
55 ईसा पूर्व, रोम, इटली में 15 अक्टूबर को रोमन कवि और दार्शनिक ल्यूक्रेटियस (टाइटस ल्यूक्रेटियस कारस, जन्म 99 ईसा पूर्व) का निधन हुआ। #Lucretius की एकमात्र ज्ञात रचना दार्शनिक कविता डी रेरम नेचुरा (ऑन द नेचर ऑफ थिंग्स और ऑन द नेचर ऑफ द यूनिवर्स) है। यह एपिक्यूरियनवाद के सिद्धांतों और दर्शन पर आधारित एक शिक्षाप्रद कृति है। ल्यूक्रेटियस प्रभावशाली रोमन राजनेता, वक्ता और कवि गियस मेमियस के मित्र और आश्रित थे। कविता डी रेरम नेचुरा गियस मेमियस को समर्पित है। डी रेरम नेचुरा का ऑगस्टन युग के कवियों पर गहरा प्रभाव पड़ा, विशेष रूप से वर्जिल (उनकी रचनाओं एनीड और जॉर्जिक्स में और कुछ हद तक एक्लोग्स में) तथा होरेस पर। मध्य युग के दौरान यह रचना लगभग खो गई थी, लेकिन 1417 में जर्मनी के एक मठ में पोगियो ब्रैसिओलिनी द्वारा इसे पुनः खोजा गया। इसने परमाणुवाद के विकास में (ल्यूक्रेटियस का पियरे गैसेंडी पर महत्वपूर्ण प्रभाव था) और एनलाइटनमेंट (प्रबोधन) युग के विचारकों द्वारा एक नए ईसाई मानवतावाद को गढ़ने के प्रयासों में अहम भूमिका निभाई।
जब भी कोई वस्तु बदलती है और अपनी निर्धारित सीमाओं से बाहर निकल जाती है, तो यह बदलाव उस वस्तु के लिए मृत्यु के समान है जो पहले अस्तित्व में थी।
एपिकुरस का मानना था कि जो सिद्धांत इंद्रियों द्वारा प्राप्त साक्ष्यों का खंडन नहीं करते, उन्हें सत्य माना जा सकता है। वे इस बात को भी स्वीकार करते थे कि किसी घटना की व्याख्या के लिए एक दार्शनिक के पास एक से अधिक स्पष्टीकरण हो सकते हैं, यहाँ तक कि ऐसे स्पष्टीकरण भी, जो एक-दूसरे से बिल्कुल अलग या परस्पर विरोधी हों।
एक छोटी सी चीज भी बड़ी चीजों का उदाहरण बन सकती है और ज्ञान की ओर जाने वाले रास्ते दिखा सकती है।
शब्द दीवारों के पार चले जाते हैं और ताले-चाबी को भी चकमा दे देते हैं,
भले ही आप कितनी भी पीढ़ियों तक जीवित रहें, फिर भी, शाश्वत मृत्यु आपका इंतजार कर रही है।
जो व्यक्ति आज सूर्यास्त के बाद फिर कभी नहीं जागेगा, उसके लिए जो अनंत काल प्रतीक्षा कर रहा है।
वह उस व्यक्ति के लिए प्रतीक्षा कर रहे अनंत काल से किसी भी तरह कम नहीं है, जिसका सूरज महीनों या वर्षों पहले ही अस्त हो चुका है। और अब, हे अच्छे मेमियस, मैं चाहता हूँ कि तुम खुले मन और चिंताओं से मुक्त तेज बुद्धि के साथ सच्चे दर्शन को अपनाओ क्योंकि, मेरे नेक मेमियस, प्रकृति की महिमा को देखते हुए अब मुझे इस बारे में बात करनी ही होगी।
इसलिए, किसी व्यक्ति को संकट और विपरीत परिस्थितियों में देखना ज्यादा उपयोगी होता है, ताकि पता चल सके कि वह असल में कैसा इंसान है, क्योंकि ऐसे समय में उसके दिल की गहराई से सच बाहर आता है, उसका नकाब उतर जाता है और केवल वास्तविकता ही बचती है।
मैं बता दूँ कि हवा जब हलचल में आती है, तो वह पवन बन जाती है।
अज्ञानी लोगों के लिए सभी धर्म समान रूप से महान हैं, राजनेताओं के लिए उपयोगी हैं, और दार्शनिकों के लिए हास्यास्पद हैं।
