
13 मई 1840 को निम्स, फ्रांस में अल्फोंस दौदे (लुई मैरी अल्फोंस दौदे) अल्फोंस दौदे फ्रांसीसी उपन्यासकार बने। वे जूलिया दौदे के पति और एडमी, लियोन तथा लुसियन दौदे के पिता थे। दौदे राजतंत्रवादी थे और फ्रांसीसी गणराज्य और यहूदियों के विरोधी थे। दौदे बदचलन, गैरवफादार और गैरजिम्मेदार थे। वे फ्रांसीसी साहित्यकारों की उस पीढ़ी का हिस्सा थे जो सिफिलिस (यौन रोग) से पीड़ित थी। 12 साल की उम्र संभोग शुरु करने वाले अल्फोंस दौदे अपनी शादीशुदा जिंदगी के दौरान अपने दोस्तों की प्रेमिकाओं के साथ भी शारीरिक संबंध बनाए। दौदे को अपनी बाद में लकवाग्रस्त कर देने वाली बीमारी के लिए कई दर्दनाक इलाज और ऑपरेशन करवाने पड़े। टैब्स डॉर्सेलिस नामक बीमारी से होने वाले दर्द के बारे में उनकी डायरी में लिखी बातें इन द लैंड ऑफ पेन नामक किताब में संकलित हैं, जिसका अनुवाद जूलियन बार्न्स ने किया है। उनका निधन 16 दिसंबर 1897 को पेरिस में हुआ, और उन्हें पेरे लाशेज कब्रिस्तान में दफनाया गया।
यहां पेश हैं अल्फोंस दौदे के के कुछ उद्धरण
नफरत, कमजोर लोगों का गुस्सा।
कवि वे लोग होते हैं जो आज भी दुनिया को बच्चों की नजरों से देख सकते हैं।
तकलीफ कोई बड़ी बात नहीं है। असली बात तो यह है कि आप अपने प्रियजनों को तकलीफ से कैसे बचाते हैं।
मेरी कल्पना को किताब से इससे ज्यादा कुछ नहीं चाहिए कि वह उसे बस एक ऐसा ढाँचा दे दे जिसके भीतर वह आजादी से विचरण कर सके।
महिलाओं में, खासकर उन महिलाओं में जिनका स्वभाव बच्चों जैसा होता है, अक्सर एक अजीब विसंगति देखने को मिलती है, वे झूठ बोलने में एक साथ बहुत फुर्तीली भी होती हैं और बहुत अनाड़ी भी।
बच्चे भी बड़ों जैसे ही होते हैं, दूसरों के अनुभव उनके कभी काम नहीं आते।
संगीत तो एक अलग ही दुनिया (ग्रह) है।
मौत कितनी चालाकी से हमें काट डालती है, लेकिन ऐसा दिखाती है जैसे बस छँटाई हो रही हो। पीढ़ियाँ कभी एक ही झटके में खत्म नहीं होतीं, ऐसा होना बहुत दुखद और बहुत ही स्पष्ट होता। मौत तो धीरे-धीरे, टुकड़ों में अपना काम करना पसंद करती है। चरागाह पर एक ही समय में कई तरफ से हमला होता है। हममें से कोई एक किसी दिन चला जाता है, कोई दूसरा कुछ समय बादय आपको पीछे हटकर अपने आस-पास देखना पड़ता है, ताकि आप समझ सकें कि कौन-कौन गायब हो गया है, और अपनी पूरी पीढ़ी के इस विशाल संहार को महसूस कर सकें।
दर्द सहने वाले के लिए हमेशा नया होता है, लेकिन उसके आस-पास के लोगों के लिए वह अपनी नवीनता खो देता है। मेरे सिवा बाकी सब लोग इसके आदी हो जाएँगे। इंसान बूढ़ा तो हो जाता है, पर वह परिपक्व नहीं होता।
ओह, यह मेरा दूसरा मैं कितना भयानक है, जो हमेशा बैठा रहता है, जबकि मेरा पहला मैं खड़ा होकर काम करता है, जीता है, दुख सहता है और हलचल करता रहता है। यह मेरा दूसरा मैं ऐसा है जिसे मैं कभी भी नशे में चूर नहीं कर पाया, न ही उससे आँसू बहा पाया और न ही उसे सुला पाया। और यह चीजों को कितनी गहराई से देखता है, और किस तरह उनका मजाक उड़ाता है!
कैदी आजादी को असलियत से कहीं ज्यादा शानदार समझ बैठता है। -अल्फोंस दौदे
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