
22 अगस्त 1922 को जमानी गाँव, सेंट्रल प्रोविंसेस और बरार, ब्रिटिश भारत (अब होशंगाबाद, मध्य प्रदेश) में हरिशंकर परसाई का जन्म हुआ। वे हिंदी के एक प्रसिद्ध लेखक थे। हरिशंकर परसाई आधुनिक हिंदी साहित्य के जाने-माने व्यंग्यकार और हास्य लेखक के रूप में स्थापित हुए और अपनी सरल व सीधी शैली के लिए जाने गए। उन्होंने ऐसे व्यंग्य लिखे जिनमें मानवीय मूल्यों और स्वभाव का वर्णन मिलता है। उनकी रचनाओं में उनकी आलोचनात्मक सोच और साधारण बातों को गहरे अर्थों के साथ हास्य और व्यंग्यपूर्ण ढंग से कहने की कला झलकती है। #HarishankarParsai को 1982 में उनके व्यंग्य विकलांग श्रद्धा का दौर के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। हरिशंकर परसाई जबलपुर में बसे गए और वहां से वसुधा नाम की एक साहित्यिक पत्रिका शुरू की। बहुत तारीफ मिलने के बावजूद, आर्थिक नुकसान के कारण उन्हें यह पत्रिका बंद करनी पड़ी। रायपुर और जबलपुर से प्रकाशित होने वाले हिंदी अखबार देशबंधु में हरिशंकर परसाई पूछिए परसाई से नाम के कॉलम में पाठकों के सवालों के जवाब देते थे। हरिशंकर परसाई का साप्ताहिक व्यंग्य का स्तंभ निठल्ला चिंतन कई प्रमुख हिंदी अखबारों में छपता था। हरिशंकर परसाई को हिंदी व्यंग्य विधा का आधार स्तंभ भी कहा गया। यहां प्रस्तुत हैं हरिशंकर परसाई के गंभीर, हास्य और व्यंग्यपूर्ण उद्धरण
मैं ईसा की तरह सूली पर से यह नहीं कहता – पिता, उन्हें क्षमा कर, वे नहीं जानते वे क्या कर रहे हैं। मैं कहता – पिता, इन्हें हरगिज क्षमा न करना। ये कम्बख्त जानते हैं कि ये क्या कर रहे हैं।
जो पानी छानकर पीते हैं, वे आदमी का खून बिना छना पी जाते हैं।
हमारे समाज में नारी की गुलामी के कारण ऐसी भावना व्याप्त हो गई है कि पुरुष केवल नर है और स्त्री केवल मादा, जो एक-दूसरे के पास केवल प्रजनन के प्रयोजन से आते हैं। वे और किसी कारण से, किसी और स्तर पर मिल ही नहीं सकते, यह पशु-स्तर की स्थिति है।
ब्रह्म ही सत्य है, जगत मिथ्या है, सब माया है, यह शंकराचार्य सिखाते हैं, पर सोने के सिंहासन पर बैठते हैं और सोने के कमंडल से पानी पीते हैं।
एक संगठित धर्माचार्यों और पुरोहितों की परंपरा जब भगवान के नाम पर अज्ञान और अंधविश्वास का राज चलाए, और राजनैतिक सत्ता इसमें सहयोग दे क्योंकि उसकी भी इससे रक्षा होती है, तब ये दोनों सत्ताएँ क्रूर और मानव-प्रगति-विरोधी होती हैं।
एम.ए. करने से नौकरी मिलने तक जो काम किया जाता है, उसे रिसर्च कहते हैं।
साहित्य-सृजेता को स्वतंत्र होना ही चाहिए, तभी उसका स्वर निर्भय और स्वतंत्र होगा। शासन का पिछलग्गू साहित्य, समाज को पतन की ओर ले जाएगा।
जनता की, जनता के द्वारा, जनता के लिए सरकार कैसे अपने ही लिए हो जाती है, यह अब्राहम लिंकन को नहीं मालूम था, हमें मालूम है।
साहित्य में बुढ़ापा सफेद बालों या झुर्रियों का नाम नहीं है। साहित्य में बुढ़ापे का अर्थ है, नवीन चेतना ग्रहण करने की शक्ति का लोप। अपनी मान्यताओं और मूल्यों को बदलने की भीरुता, आज के बदले विगत कल में ही जीने का मोह, प्रतिभा का शैथिल्य, यह सब न हो, तो साहित्य में बूढ़ा आदमी परिपक्व कहलाता है।
