27 सितंबर 1907 को बंगा, पंजाब, ब्रिटिश राज (अब पंजाब, पाकिस्तान) भगत सिंह (पुत्र सरदार किशन सिंह संधू एवं विद्यावती) का जन्म हुआ। भगत सिंह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख, अग्रणी युवा क्रांतिकारी थे। #BhagatSingh को बहुत कम उम्र में 23 मार्च 1931 को उनके दो अन्य साथियों राजगुरू और सुखदेव को ब्रिटिश भारत की सरकार ने लाहौर सेंट्रल जेल में फांसी दे दी। यहां पेश हैं हर दिल अजीज शहीदेआजम भगत सिंह के कुछ विचारणीय उद्धरण
जब हम बिना किसी स्वाभाविक या ठोस आधार के अपने जीवन में बिना तर्क वाले रहस्यवाद को अपनाते हैं, तो हम दयनीय और हास्यास्पद बन जाते हैं। हम जैसे लोग, जिन्हें हर तरह से क्रांतिकारी होने पर गर्व है, उन्हें उन सभी कठिनाइयों, चिंताओं, दर्द और पीड़ा को सहने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए जो हम खुद शुरू किए गए संघर्षों से बुलाते हैं और जिनके लिए हम खुद को क्रांतिकारी कहते हैं।
मैं उस सर्वशक्तिमान परम सत्ता के अस्तित्व को ही नकारता हूँ।
अहिंसा आत्म-शक्ति के सिद्धांत पर आधारित है, जिसमें विरोधी को अंततः जीतने की उम्मीद में कष्ट सहा जाता है। लेकिन क्या होता है जब ऐसी कोशिश अपने मकसद को हासिल करने में नाकाम हो जाती है? यहीं पर आत्म-शक्ति को शारीरिक शक्ति के साथ मिलाना जरूरी हो जाता है, ताकि अत्याचारी और बेरहम दुश्मन की दया पर निर्भर न रहना पड़े। आलोचना और स्वतंत्र सोच एक क्रांतिकारी के दो जरूरी गुण हैं।
भगवान की उत्पत्ति के बारे में मेरा अपना विचार यह है कि इंसान की सीमाओं, उसकी कमजोरियों और खामियों को ध्यान में रखते हुए, भगवान की काल्पनिक सत्ता बनाई गई थी। इसका मकसद इंसान को मुश्किल हालात का बहादुरी से सामना करने, खतरों का डटकर मुकाबला करने और खुशहाली व समृद्धि के समय अपने जोश पर काबू रखने के लिए प्रेरित करना था। भगवान को उनके अपने नियमों और माता-पिता जैसी उदारता के साथ विस्तार से चित्रित किया गया था। जब उनके गुस्से और नियमों की बात होती थी, तो वे एक रोक लगाने वाली शक्ति के तौर पर काम करते थे ताकि इंसान समाज के लिए खतरा न बन जाए। जब उनके माता-पिता जैसे गुणों की बात होती थी, तो वे पिता, माता, बहन, भाई, दोस्त और मददगार की भूमिका निभाते थे। ताकि जब इंसान बहुत मुश्किल में हो और सभी दोस्तों ने उसे धोखा दिया हो या छोड़ दिया हो, तो उसे इस विचार से सांत्वना मिल सके कि एक सच्चा दोस्त अभी भी उसकी मदद और समर्थन के लिए मौजूद है, और वह सर्वशक्तिमान है और कुछ भी कर सकता है। सचमुच, आदिम युग में यह समाज के लिए उपयोगी था। भगवान का विचार मुसीबत में इंसान की मदद करता है।
क्रांति की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है।
हमारे पूर्ववर्तियों पर उग्रवाद का जुनून हावी था अब गंभीर विचारों ने इस सोच को पीछे छोड़ दिया है। अब कोई रहस्यवाद नहीं! कोई अंधविश्वास नहीं! अब यथार्थवाद हमारी सोच का तरीका था। बहुत ज्यादा जरूरत पड़ने पर हम चरम तरीकों का सहारा ले सकते हैं, लेकिन जन-आंदोलनों में हिंसा से उलटे नतीजे निकलते हैं।
वह दिन आजादी के एक नए युग की शुरुआत करेगा जब बड़ी संख्या में पुरुष और महिलाएँ, मानवता की सेवा करने और लोगों को दुख-तकलीफों से आजाद कराने के विचार से हिम्मत जुटाकर, यह तय करेंगे कि उनके पास इस मकसद के लिए अपनी जिंदगी समर्पित करने के अलावा कोई और रास्ता नहीं है। वे अपने दमन करने वालों, जालिमों या शोषण करने वालों के खिलाफ जंग छेड़ेंगेय राजा बनने के लिए नहीं, या इस जन्म या अगले जन्म या मरने के बाद स्वर्ग में कोई इनाम पाने के लिए नहीं बल्कि गुलामी की बेड़ियाँ तोड़ने और आजादी व शांति स्थापित करने के लिए वे इस खतरनाक, लेकिन शानदार रास्ते पर चलेंगे।
