली, मेरिटोक्रेसी (योग्यता-आधारित व्यवस्था) की प्रक्रिया को सिर्फ एक असल सच्चाई के बजाय एक आधिकारिक गुण के तौर पर बताया गया है। संस्कृति अलग रही है। और दूसरी, दुनिया की आबादी का वह हिस्सा जिसके लिए ऐसी तरक्की मुमकिन थी, उसका प्रतिशत बढ़ा है। लेकिन इसके बावजूद, मेरिटोक्रेसी के जरिए तरक्की करना अब भी काफी हद तक एक अल्पसंख्यक वर्ग की ही विशेषता बनी हुई है। -इमैनुएल वालरस्टीन
The global system is moving towards a structural crisis — Profound, thought-provoking quote by Immanuel Wallerstein, the American sociologist and economic historian
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