बेईमानी इतनी पुरानी बात हो गई है कि अब कोई बेईमानी की बात करे, तो लगता है बड़ा पिछड़ा हुआ आदमी है।
सारे धार्मिक अनुष्ठान मुनाफाखोर, कालाबाजारी, जमाखोर, शोषक कराते हैं, ये आम आदमी को निष्क्रिय और मूर्ख बनाते हैं।
बेइज्जती में अगर दूसरे को भी शामिल कर लो, तो आधी इज्जत बच जाती है।
हिंदी में सबसे प्रचलित और लोकप्रिय पद्धति है, अपनों की प्रशंसा और परायों की निंदा।
राजनीति से संन्यास, उससे बड़ी राजनीति करने के लिए लिया जाता है।
अच्छा भोजन करने के बाद मैं अक्सर मानवतावादी हो जाता हूँ।
प्रजातंत्र में सबसे बड़ा दोष है तो यह कि इसमें योग्यता को मान्यता नहीं मिलती, लोकप्रियता को मिलती है। हाथ गिने जाते हैं, सिर नहीं तौले जाते।
विश्वविद्यालयों में तो गुरु-कृपा से ही डिग्री मिलती है। सब जानते हैं, पढ़ने से कुछ नहीं होता। अगर आचार्य की कृपा हो जाए, तो प्रतिद्वंद्वी विद्यार्थी का अँगूठा काटकर वह प्रिय विद्यार्थी को दे देता है। राजा के लड़के और भील के लड़के में जो अंतर तब था, वही अब है।
यह मिसफिट्स का युग है भाई। जिसे जुआड़खाना चलाना चाहिए, वह मंत्री है। जिसे डाकू होना चाहिए, वह पुलिस अफसर है। जिसे दलाल होना चाहिए, वह प्रोफेसर है। जिसे जेल में होना चाहिए, वह मजिस्ट्रेट है। जिसे कथावाचक होना चाहिए, वह उपकुलपति है। जिसे जहाँ नहीं होना चाहिए, वह ठीक वहीं है।
धर्म कोई भी हो, भगवान या खुदा का निवास काले धन की तिजोरी में और गैरकानूनी शराब की बोतल में रहता है। भगवान क्षीर सागर में नहीं, गैरकानूनी मदिरा सागर में विश्राम करते हैं।
इस देश में कोई युवक नहीं जानता कि उसका आखिर होगा क्या? वह यह भी जानता है बी. ए. करने से कुछ होता नहीं है। जब तक फेल होता जाता है, विद्यार्थी कहलाता है, जब पास हो जाएगा तब बेकार कहलाएगा।
पुजारी जानता है, भगवान चाहे कहीं और हों, मगर मंदिर में तो कतई नहीं है। मुसलमान जानता है कि खुदा कहीं होगा तो मस्जिद के बाहर होगा, यहाँ तो नहीं है। मगर अपना धंधा इसी में सुरक्षित है कि लोगों को विश्वास दिलाएँ कि यज्ञ से उनका कल्याण होगा। मंदिर और मस्जिद में की गई पुकार भगवान एकदम सुनता है, सीधी हॉट लाइन है।
तबादले की एक बँधी-बँधाई नैतिक पद्धति है। अफसर या मंत्री से संबंध होने से तबादले होते हैं। फिर तबादले करने के रेट बँधे हैं। लोककर्म विभाग के रेट ऊँचे हैं, शिक्षा-विभाग के रेट कम हैं, यह एक ईमानदार प्रक्रिया है।
भारत में जितना व्यवस्थित धंधा ब्राह्मण का है, उतना मारवाड़ी का भी नहीं।
महान सभ्यता जब बीच में आकर सड़ती है, तब उसमें अछूत-प्रथा, सती-प्रथा और दहेज-प्रथा की बीमारियाँ पैदा होती हैं।
समाज के सामने शोभा बनाने की भावना बड़ी बलवती होती है। किसी भी समय आदमी इसे नहीं भूलता कि दूसरे उसे देख रहे हैं और उनकी नजरों में उसे जँचना चाहिए।