धर्म इंसानी कमजोरी या इंसानी ज्ञान की सीमा का नतीजा है। जिस दिन हमें ऐसे बहुत से पुरुष और महिलाएँ मिल जाएँगी जिनकी सोच ऐसी होगी कि वे खुद को मानवता की सेवा और पीड़ित इंसानों की मुक्ति के अलावा किसी और चीज में नहीं लगाएँगे वही दिन आजादी के युग की शुरुआत करेगा।
क्रांति का मतलब जरूरी नहीं कि खून-खराबे वाली लड़ाई ही हो। यह बम और पिस्तौल का कोई पंथ नहीं था।
विश्वास मुश्किलों को आसान बना देता है, यहाँ तक कि उन्हें सुखद भी बना सकता है। ईश्वर में इंसान को बहुत मजबूत सांत्वना और सहारा मिल सकता है। उनके बिना, इंसान को खुद पर ही निर्भर रहना पड़ता है। तूफान और बवंडर के बीच अपने पैरों पर खड़े रहना बच्चों का खेल नहीं है। ऐसे मुश्किल पलों में, अगर इंसान में कोई घमंड होता भी है, तो वह गायब हो जाता है, और वह आम मान्यताओं को चुनौती देने की हिम्मत नहीं कर पाता अगर वह ऐसा करता है, तो हमें यह मानना होगा कि उसमें महज घमंड के अलावा कोई और मजबूती भी है।
जिंदगी तो अपने दम पर ही जी जाती है, दूसरों के कंधों पर तो सिर्फ जनाजे उठाए जाते हैं।
जिंदगी का मकसद मन को काबू में करना नहीं, बल्कि उसका सही तालमेल के साथ विकास करना हैय मकसद मरने के बाद मोक्ष पाना नहीं, बल्कि इसी दुनिया में इसका सबसे अच्छा इस्तेमाल करना हैय और मकसद सच, सुंदरता और अच्छाई को सिर्फ सोच-विचार में ही नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी के असल अनुभवों में भी उतारना है, सामाजिक तरक्की कुछ खास लोगों के ऊँचा उठने पर नहीं, बल्कि लोकतंत्र के मजबूत होने पर निर्भर करती हैय भाईचारा तभी आ सकता है जब सबको बराबरी का मौका मिले, सामाजिक, राजनीतिक और व्यक्तिगत जिंदगी में बराबरी का मौका।
आशिक, पागल और कवि एक ही तरह के होते हैं।
इतनी पढ़ाई करो कि तुम अपने विरोधियों की दलीलों का जवाब दे सको। अपनी विचारधारा को मजबूत दलीलों से लैस करो। अगर तुम किसी आम धारणा का विरोध करते हो, या किसी ऐसे महान व्यक्ति की आलोचना करते हो जिसे भगवान का अवतार माना जाता है, तो तुम देखोगे कि तुम्हारी आलोचना का जवाब तुम्हें घमंडी और अहंकारी कहकर दिया जाएगा। इसकी वजह है मानसिक अज्ञानता। तर्क और आजाद सोच, ये दो ऐसे गुण हैं जो एक क्रांतिकारी में जरूर होने चाहिए। यह कहना कि महात्माओं की आलोचना नहीं होनी चाहिए क्योंकि वे आलोचना से परे हैं, और इसलिए राजनीति, धर्म, अर्थशास्त्र और नैतिकता के बारे में वे जो कुछ भी कहते हैं वह सही है और उसे मानना ही होगा चाहे तुम मानो या न मानो यह एक ऐसी सोच है जो हमें तरक्की की ओर नहीं ले जा सकती और साफ तौर पर पीछे ले जाने वाली है।
मेरी कलम मेरे जज्बातों से इतनी वाकिफ है, कि अगर मैं इश्क लिखना भी चाहूँ तो इंकलाब लिखा जाता है।
लेकिन इंसान का फर्ज है कोशिश और मेहनत करना, कामयाबी किस्मत और हालात पर निर्भर करती है।
जिंदगी तो अपनी होती है, दूसरों की मदद तो सिर्फ जनाजे के समय चाहिए होती है।
मैं एक इंसान हूँ और जो कुछ भी इंसानियत पर असर डालता है, उससे मेरा वास्ता है।
इससे ज्यादा तसल्ली और क्या हो सकती है! भगवान को मानने वाला हिंदू राजा के तौर पर दोबारा जन्म लेने की उम्मीद कर सकता है मुसलमान या ईसाई जन्नत में उन सुख-सुविधाओं का सपना देख सकता है जो उसे अपने दुखों और बलिदानों के इनाम के तौर पर मिलेंगी। मैं किस उम्मीद की बात करूँ? मुझे पता है कि जब मेरी गर्दन के चारों ओर फंदा कसा जाएगा और मेरे पैरों के नीचे से तख्ते हटा दिए जाएँगे, तो वही मेरा अंत होगा। अगर धार्मिक शब्दों में कहूँ, तो वह पूरी तरह मिट जाने का पल होगा। मेरी आत्मा का अस्तित्व खत्म हो जाएगा। अगर मैं इस बात को इनाम के नजरिए से देखूँ, तो मुझे लगता है कि संघर्ष भरी छोटी सी जिंदगी, जिसका कोई शानदार अंत न हो, वही मेरा इनाम होगा। बस यही।
