
2 जून 1907 को बोस्टन, मैसाचुसेट्स में डोरोथी वेस्ट का जन्म हुआ। डोरोथी वेस्ट प्रसिद्ध, चर्चित अमेरिकी उपन्यासकार, लघुकथा लेखिका और पत्रिका संपादक बनीं और हार्लेम रेनेसां की प्रमुख सदस्य रहीं। हार्लेम रेनेसां 1920 और 1930 के दशक का एक सांस्कृतिक आंदोलन था, जिसने अश्वेत कला, साहित्य और संगीत को बढ़ावा दिया। डोरोथी वेस्ट उन चुनिंदा अश्वेत महिला लेखिकाओं में से एक थीं, जिनकी रचनाएँ 1930 और 1940 के दशक की प्रमुख साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं। वेस्ट को मुख्य रूप से उनके 1948 के उपन्यास द लिविंग इज ईजी के लिए प्रसिद्धि मिली। द लिविंग इज ईजी उपन्यास एक उच्च-वर्गीय अश्वेत परिवार के जीवन और सामाजिक सीढ़ियाँ चढ़ने के उनके प्रयासों पर आधारित है। उन्होंने अपनी लघुकथाओं और निबंधों के माध्यम से संयुक्त राज्य अमेरिका में अश्वेत लोगों के अनुभवों की जटिलताओं को भी उजागर किया, इन रचनाओं ने रूढ़ियों को चुनौती दी और नस्ल, वर्ग तथा लिंग जैसे विषयों की पड़ताल की। अमेरिका में काले मूल निवासियों और अफ्रीकी मूल के लोगों से व्यापक पैमाने पर भेदभाव किया जाता था। डोरोथी वेस्ट ने इसी के खिलाफ लगातार अपना प्रतिरोध जताया।
डोरोथी वेस्ट का निधन 16 अगस्त, 1998 को 91 वर्ष की आयु में, बोस्टन स्थित न्यू इंग्लैंड मेडिकल सेंटर में हुआ। उनकी मृत्यु का कारण कभी आधिकारिक तौर पर जारी नहीं किया गया, लेकिन माना जाता है कि उनकी मृत्यु प्राकृतिक कारणों से हुई थी। अपनी मृत्यु के समय, वह हार्लेम रेनेसां आंदोलन की जीवित बची अंतिम सदस्यों में से एक थीं। जब उनसे पूछा गया कि वह अपनी विरासत के रूप में किस रूप में याद किया जाना चाहेंगी, तो उन्होंने जवाब दिया, कि मैं डटी रही। कि मैंने कभी यह नहीं कहा कि मैं यह नहीं कर सकती। वेस्ट ने अपने लेखन की शुरुआत अपनी किशोरावस्था में ही कर दी थी, उस समय उनकी द बोस्टन पोस्ट और बोस्टन जैसे अखबारों में अपनी कहानियाँ छपती थीं। वेस्ट ने अपनी पहली कहानी सात साल की उम्र में लिखी थी। उनका पहला प्रकाशित काम, प्रॉमिस एंड फुलफिलमेंट नाम की एक छोटी कहानी, तब द बोस्टन पोस्ट में छपी थी जब वे 14 साल की थीं। 1928 और 1930 के बीच वेस्ट के कुछ अन्य शुरुआती लेख सैटरडे इवनिंग क्विल में प्रकाशित हुए थे। यह एक अल्पकालिक वार्षिक साहित्यिक पत्रिका थी, जो उसी नाम के एक साहित्यिक क्लब से निकली थी, और वेस्ट उस क्लब की संस्थापक सदस्यों में से एक थीं।
यहां प्रस्तुत हैं डोरोथी वेस्ट के कुछ प्रेरक, विचारणीय उद्धरण
