22 सितंबर 1988 को कराची, सिंध, पाकिस्तान में मशहूर पाकिस्तानी उर्दू शायर, पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर और साइकोएनालिस्ट रईस अमरोहवी (सैयद मुहम्मद मेहदी, जन्म 12 सितंबर 1914 अमरोहा, यूनाइटेड प्रोविंसेस ऑफ आगरा एंड अवध, ब्रिटिश इंडिया) की हत्या हुई। रईस अमरोहवी अपनी कतानिगारी (रुबाई या चार पंक्तियों वाली कविता लिखने) की शैली के लिए अधिक जाने गए। उन्होंने लंबे समय पाकिस्तानी अखबार जंग के लिए रुबाइयाँ लिखीं। रईस अमरोहवी ने उर्दू भाषा को बढ़ावा दिया और पाकिस्तान में उर्दू बोलने वाले लोगों का समर्थन किया। रईस अमरोहवी के परिवार को शायरों का परिवार माना जाता है। रईस अमरोहवी शायर जौन एलिया के बड़े भाई थे। शिया मुस्लिम रईस अमरोहवी के पिता शफीक़ हसन साहित्य और खगोल विज्ञान के विद्वान थे। उन्हें अरबी, अंग्रेजी, फारसी, हिब्रू और संस्कृत भाषाओं का अच्छा ज्ञान था और वे अपने समय के जाने-माने बुद्धिजीवियों के साथ संपर्क में थे। रईस अमरोहवी का परिवार 19 अक्टूबर 1947 को हिंदुस्तान से पाकिस्तान चला गया और कराची में बस गया।
1972 में सिंध असेंबली सिंध टीचिंग, प्रमोशन एंड यूज ऑफ सिंधी लैंग्वेज बिल पास जिससे प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो के शासनकाल में विवाद और भाषा को लेकर हिंसा हुई। अमरोहवी ने अपनी मशहूर कविता लिखी, उर्दू का जनाजा है जरा धूम से निकले। रईस अमरोहवी स्क्रिप्टराइटर भी थे, उन्होंने वक्त की पुकार (1967) फिल्म की स्क्रिप्ट लिखी थी। यह फिल्म पत्रकार (उनके भाई मुहम्मद तकी पर आधारित) के बारे में एक स्पाई थ्रिलर थी। यह फिल्म देश-विरोधी तत्वों का पर्दाफाश करने और 1971 में बांग्लादेश के अलग होने की घटना का पहले से अंदाजा लगाने के बारे में थी। #RaeesAmrohvi अपनी कतानिगारी (रुबाई लिखने) की शैली के लिए जाने जाते थे। रईस अकादमी नाम का एक संस्थान स्थापित किया, जहाँ लेखकों को भावनात्मक और नैतिक मूल्यों का प्रशिक्षण दिया जाता था। उन्होंने मेटाफिजिक्स (अध्यात्म-विज्ञान), ध्यान और योग के विषयों पर कई किताबें भी प्रकाशित कीं। 22 सितंबर 1988 को एक चरमपंथी धार्मिक उन्मादी समूह ने रईस अमरोहवी की हत्या कर दी।
यहां पेश हैं रईस अमरोहवी की दो ग़ज़लें और कुछ शेर
खामोश जिंदगी जो बसर कर रहे हैं हम
गहरे समुंदरों में सफर कर रहे हैं हम
सदियों तक एहतिमाम-ए-शब-ए-हिज्र में रहे
सदियों से इंतिजार-ए-सहर कर रहे हैं हम
जर्रे के जख्म दिल पे तवज्जोह किए बगैर
दरमान-ए-दर्द-ए-शम्स-ओ-कमर कर रहे हैं हम
हर चंद नाज-ए-हुस्न पे गालिब न आ सके
कुछ और मारके हैं जो सर कर रहे हैं हम