नवयुग का आवाहन, राष्ट्रीयता जैसे विषय पर लिखने के लिए अपने भीतर वैसी अनुभूति जगानी पड़ती है, सामाजिक चिंतनधारा में बहा जाता है, किनारे पर खड़े होकर लहरों का हिसाब नहीं किया जाता।
कुछ उद्देश्य है कि लोग परिवर्तनकामी न हों, वे सड़ी-गली व्यवस्था से विद्रोह न करें। शोषक-वर्ग, सामान्य जन का बेखटके शोषण करता रहे। यह एक देशव्यापी षडयंत्र है, जिसमें राजनीतिज्ञ, सरमायेदार, बुद्धिजीवी आदि शामिल हैं।
जिस समाज में धन के साथ पाप का समझौता ही प्रतिष्ठा का कारण है, वहाँ समाज का गुरु अवहेलना का पात्र हो, यह आश्चर्य की बात तो नहीं है, दुख की अवश्य है। और वह इस देश के दुर्भाग्य पर है, जो एक बार किसी समय अपने ज्ञान के आलोक से संसार को चकाचैंध करके, अब धीरे-धीरे अंधकार ही पसंद करता जा रहा है।
भक्ति, वीरता और सैक्स की मिली-जुली मानसिकता फिल्मी हीरो को नेता, उद्धारक और पथ-प्रदर्शक बना देती है।
साहित्य के आचार्यों की बात करनी चाहिए। ये रसवादी प्रकार के आचार्य हैं। ये रँडुए होकर भी अपने-आप हृदय में शृंगार रस न जाने कैसे पैदा कर लेते हैं? इन्हें आलंबन भी नहीं चाहिए शायद, क्योंकि आलंबन और चेतना का द्वंद्व होने लगता है।
धर्म का जन्म अज्ञान और डर से हुआ, आदिम मनुष्य के प्रकृति और जगत के बारे में अज्ञान और डर से। फिर धर्म संस्थागत हुआ, राजसत्ता के साथ मिला, शोषण का जरिया बना।
धन उधार देकर समाज का शोषण करने वाले धनपति को जिस दिन महाजन कहा गया होगा, उस दिन ही मनुष्यता की हार हो गयी। महाजन कहना मनुष्यत्व की हीनता स्वीकार करके ही तो संभव हुआ।
हर तरह के चोर कर्म, घूस, कालाबाजारी, मुनाफाखोरी, राजनैतिक बेईमानी, पाखँड, सबकी साधना धर्म की मदद से होती है
लेखन, व्यापार कतई नहीं है, वह जीविका का साधन हो सकता है, लेकिन वह बहुत अंशों में तपस्या है। इसलिए जिसे आत्मा पर बंधन महसूस होते हों, तो वह छोड़कर चला जाए।
कोई इंजीनियर रद्दी माल लगाकर गैर-जिम्मेदारी से कच्चे पुल का निर्माण करे तो वह जिस अपराध का भागी होगा, उसी अपराध का भागी वह कवि भी होगा, जो राष्ट्रीयता की सच्ची भावना की अनुभूति के बिना रस्म-अदाई के लिए ओजहीन राष्ट्रीय-काव्य रचेगा।
इतिहास विज्ञान है, कल्प-कथा नहीं है। जब तक वैज्ञानिक दृष्टि से, धार्मिक द्वेष से मुक्त, तथ्यपरक इतिहास नहीं पढ़ाया जाएगा, तब तक सांप्रदायिक द्वेष जा नहीं सकता।
शोषकों के वर्ग-स्वार्थों को जब कोई चुनौती देता है तो उस वर्ग के प्रवक्त्ता कहते हैं, यह आदमी खुदा से लड़ रहा है। खुदा को प्राइवेट संपत्ति का रक्षक और शोषण का एजेंट तभी से बना लिया गया था जब मनुष्य ने उसके होने की कल्पना की थी।
गाँधीवाद, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता की जो बात की जाती है, वह खास अर्थ नहीं रखती। मूल है, जो भी हाथ पड़ जाए, सत्ता पा लेना।
