भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के सांसद, साहित्य अकादमी, तुलसी सम्मान सहित अनेक सम्मान और पुरस्कार प्राप्त प्रसिद्ध प्रखर हिंदी लेखक, कवि और कथाकार श्रीकांत वर्मा की 1986 में 25 मई को न्यूयॉर्क में कैंसर से मौत हुई। यहां प्रस्तुत हैं श्रीकांत वर्मा के कुछ उद्धरण
जब इंसान अपने दर्द को ढो सकने में असमर्थ हो जाता है तब उसे एक कवि की जरूरत होती है, जो उसके दर्द को ढोए अन्यथा वह व्यक्ति आत्महत्या कर लेगा।
मैं उन लोगों से घृणा करता हूँ जो उर्दू को सिर्फ एक मजहब की भाषा मानते हैं। ऐसे लोग सिर्फ एक भाषा से घृणा नहीं करते, बल्कि इस देश से भी बैर करते हैं।
साहित्य में कोई पक्ष-विपक्ष नहीं होता। पक्षधरता राजनीति का स्वभाव है।
हर व्यक्ति एक रहस्य है। वह स्वयं को समझ नहीं पाता। बहुत से लोग रास्ता दिखाते हैं। लेकिन कुछ लोगों को ही रास्ता दिखता है।
कविता लिखते हुए मेरे हाथ सचमुच काँप रहे थे। तब मैंने कहानियाँ भी लिखनी आरंभ कीं। यह सोचकर कि रचना से रचना का यह कंपन कुछ कम होगा।
नष्ट होने की भावना भी प्रेम का एक अविभाज्य अंग है।
कभी भी व्यक्तिगत दुखबोध की कविता एक अच्छी कविता का मानदंड नहीं हो सकती, वही कविता प्रामाणिक होगी जिसके सरोकार राष्ट्रीय दुखों से जुड़े होंगे।
जब तक प्रश्न है, तभी तक साहित्य है।
लेखक को यह नहीं भूलना चाहिए कि कुछ प्रश्न सार्वभौमिक होते हैं, कुछ निजी और कुछ राष्ट्रीय। वह किसी भी प्रश्न से कतरा नहीं सकता।
दरअस्ल, अस्मिता का प्रश्न अतीत के प्रश्न से जुड़ा हुआ है। कोई भी रचनाकार अपनी अस्मिता की तलाश अपनी परंपरा के बाहर जाकर नहीं कर सकता।
मेरे मन पर मुक्तिबोध की आतंक-भरी छाप है, यंत्रणामय स्मृतियाँ हैं। मुक्तिबोध को याद करते हुए तकलीफ होती है।
सीढियां समाप्त नहीं होतीं / उन्नति की हो / अथवा / अवनति की। -श्रीकांत वर्मा
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