सुब्ह-ए-अजल से शाम-ए-अबद तक है एक दिन
ये दिन तड़प तड़प के बसर कर रहे हैं हम
कोई पुकारता है हर इक हादसे के साथ
तखलीक-ए-काएनात-ए-दिगर कर रहे हैं हम
ऐ अर्सा-ए-तलब के सुबुक-सैर कघफिलो
ठहरो कि नज्म-ए-राह-ए-गुजर कर रहे हैं हम
लिख लिख के अश्क ओ खूं से हिकायात-ए-जिंदगी
आराइश-ए-किताब-ए-बशर कर रहे हैं हम
तख्मीना-ए-हवादिस-ए-तूफाँ के साथ साथ
बत्न-ए-सदफ में वज्न-ए-गोहर कर रहे हैं हम
हम अपनी जिंदगी तो बसर कर चुके रईस
ये किस की जीस्त (जीवन) है जो बसर कर रहे हैं हम।

गर्द में अट रहे हैं एहसासात
धीमे धीमे बरस रही है रात
जल उठा इक चराग-ए-शाम तो क्या
बुझ गए बे-शुमार इम्कानात
हाए माजी की दिल-नशीं यादें
हाए खूँ-ख्वार भेड़ियों की बरात
च्यूंटियाँ जैसे जेहन पर रेंगें
उफ ये मेरे लतीफ एहसासात
भूत बन कर मुझे डराती रहीं
मेरी ना-आफ्रीदा तख्लीकात
कौन आया मिरे त’आकुब में
वही फिक्र-ओ-ख्याल के जिन्नात
दफ’अतन किस ने कहकहा मारा
ये अँधेरे में कौन है मिरे सात
सरसर-ए-शब कहाँ कि पत्तों में
कर्ब-ए-गम से कराहती है हयात
मुझ से मुझ को न छीन कर ले जाए
शाहजादी-ए-किश्वर-ए-जुल्मात
सुब्ह जागा तो याद भी न रहा
रात थी चाँदनी कि चाँदनी रात
तूदा-ए-रेग ओ नख्ल-ए-खुश्क-ए-चिनार
छुप गई किस की ओट में बरसात
ये दरख्त-ए-कुहन लिसान-उल-गैब
और ये शाख-ए-खुश्क बर्ग-ए-नबात
क्या यही है रईस-अमरोहवी
उड़ के आए हैं दूर से जर्रात।

दिल को एहसास की शिद्दत ने कहीं का ना रखा, खुद मोहब्बत को मोहब्बत ने कहीं का ना रखा।
उर्दू का जनाजा है जरा धूम से निकले, क्यूँ जान-ए-हजीं खतरा-ए-मौहूम से निकले।
मुद्दतों से मुंतजिर हैं और आह चुकती नहीं, रहमत-ए-बारी भी यूएसएड होकर रह गई। (यूएसएड, अमेरिकी सहायता)
शायद इसे इश्क भी न समझे, जिस कर्ब (पीड़ा) में अक्ल मुब्तिला है।
किस ने देखे हैं तिरी रूह के रिसते हुए जख्म, कौन उतरा है तिरे कल्ब की गहराई में?
पहले ये शुक्र कि हम हद्द-ए-अदब से न बढ़े, अब ये शिकवा कि शराफत ने कहीं का न रखा!
हम अपने हाल-ए-परेशाँ पे बारहा रोए, और उस के ब’अद हँसी हम को बारहा आई!
दिल से मत सरसरी गुजर कि रईस, ये जमीं आसमाँ से आती है!
अपने को तलाश कर रहा हूँ, अपनी ही तलब से डर रहा हूँ! (तुम लोग हो आँधियों की जद में, मैं कहत-ए-हवा से मर रहा हूँ) -रईस अमरोहवी
It is the funeral procession of Urdu; let it depart with grandeur. Brief introduction to the Pakistani Urdu poet, paranormal investigator, and psychoanalyst Raees Amrohvi, along with his ghazals and couplets
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