जिस जाति के धर्मगुरु कविता पर, साहित्य पर बंदिश लगाते हैं, उस जाति पर हम साधुओं को दया आती है। हमें उस जाति के भविष्य के बारे में भी चिंता होती है। कालिदास बच गए। उन्होंने कुमार संभव में तो शिव-पार्वती के रमण का वर्णन किया है, तो शैव उन्हें त्रिशूल से मार डालते, पर तब धर्मगुरु संकीर्ण नहीं थे।
किसी देश की जनता को अन्न और दवा से वंचित करके मार डालना, समस्या का शांतिपूर्ण हल खोजना है।
प्रंशसा के जाल में सरलता से फँसता है, मध्यम स्थिति का आदमी। जो बड़ा है, वह इसलिए कि प्रशंसा से उसका पेट आधा तो भर ही गया होगा, या इसलिए कि वह इस जाल को देख लेता है, फँसेगा नहीं। निपट निम्न श्रेणी का आदमी प्रशंसा को उपहास समझकर नाराज हो जाएगा, पर मध्यमार्गी जानता है कि वह निपट निकृष्ट नहीं है। उसके मन में बड़ा कहलाने की हविस भी होती है।
कोई-कोई सनकी राजा ऐसे होते थे कि अपने नौकर को कोड़ों से खूब पीटते थे, मगर उनकी चिकित्सा के लिए डॉक्टर तैयार रखते थे। अपनी सरकार भी सनकी जमींदार है। शिक्षक को खूब कष्ट होने देगी, मगर कल्याण-निधि जरूर खोल देगी।
रस सिद्धांतवाले काइयाँ आचार्य के पास जब शोध छात्राएँ आती हैं, तब वह तुलसीदास के हवाले से जानता है कि प्रभु उमा-रमन के बाद ही करुणायतन होते हैं।
प्रशंसा चाहना शायद देवत्व है, तभी तो हर देवता की प्रशंसा के लिए दुनिया की हर भाषा में अगणित ग्रंथ रचे गए हैं।
डॉक्टर कैंसर के रोगी को बताए कि उसे कैंसर है, तो वह स्वस्थ मानसिकता का है। पर अगर कैंसर के रोगी को डॉक्टर राग जयजयवंती सुनवाने लगे, तो डॉक्टर जरूर मानसिक रोग से ग्रस्त है। मैं जानता हूँ, कई लेखक इस देश में कैंसर से बीमार समाज को राग जयजयवंती सुनाते हैं।
जो प्रेमपत्र में मूर्खतापूर्ण बातें न लिखे, उसका प्रेम कच्चा है, उस पर विश्वास नहीं करना चाहिए। पत्र जिनता मूर्खतापूर्ण हो, उतना ही गहरा प्रेम समझना चाहिए।
सच्चा व्यंग्य जीवन की समीक्षा होता है।
मानव-चरित्र रचने के लिए मानव को देखना पड़ता है, मानव को समझना पड़ता है, उसके सुख-दुख, आशा, आकांक्षा, द्वंद्व, कुँठा सबको देखना होता है। जन-जीवन का बारीक अवलोकन करना होता है और साथ ही संवेदनात्मक दृष्टि रखनी पड़ती है।
दो अवसरों पर आदमी का चेहरा बहुत विकृत और हास्यस्पद होता है, प्रशंसा स्वीकार करते समय और प्रणय-निवेदन करते समय। बुद्धिमान मनुष्य इन दोनों अवसरों पर बहुत मूढ़ लगता है।
इस कौम की आधी ताकत लड़कियों की शादी करने में जा रही है। पाव ताकत छिपाने में जा रही है, शराब पीकर छिपाने में, प्रेम करके छिपाने में, घूस लेकर छिपाने में बची हुई पाव ताकत से देश का निर्माण हो रहा है तो जितना हो रहा है, बहुत हो रहा है। आखिर एक चौथाई ताकत से कितना होगा।
अगर कोई मुझसे पूछे कि भारतीयों के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता क्या है, तो मैं कहूँगा, मौके बे मौके अनायास परिचय बढ़ाना, आत्मीयता पैदा करना। आदमी को अपनी आत्मा में समेट लेने के लिए भारतीय कितना आतुर रहता है। -हरिशंकर परसाई
Profound, humorous, and satirical quotes by Harishankar Parsai, a pillar of the Hindi satire genre

