
26 अप्रैल 121 को रोम, इटली में मार्कस ऑरेलियस (मार्कस ऑरेलियस एंटोनिनस) का जन्म हुआ। मार्कस ऑरेलियस 161 से 180 तक रोमन सम्राट रहा और वह स्टोइक दार्शनिक बना। नर्वा-एंटोनिन राजवंश का सदस्य मार्कस ऑरेलियस उन शासकों में से अंतिम था जिसे बाद में पांच अच्छे सम्राट के रूप में दर्ज किया गया। मार्कस ऑरेलियस पैक्स रोमाना का भी अंतिम सम्राट था, यह रोमन साम्राज्य के लिए सापेक्ष शांति, स्थिरता और सुकून का वह युग था जो 27 ईसा पूर्व से 180 ईस्वी तक चला। मार्कस ऑरेलियस ने 140, 145 और 161 में रोमन कौंसल के रूप में कार्य किया। इतिहासकार फिलोस्ट्रेटस के अनुसार अपने शासनकाल के अंतिम दौर में, जब मार्कस वृद्ध व्यक्ति बन चुका तब भी उसने चेरोनिया के सेक्स्टस के सानिध्य में अध्ययन किया, मार्कस ऑरेलियस बोयोटियाई दार्शनिक सेक्स्टस का अत्यंत जिज्ञासु शिष्य और अक्सर उनके साथ समय बिताता। लूसियस ने रास्ते में सम्राट मार्कस ऑरेलियस से मिले और उनसे पूछा कि वे कहाँ जा रहे हैं और किस काम से निकले हैं? मार्कस ने उत्तर दिया, एक वृद्ध व्यक्ति के लिए भी सीखना अच्छी बात है मैं अभी दार्शनिक सेक्स्टस के पास जा रहा हूँ, ताकि मैं उन बातों को सीख सकूँ जिन्हें मैं अभी तक नहीं जानता। इस पर लूसियस ने स्वर्ग की ओर हाथ उठाते हुए कहा, हे ज्यूस! रोमनों का राजा, Marcus Aurelius अपने बुढ़ापे में भी अपनी पट्टियाँ (नोटबुक) उठाता है और सीखने के लिए विद्यालय जाता है। यहां प्रस्तुत हैं मार्कस ऑरेलियस के कुछ गंभीर, विचारणीय, अनुकरणीय उद्धरण
आपके मन पर आपका अपना नियंत्रण है, बाहरी घटनाओं पर नहीं। इस बात को समझें, और आपको शक्ति प्राप्त होगी।
जीवन की सुंदरता पर अपना ध्यान केंद्रित करें। तारों को निहारें, और स्वयं को उनके साथ-साथ दौड़ते हुए देखें।
आपके जीवन की प्रसन्नता, आपके विचारों की गुणवत्ता पर निर्भर करती है।
हम जो कुछ भी सुनते हैं, वह केवल एक राय होती है, तथ्य नहीं। हम जो कुछ भी देखते हैं, वह केवल एक दृष्टिकोण होता है, सत्य नहीं।
इस बात पर बहस करने में अपना समय व्यर्थ न करें कि एक अच्छा इंसान कैसा होना चाहिए। बल्कि, स्वयं एक अच्छा इंसान बनें।
यदि आप किसी बाहरी चीज से व्यथित हैं, तो वह पीड़ा उस चीज के कारण नहीं है, बल्कि उस चीज के प्रति आपके अपने आकलन (सोच) के कारण है, और इसे रद्द करने की शक्ति आपके पास किसी भी क्षण होती है।
जब आप सुबह उठें, तो सोचें कि जीवित होना, सोचना, आनंद लेना और प्रेम करना कितना बड़ा सौभाग्य है।
सबसे अच्छा बदला यह है कि आप उस व्यक्ति जैसे न बनें जिसने आपको चोट पहुँचाई है।
आत्मा अपने विचारों के रंग में रंग जाती है।
इंसान को मृत्यु से नहीं डरना चाहिए, बल्कि उसे इस बात से डरना चाहिए कि उसने कभी जीना शुरू ही नहीं किया।
उन चीजों को स्वीकार करें जिनसे भाग्य आपको जोड़ता है, और उन लोगों से प्रेम करें जिनसे भाग्य आपको मिलाता है, लेकिन ऐसा पूरे दिल से करें।
भविष्य को कभी भी आपको परेशान न करने दें। यदि आपको उसका सामना करना पड़ा, तो आप उसका सामना उसी तर्क-बुद्धि के हथियारों से करेंगे, जो आज आपको वर्तमान के विरुद्ध सशक्त बनाते हैं।
हमारा जीवन वैसा ही बनता है, जैसा हमारे विचार उसे बनाते हैं।
जब भी आप किसी में कोई दोष निकालने वाले हों, तो स्वयं से यह प्रश्न पूछेंरू मेरा कौन सा दोष, उस दोष से सबसे अधिक मिलता-जुलता है जिसकी मैं अभी आलोचना करने वाला हूँ?
