1 अगस्त 2000 को मुंबई महाराष्ट्र में अली सरदार जाफरी (जन्म 29 नवंबर 1913 बलरामपुर, यूनाइटेड प्रोविंसेस ऑफ आगरा एंड अवध, ब्रिटिश भारत) का निधन हुआ। अली सरदार जाफरी उर्दू भाषा के मशहूर भारतीय लेखक, शायर, आलोचक और फिल्मी गीतकार थे। जाफरी ने अपने साहित्यिक सफर की शुरुआत 1938 में अपनी कहानियों के पहले संग्रह मंजिल के प्रकाशन के साथ की। उनकी कविताओं का पहला संग्रह परवाज 1944 में प्रकाशित हुआ। 1936 में अली सरदार जाफरी ने लखनऊ में प्रोग्रेसिव राइटर्स मूवमेंट (प्रगतिशील लेखक संघ) के पहले सम्मेलन की अध्यक्षता की। 1939 में #AliSardarJafri नया अदब के सह-संपादक बने, नया अदब प्रोग्रेसिव राइटर्स मूवमेंट को समर्पित साहित्यिक पत्रिका थी और 1949 तक प्रकाशित होती रही।
1998 में अली सरदार जाफरी फिराक गोरखपुरी (1969) और कुर्रतुल-एन-हैदर (1989) के बाद ज्ञानपीठ पुरस्कार (1997) पाने वाले तीसरे उर्दू शायर बने। भारतीय ज्ञानपीठ ने कहा, जाफरी उन लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो समाज में अन्याय और दमन के खघ्लिाफ लड़ रहे हैं। अली सरदार जाफरी को कई अन्य महत्वपूर्ण पुरस्कार और सम्मान भी मिले, जिनमें पद्म श्री (1967), जवाहरलाल नेहरू फेलोशिप (1969), इकबाल अध्ययन के लिए पाकिस्तान सरकार से स्वर्ण पदक (1978), कविता के लिए उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी पुरस्कार, मखदूम पुरस्कार, फैज अहमद फैज पुरस्कार, मध्य प्रदेश सरकार से इकबाल सम्मान पुरस्कार और महाराष्ट्र सरकार से संत ज्ञानेश्वर पुरस्कार शामिल मिले। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ने उन्हें 1986 में डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया। दिलचश्प है कि पचास साल पहले उन्हें विश्वविद्यालय से निकाल दिया गया था। वे यह सम्मान पाने वाले चौथे व्यक्ति थे, उनसे पहले डॉ. अल्लामा इकबाल, श्रीमती सरोजिनी नायडू और जिगर मुरादाबादी को यह सम्मान मिला था। अली सरदार जाफरी की रचनाओं का कई भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ है। यहां पेश हैं अली सरदार जाफरी की दो कविताएं
उठो हिन्द के बागबानो उठो
उठो इंक़लाबी जवानो उठो
किसानों उठो कामगारो उठो
नई जिंदगी के शरारो उठो
उठो खेलते अपनी जंजीर से
उठो खाक-ए-बंगाल-ओ-कश्मीर से
उठो वादी ओ दश्त ओ कोहसार से
उठो सिंध ओ पंजाब ओ मल्बार से
उठो मालवे और मेवात से
महाराष्ट्र और गुजरात से
अवध के चमन से चहकते उठो
गुलों की तरह से महकते उठो
उठो खुल गया परचम-ए-इंक़लाब
निकलता है जिस तरह से आफ्ताब
उठो जैसे दरिया में उठती है मौज
उठो जैसे आँधी की बढ़ती है फौज
उठो बर्क़ की तरह हँसते हुए
कड़कते गरजते बरसते हुए
गुलामी की जंजीर को तोड़ दो
जमाने की रफ्तार को मोड़ दो।

बढ़ेंगे, अभी और आगे बढ़ेंगे!
वो बिजली-सी चमकी, वो टूटा सितारा,
वो शोला-सा लपका, वो तड़पा शरारा,
जुनूने-बगावत ने दिल को उभारा,
बढ़ेंगे, अभी और आगे बढ़ेंगे!
गरजती हैं तोपें, गरजने दो इनको
दुहुल बज रहे हैं, तो बजने दो इनको,
जो हथियार सजते हैं, सजने दो इनको
बढ़ेंगे, अभी और आगे बढ़ेंगे!
कुदालों के फल, दोस्तों, तेज कर लो,
मुहब्बत के सागर को लबरेज कर लो,
जरा और हिम्मत को महमेज कर लो,
बढ़ेंगे, अभी और आगे बढ़ेंगे!
विजारत की मंजिल हमारी नहीं है,
ये आंधी है, बादे-बहारी नहीं है,
जिरह हमने तन से उतारी नहीं है,
बढ़ेंगे, अभी और आगे बढ़ेंगे!
हुकूमत के पिंदार को तोड़ना है,
असीरो-गिरफ्तार को छोड़ना है,
जमाने की रफ्तार को मोड़ना है,
बढ़ेंगे, अभी और आगे बढ़ेंगे!
चट्टानों में राहें बनानी पड़ंेगी,
अभी कितनी कड़ियां उठानी पड़ेंगी,
हजारों कमानें झुकानी पड़ेंगी,
बढ़ेंगे, अभी और आगे बढ़ेंगे!
हदें हो चुकीं खत्म बीमो-रजा की,
मुसाफत से अब अज्मे-सब्रआजमां की,
जमाने के माथे पे है ताबनाकी,
बढ़ेंगे, अभी और आगे बढ़ेंगे!
उफक़ के किनारे हुए हैं गुलाबी,
सहर की निगाहों में हैं बर्क़ताबी,
कदम चूमने आई है कामयाबी,
बढ़ेंगे, अभी और आगे बढ़ेंगे!
मसाइब की दुनिया को पामाल करके,
जवानी के शोलों में तप के, निखर के,
जरा नज्मे-गीती से ऊंचे उभर के,
बढ़ेंगे, अभी और आगे बढ़ेंगे!
महकते हुए मर्गजारों से आगे,
लचकते हुए आबशारों से आगे,
बहिश्ते-बरीं की बहारों से आगे,
बढ़ेंगे, अभी और आगे बढ़ेंगे! -अली सरदार जाफरी
With thunder, lightning, and a torrential downpour—break the chains of servitude and alter the course of the times: two poems by the progressive poet Ali Sardar Jafri
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