हमेशा लोग हमें घूरते रहते थे। जब भी हम अपने उस मोहल्ले से बाहर जाते थे जहाँ के लोग हमें जानते थे, तो लोग हमें ऐसे निहारते थे, मानो हम किसी काँच के जार में रखे गए नमूने हों। मेरी माँ ने हमें इसके लिए तैयार किया था। जब वह हमें घर की सामने वाली सीढ़ियों से नीचे ले जाती थीं, तो वह कुछ ऐसा कहती थीं जिसे सुनने के लिए हमारी मुस्कान भी बेताब रहती थी, चलो बच्चों, बाहर चलते हैं और इन गोरे लोगों को पागल कर देते हैं! उसने यह बात बिना किसी कड़वाहट के कही, और उसने इसे इतने मजेदार अंदाज में कहा कि हम हँस पड़े। वह हमें एक ऐसी दुनिया में आसानी से दाखिल करवा रही थी, जो हमसे कहीं ज्यादा ऊँची और बड़ी थी। अगर वह हमें खुद को उस हास्य की नजर से देखना न सिखा पाती, भले ही वह हास्य कितना भी व्यंग्यपूर्ण क्यों न हो, जो दिल को गरिमा देता है, तो वह खुद को कभी माफ न कर पाती कि उसने हमारी हिम्मत को टूटने दिया, इससे पहले कि हम उसे गर्व के कवच से ढकना सीख पाते।
सुंदरता तो बस ऊपरी दिखावा है, असली रूप तो हड्डियों तक बदसूरत होता है। और जब सुंदरता ढल जाती है, तो वह बदसूरती ही अपना असली रूप दिखाती है।
पहचान कोई जन्मजात चीज नहीं है। यह परिस्थितियों, संवेदनशीलता और खुद पर तरस न खाने की भावना से बनती है।
उसे यह सिखाया गया था कि अगर कोई दूसरा भूखा हो, चाहे वह इंसान हो या जानवर, दोस्त हो या अजनबी, तो रोटी बाँटे बिना खाना, भगवान का अपमान करने जैसा है।
क्योंकि अगर आप किसी को बहुत अच्छी तरह से नहीं जानते, तो आप उसकी ऊपरी खूबियों पर ही प्रतिक्रिया देते हैं, उन सतही बातों पर, जो चिंगारियों की तरह उससे निकलती रहती हैं, लेकिन जब आप उन चिंगारियों को पार करके उस इंसान तक पहुँचते हैं, तो आपको बस एक इंसान ही मिलता है, पसंद-नापसंद, डर और इच्छाओं का एक बड़ा-सा मेल।
वह अपने आकर्षण और सुंदरता से उसके घर को रोशन कर देती, और उसके बिस्तर को खुशियों से भर देती, और यह सब वह बिना किसी शर्मिंदगी के करती, उसे कभी भी किसी दूसरे मर्द की यादों से उसके घर की पवित्रता को कलंकित करने की जरूरत नहीं पड़ी।
रंग का भेद तो झूठा था, लेकिन प्यार का नहीं।
कोई भी जिंदगी ऐसी नहीं होती, जो इतिहास में अपना योगदान न देती हो।
यह जानना कि दुनिया में जानने के लिए कितना कुछ है, यही जिंदगी जीना सीखने की शुरुआत है।
मैं एक लेखिका हूँ। मैं न तो खाना बनाती हूँ और न ही घर की साफ-सफाई करती हूँ।
मेरा एक नियम है, इक्कीस साल से ज्यादा उम्र के लोगों से तब तक कोई सवाल न पूछना, जब तक वे खुद कुछ न बताएँ। ऐसा करके मैं उन्हें झूठ बोलने का विकल्प देती हूँ, अगर वे चाहें तो झूठ बोल सकते हैं। अगर वे चाहते कि मुझे सच पता चले, तो वे बिना मेरे पूछे ही मुझे सच बता देते। मेरे हिसाब से यह बिल्कुल सही है।
जब सारे कागजात पर दस्तखत हो गए, तो मेरी आजादी मुझसे छीन ली गई। मुझे गलियारों से होते हुए एक कमरे में ले जाया गया, जो अब मेरी जिंदगी की नई सीमा बनने वाला था। मुझसे मेरे कपड़े उतारने को कहा गया, और मुझे वह अजीब-सा हॉस्पिटल गाउन पहना दिया गया। फिर दिन-दहाड़े ही मुझे बिस्तर पर सुला दिया गया, ठीक वैसे ही, जैसे किसी बच्चे से उसकी सारी सहूलियतें छीनकर उसे सजा दी जा रही हो। -डोरोथी वेस्ट
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