यदि कोई मुझे यह दिखा सके कि मैं जो सोचता या करता हूँ, वह सही नहीं है, तो मैं खुशी-खुशी बदल जाऊँगाय क्योंकि मैं तो सत्य की खोज में हूँ, और सत्य से किसी को कभी कोई वास्तविक हानि नहीं पहुँची है। हानि तो उस व्यक्ति की होती है, जो अपने ही भ्रम और अज्ञान में डूबा रहता है।
मैंने अक्सर सोचा है कि ऐसा क्यों है कि हर इंसान बाकी सभी लोगों की तुलना में खुद से सबसे अधिक प्रेम करता है, फिर भी वह अपने बारे में अपनी खुद की राय को, दूसरों की राय की तुलना में कम महत्व देता है।
यदि कोई कार्य सही नहीं है, तो उसे न करें, यदि कोई बात सच नहीं है, तो उसे न कहें।
जीवन का उद्देश्य बहुमत के पक्ष में खड़ा होना नहीं है, बल्कि स्वयं को पागलों की भीड़ में शामिल होने से बचाना है।
एक सुखी जीवन के लिए बहुत कम चीजों की आवश्यकता होती है, वह सब कुछ आपके भीतर ही मौजूद है, आपके सोचने के तरीके में।
सबसे अच्छा बदला यह है कि आप अपने शत्रु जैसे न बनें।
एक नेक जीवन जिएँ। यदि ईश्वर हैं और वे न्यायप्रिय हैं, तो उन्हें इस बात की परवाह नहीं होगी कि आप कितने बड़े भक्त रहे हैं, बल्कि वे आपके उन सद्गुणों के आधार पर आपका स्वागत करेंगे, जिनके अनुसार आपने अपना जीवन जिया है। यदि ईश्वर हैं, लेकिन वे न्यायप्रिय नहीं हैं, तो आपको उनकी पूजा करने की इच्छा ही नहीं होनी चाहिए। और यदि ईश्वर हैं ही नहीं, तो आपका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा, लेकिन आपने एक ऐसा नेक जीवन जिया होगा, जो आपके प्रियजनों की स्मृतियों में सदैव जीवित रहेगा।
अपनी चोट लगने की भावना को त्याग दें, और ऐसा करते ही वह चोट स्वयं ही लुप्त हो जाएगी। गुस्से के नतीजे, उसके कारणों से कहीं ज्यादा गंभीर होते हैं।
जब कोई दूसरा आप पर इल्जाम लगाता है या आपसे नफरत करता है, या लोग इसी तरह की बुराइयाँ करते हैं, तो उनकी आत्मा में झाँककर देखें कि वे किस तरह के लोग हैं। आपको एहसास होगा कि इस बात की चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है कि वे आपके बारे में कोई खास राय रखें।
पहला नियम है कि अपनी आत्मा को शांत रखें। दूसरा नियम है कि चीजों का सामना करें और उन्हें वैसे ही देखें जैसी वे असल में हैं।
खुद को मरा हुआ समझें। आप अपनी जिंदगी जी चुके हैं। अब, जो कुछ बचा है, उसे ठीक से जिएँ। जो चीज रोशनी नहीं फैलाती, वह अपना ही अँधेरा पैदा करती है।
ऐसा बर्ताव न करें जैसे आप दस हजार साल जीने वाले हैं। मौत आपके सिर पर मंडरा रही है। जब तक आप जिंदा हैं, जब तक यह आपके बस में है, अच्छे इंसान बनें।
भविष्य के लिए याद रखने लायक एक नियम यह है कि जब भी कोई चीज आपको कड़वाहट महसूस करने के लिए उकसाए, तो यह न सोचें कि यह एक बदकिस्मती है, बल्कि यह सोचें कि इसे गरिमा के साथ सहना ही खुशकिस्मती है।
आपके पास हमेशा यह विकल्प होता है कि आप कोई राय न रखें। जिन चीजों पर आपका कोई जोर नहीं चलता, उनके बारे में परेशान होने या अपनी आत्मा को तकलीफ देने की कभी कोई जरूरत नहीं होती। ये चीजें आपसे यह नहीं कह रहीं कि आप उन्हें जज करें। उन्हें उनके हाल पर छोड़ दें। -मार्कस ऑरेलियस
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