टैंटम रिलिजियो पोटुइट सुआडेरे मैलोरम (धर्म के कारण इंसान बुराई की किस हद तक जा सकता है)।
लगातार टपकती बूंदें पत्थर में भी गड्ढा कर देती हैं।
प्यार के जाल में फंसने से बचना आसान है, लेकिन एक बार जब आप इसके मजबूत धागों और गांठों वाले जाल में फंस जाते हैं, तो वहां से निकलना मुश्किल होता है, फिर भी, अगर आप उसमें उलझ गए हैं, तो भी बाहर निकल सकते हैं बशर्ते आप खुद ही अपनी राह में रुकावट न बनें।
अनंत में कोई केंद्र नहीं हो सकता।
प्रकृति एक चीज से दूसरी चीज का निर्माण करती है, और किसी चीज का जन्म तब तक नहीं होता जब तक कि दूसरी चीज का अंत न हो जाए।
किसी व्यक्ति को विपरीत परिस्थितियों में देखें ताकि पता चल सके कि वह कैसा इंसान है, क्योंकि ऐसे समय में उसके दिल की गहराई से सच बाहर आता है और उसका नकाब उतर जाता है।
दुनिया में कोई भी चीज इतनी महान या अद्भुत नहीं है कि समय के साथ इंसान उसकी प्रशंसा करना कम न कर दे।
इंसान की सबसे बड़ी दौलत है संतोषी मन के साथ कम में भी गुजारा करनाय क्योंकि कम कभी भी कमी नहीं होता।
इसलिए, मौत से डरना मूर्खता है, क्योंकि मौत का मतलब है व्यक्तिगत पहचान का पूरी तरह से मिट जाना, और चिंताओं व दुखों से हमेशा के लिए मुक्ति मिल जाना।
मूर्ख लोग उन बातों की तारीफ करते हैं और उन्हें पसंद करते हैं जो उलझी हुई कविताओं में छिपी होती हैं वे उसी को सच मान लेते हैं जो कानों को सुनने में मीठा लगे और सुंदर शब्दों से सजा हो।
सब कुछ निरंतर गति में है, अनंत से कण निकलते हैं और एक अंतहीन नृत्य में ऊपर-नीचे दौड़ते रहते हैं।
कोई भी चीज पूरी तरह से खत्म नहीं होती, क्योंकि प्रकृति एक चीज के तत्वों से दूसरी चीज बना लेती है, और वह किसी चीज को तब तक जन्म नहीं देती, जब तक कि उसके बदले में किसी दूसरी चीज की मृत्यु न हो जाए।
जो चीज कभी धरती से उपजी थी, वह वापस धरती में ही समा जाती है। उनके मन की प्रबल शक्ति ने काम किया, और वे आकाश की दहकती सीमाओं के पार निकल गए, उन्होंने अपने विचारों और मन के जरिए असीम ब्रह्मांड का भ्रमण किया।
इस स्तर पर आपको यह मानना ही होगा कि जो कुछ भी सजीव दिखाई देता है, वह वास्तव में जड़ परमाणुओं से ही बना है। हमारे सामने दिखने वाली घटनाएं इस निष्कर्ष का खंडन नहीं करतीं, न ही इनसे कोई टकराव होता है। बल्कि, ये हमें इस बात को मानने के लिए प्रेरित करती हैं कि सजीव चीजों का जन्मकृजैसा कि मेरा मानना है जड़ तत्वों से ही हुआ है।
हर इंसान खुद से भागने की कोशिश करता है फिर भी, न चाहते हुए भी, हम उसी स्व से जुड़े रहते हैं जिससे हम नफरत करते हैं।
इसमें मौजूद परमाणुओं का बार-बार इस्तेमाल होता रहता है इसलिए, एक चीज का अंत दूसरी चीज के जन्म के लिए जरूरी हो जाता है।
नरक का कोई ऐसा गहरा गड्ढा नहीं है जो किसी का इंतजार कर रहा हो शरीर के बिना या नसों और रक्त के बिना मन का अस्तित्व संभव नहीं है इसलिए आपको यह मानना होगा कि जब शरीर नष्ट हो जाता है, तो उसमें व्याप्त आत्मा का भी अंत हो जाता है। किसी नश्वर चीज को अमर चीज के साथ जोड़ना पूरी तरह से पागलपन है।