बेरहम आलोचना और आजाद सोच, क्रांतिकारी सोच के दो जरूरी गुण हैं।
किसी भी इंसान के बस की बात नहीं है कि वह क्रांति ला सके। न ही इसे किसी तय तारीख पर लाया जा सकता है। यह खास सामाजिक और आर्थिक हालात से आती है। एक संगठित पार्टी का काम ऐसे हालात से मिले मौकों का फायदा उठाना होता है।
मेरी गर्मी से राख का हर छोटा कण हरकत में है मैं ऐसा दीवाना हूँ कि जेल में भी आजाद हूँ।
प्यार हमेशा इंसान के चरित्र को ऊँचा उठाता है। यह उसे कभी नीचे नहीं गिराता, बशर्ते प्यार, प्यार ही हो।
सबसे पहले अपनी व्यक्तिगत पहचान को खत्म करो। निजी आराम के सपनों को छोड़ दो। फिर काम शुरू करो। तुम्हें इंच-इंच करके आगे बढ़ना होगा। इसके लिए हिम्मत, लगन और बहुत मजबूत इरादे की जरूरत होती है। कोई भी मुश्किल या तकलीफ तुम्हें हिम्मत हारने पर मजबूर न कर सके। कोई भी नाकामी या धोखा तुम्हें निराश न कर सके। तुम पर थोपी गई कोई भी मुसीबत तुम्हारे अंदर की क्रांतिकारी इच्छाशक्ति को खत्म न कर सके। दुख और त्याग की अग्नि-परीक्षा से गुजरकर तुम विजयी होगे। और ये व्यक्तिगत जीतें ही क्रांति की बहुमूल्य पूँजी होंगी।
हर धर्म के अनुसार राजा के विरुद्ध बगावत करना हमेशा पाप माना जाता है।
दर्शनशास्त्र इंसान की कमजोरी या ज्ञान की सीमाओं का नतीजा है।
ताकि जब इंसान बहुत मुश्किल में हो, दोस्तों ने उसे धोखा दिया हो और छोड़ दिया हो, तो उसे इस सोच से तसल्ली मिल सके कि एक सच्चा दोस्त अभी भी उसकी मदद और समर्थन के लिए मौजूद है, और वह सर्वशक्तिमान है और कुछ भी कर सकता है। मुश्किल समय में ईश्वर का विचार इंसान के लिए मददगार होता है।
समाज को इस सोच के खिलाफ भी वैसे ही लड़ना होगा जैसे मूर्ति-पूजा और धर्म की संकीर्ण सोच के खिलाफ लड़ा गया था। इसी तरह जब इंसान अपने पैरों पर खड़ा होने और यथार्थवादी बनने की कोशिश करता है, तो उसे आस्था को एक तरफ रखना होगा और उन सभी मुश्किलों और परेशानियों का बहादुरी से सामना करना होगा जिनमें हालात उसे डाल सकते हैं।
जो भी इंसान तरक्की चाहता है, उसे पुरानी आस्था की हर बात की आलोचना करनी होगी, उस पर सवाल उठाने होंगे और उसे चुनौती देनी होगी। उसे प्रचलित आस्था के हर पहलू और बारीकी पर तर्क करना होगा। अगर काफी सोच-विचार के बाद कोई किसी सिद्धांत या दर्शन को मानता है, तो उसकी आस्था का स्वागत है। उसके तर्क गलत, भ्रामक या कभी-कभी दोषपूर्ण हो सकते हैं। लेकिन उसमें सुधार की गुंजाइश होती है क्योंकि तर्क ही उसके जीवन का मार्गदर्शक होता है। लेकिन सिर्फ आस्था और अंधी आस्था खतरनाक है यह दिमाग को सुस्त कर देती है और इंसान को प्रतिक्रियावादी बना देती है।
हवा में रहेगी मेरे ख्याल की बिजली, यह मुश्ते-खाक है फ़ानी, रहे न रहे। -भगत सिंह
My pen is so intimately acquainted with my emotions that even when I wish to write of love, it writes of revolution — the revolutionary thoughts of Shaheed-e-Azam Bhagat Singh

समाचार पत्र / पत्रिका प्रकाशन, समाचार पोर्टल, फेसबुक पेज, यूट्यूब चैनल, कंटेंट राइटिंग इत्यादि कार्यों, रिपोर्टर बनने के लिए संदेश के जरिये व्हाट्सऐप 9045290693 पर संपर्क करें। धन्यवाद ! -एपी भारती (पत्रकार, रुद्रपुर, उत्तराखंड)