
10 मई 1960 को मॉस्को, सोवियत संघ में प्रसिद्ध रूसी और सोवियत उपन्यासकार यूरी कार्लोविच ओलेशा (जन्म 3 मार्च, पुराने रूसी कैलेंडर के मुताबिक 19 फरवरी, 1899 एलिजावेटग्राद, रूसी साम्राज्यय अब यूक्रेन) का निधन हुआ। यूरी ओलेशा को 20वीं सदी के महानतम रूसी उपन्यासकारों में से एक माना जाता है, उन गिने-चुने लेखकों में से एक, जो उस दौर की दमघोंटू सेंसरशिप के बावजूद स्थायी कलात्मक मूल्य वाली रचनाएँ लिखने में सफल रहे। समीक्षकों के अनुसार यूरी ओलेशा की रचनाएँ एक नाजुक संतुलन का उदाहरण हैं। ऊपरी तौर पर वे कम्युनिस्ट-समर्थक संदेश देती प्रतीत होती हैं, लेकिन गहराई से पढ़ने पर उनमें कहीं अधिक सूक्ष्मता और समृद्धि उजागर होती है। उन्हें उनके मित्रों, इल्फ और पेत्रोव, इसहाक बाबेल और सिगिस्मंड क्रिजिझानोव्स्की के साथ ओडेसा स्कूल ऑफ राइटर्स के समूह में रखकर भी प्रस्तुत किया जाता है। ओलेशा ने उसका बचाव करते हुए कहा कि वह पूरी तरह से एक सोवियत व्यक्ति है।
1930 और 1940 के दशक में जोसफ स्टालिन के शासन की सख्त सेंसरशिप के चलते ओलेशा के लिए अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाना दिन-ब-दिन मुश्किल होता जा रहा था। सोवियत लेखकों के प्रथम सम्मेलन को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि वे मजदूरों और औद्योगिक उत्पादन के बारे में नहीं लिख सकते, जैसा कि सोवियत लेखकों से अपेक्षित था, क्योंकि मेरे लिए उस तरह के मजदूर को, उस तरह के क्रांतिकारी नायक को समझना बेहद कठिन है। मैं उनकी तरह नहीं बन सकता। यहां प्रस्तुत हैं यूरी ओलेशा के कुछ कथन और संवाद
चीजें मुझे पसंद नहीं करतीं। फर्नीचर जान-बूझकर मेरे रास्ते में अपनी टांग अड़ा देता है। एक बार तो एक चमकीले कोने ने सचमुच मुझे काट ही लिया था। मेरे कंबल और मेरे बीच हमेशा से ही एक पेचीदा रिश्ता रहा है।
लेखक इंसानी रूहों के इंजीनियर होते हैं।
इंसानी जिंदगी बेमानी है। जो चीज अशुभ है, वह तो ग्रहों की चाल है। जब मैं यहाँ आकर बसा, तो दोपहर के दो बजे दरवाजे की चौखट पर सूरज की एक नन्ही-सी किरण आकर ठहर गई। छत्तीस दिन बीत गए। वह किरण उछलकर अगले कमरे में चली गई। धरती ने अपनी यात्रा का एक और पड़ाव पूरा कर लिया था। सूरज की वह नन्ही-सी किरण, जो किसी बच्चे के खिलौने जैसी है, हमें अनंत काल की याद दिलाती है।
उसकी जांघों के बीच का हिस्सा बेहद शानदार है। एक रेशमी थैली। एक गुप्त उपवन। किसी नर-पशु जैसा पौरुषपूर्ण अंग। मैंने एक बार ठीक वैसा ही, मलाई जैसा कोमल और मख्मली अंग एक नर हिरण में देखा था।
गालियों और अभिशापों से घिरे एक सूअरबाड़े में भला क्या काव्य-सौंदर्य हो सकता है?
दक्षिण अमेरिका के नक्शे जैसा एक विशाल बादल शहर के ऊपर मंडरा रहा था। वह बादल खुद तो जगमगा रहा था, मगर उसकी परछाईं बेहद अशुभ थी। वह परछाईं बेहद धीमी गति से, मानो खगोलीय रफ्तार से, बाबिचेव की गली की ओर सरक रही थी।
तुम एक थक्का हो, कहने को तो यही कहा जा सकता है। एक मरते हुए युग की रक्त-शिराओं में जमा ईर्ष्या का एक थक्का। वह मरता हुआ युग उस नए युग से ईर्ष्या करता है, जो उसकी जगह लेने के लिए आ रहा है।
मुझे अंधा हो जाना है, वाल्या। मैं गलत था, वाल्या… मुझे लगा था कि सारी भावनाएँ, प्यार, समर्पण और कोमलता, अब मर चुकी हैं, मगर नहीं, वे सब अब भी यहीं मौजूद हैं, वाल्या… बस, वे हमारे लिए नहीं हैं, हमारे हिस्से में तो बस ईर्ष्या ही बची है, और बस ईर्ष्या ही ईर्ष्या… मेरी आँखें फोड़ दो, वाल्याय मैं अंधा हो जाना चाहता हूँ!
मैं सोचता हूँ कि जब कोई दिल टूटता है, तो कैसी आवाज आती होगी?
कल्पना-शक्ति ही तो बुद्धि की प्रेमिका है।
मैं दहशतजदा होकर सुनता हूँ। यह किसी विधर्मी पुजारी की हँसी है। मैं ठीक वैसे ही सुनता हूँ, जैसे कोई अंधा व्यक्ति किसी रॉकेट के फटने की आवाज सुनता हो। -यूरी ओलेशा
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