इस तरह, संसार की हर चीज का लगातार नवीनीकरण होता रहता है, और नश्वर प्राणी एक-दूसरे पर निर्भर होकर जीते हैं। कुछ जातियाँ आगे बढ़ती हैं, तो कुछ घटती जाती हैं और कुछ ही समय में जीवित प्राणियों की पीढ़ियाँ बदल जाती हैं जैसे दौड़ने वाले धावक एक-दूसरे को जीवन की मशाल सौंप देते हैं।
जीवन अंधेरे में किया जाने वाला एक लंबा संघर्ष है।
केवल धर्म ही ऐसी बुराइयों को जन्म दे सकता है।
इसके अलावा, जिस तरह शरीर बीमारियों की भयावहता और दर्द की पीड़ा को झेलता है, उसी तरह हम देखते हैं कि मन भी व्यथा, दुःख और भय से आहत होता है। तो फिर, यह कितना स्वाभाविक है कि मृत्यु में भी मन की हिस्सेदारी हो?
कोई भी चीज पूरी तरह से शून्य में विलीन नहीं होती बल्कि सभी चीजें अपने मूल तत्वों में वापस मिल जाती हैं।
जब विशाल समुद्र में हवाएँ पानी को अशांत कर रही हों, तो किनारे से दूसरों की कठिनाइयों को देखना सुखद लगता है, ऐसा इसलिए नहीं कि किसी और की मुसीबतें आनंद देती हैं, बल्कि इसलिए कि यह एहसास सुखद होता है कि आप स्वयं उन कष्टों से मुक्त हैं।
समय का अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है, बल्कि घटनाओं से ही हमें यह बोध होता है कि क्या बीत चुका है, क्या चल रहा है, और आगे क्या होने वाला है। यह दावा नहीं किया जा सकता कि कोई भी व्यक्ति वस्तुओं की गति से अलग, केवल समय को महसूस कर सकता है।
जैसे बच्चे घने अंधेरे में हर चीज से डरते और कांपते हैं, वैसे ही हम भी उजाले में कभी-कभी उन चीजों से डर जाते हैं, जिनसे डरने की कोई वास्तविक वजह नहीं होती, ठीक वैसे ही जैसे अंधेरे में बच्चे कुछ चीजों से डरते हैं और कल्पना करते हैं कि वे सच हो जाएंगी।
अगर यह दुनिया केवल प्राकृतिक शक्तियों और प्राकृतिक नियमों का परिणाम है, तो इसमें ईश्वरीय हस्तक्षेप असंभव है।
सत्य ही सत्य के लिए प्रकाश उत्पन्न करता है।
पदार्थ और स्थान के मिश्रण के अलावा और कुछ भी अस्तित्व में नहीं है।
इसलिए, इस डर और मन के अंधेरे को सूरज की किरणों या दिन के उजाले से नहीं, बल्कि प्रकृति के स्वरूप और उसके नियमों को समझकर ही दूर किया जा सकता है। इसका मूल सिद्धांत यह है, ईश्वरीय शक्ति से भी कुछ नहीं से कुछ पैदा नहीं किया जा सकता।
आनंद और बुद्धि के स्रोत के बीच भी कुछ कड़वाहट पैदा हो जाती है, जो फूलों के भीतर ही चुभन पैदा करती है।
अगर लकड़ी के भीतर आग, धुआं और राख छिपी हो, तो इसका मतलब है कि लकड़ी उन चीजों से बनी है जो खुद लकड़ी जैसी नहीं हैं।
वस्तुओं की शुरुआती अवस्थाओं को नंगी आँखों से नहीं देखा जा सकता। -ल्यूक्रेटियस
Religion alone can give rise to evils — Thought-provoking quote by the Roman poet and philosopher Titus Lucretius Carus
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