
23 अक्टूबर 1923 को लखनऊ में असलम फर्रुखी का जन्म हुआ। बंटवारे के बाद उनका परिवार पाकिस्तान चला गया। असलम फर्रुखी पाकिस्तान के मशहूर उर्दू लेखक, साहित्यिक आलोचक, भाषाविद, विद्वान, बाल साहित्यकार, रेडियो स्क्रिप्ट राइटर बने। #AslamFarrukhi बच्चों की किताबें लिखने के लिए भी अलग से जाने जाते हैं। असलम फर्रुखी कई वर्षों तक कराची विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में प्रोफेसर और अध्यक्ष रहे। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत रेडियो पाकिस्तान में रेडियो नाटकों के लिए स्क्रिप्ट राइटर के तौर पर की थी। असलम फर्रुखी ने सिंध मुस्लिम कॉलेज (अब सिंध मदरसातुल इस्लाम यूनिवर्सिटी) और कराची विश्वविद्यालय में पढ़ाया और कराची विश्वविद्यालय में रजिस्ट्रार भी रहे। 15 जून 2016 को 92 वर्ष की उम्र में गुलशन-ए-इकबाल, कराची, पाकिस्तान में असलम फर्रुखी का इंतकाल हुआ। अनेक सम्मानों और पुरस्कारों के अलावा असलम फर्रुखी को 2009 में पाकिस्तान के राष्ट्रपति द्वारा प्राइड ऑफ परफॉरमेंस पुरस्कार और आदमजी साहित्यिक पुरस्कार मिले। उनके बेटे आसिफ फर्रुखी भी विद्वान के रूप में उभरे और कराची लिटरेचर फेस्टिवल के सह-संस्थापक बने।
यहां पेश हैं असलम फर्रुखी की 4 ग़ज़लें
हंगामा-ए-हस्ती से गुजर क्यूँ नहीं जाते
हंगामा-ए-हस्ती से गुजर क्यूँ नहीं जाते
रस्ते में खड़े हो गए घर क्यूँ नहीं जाते
मय-खाने में शिकवा है बहुत तीरा-शबी का
मय-खाने में बा-दीदा-ए-तर क्यूँ नहीं जाते
अब जुब्बा-ओ-दस्तार की वक’अत नहीं बाकी
रिंदों में ब-अंदाज-ए-दिगर क्यूँ नहीं जाते
जिस शहर में गुमराही अजीज-ए-दिल-ओ-जाँ हो
उस शहर-ए-मलामत में खिजर क्यूँ नहीं जाते
तोशा तो नहीं कोई नसीम-ए-सहरी का
बे-राहिला ओ जाद-ए-सफर क्यूँ नहीं जाते
शायद कि शनासा हो कोई बे-हुनरी का
क्यूँ डरते हो बाजार-ए-हुनर क्यूँ नहीं जाते
हर लहजा है जो सर के लिए इक नई ठोकर
उस जिल्लत-ए-हर-रोज से मर क्यूँ नहीं जाते
हम जिस के लिए जिंदा हैं बा-हाल-ए-परेशाँ
अब वो भी ये कहता है कि मर क्यूँ नहीं जाते
क्यूँ गोशा-ए-खलवत से निकलते नहीं असलम
बैठे हैं जिधर लोग उधर क्यूँ नहीं जाते
जद पे आ जाएगा जो कोई तो मर जाएगा
जद पे आ जाएगा जो कोई तो मर जाएगा
जद पे आ जाएगा जो कोई तो मर जाएगा
वक्त का काम गुजरना है गुजर जाएगा
खुद उसे भी नहीं मालूम है मंजिल अपनी
जाने वाले से न पूछो वो किधर जाएगा
आज अंधेरा है तो कल कोई चराग-ए-उम्मीद
मतला-ए-वक्त पे सूरज सा निखर जाएगा
इस तरफ आग का दरिया है उधर दार-ओ-रसन
दिल वो दीवाना कि जाएगा मगर जाएगा
कोई मंजिल नहीं बाकी है मुसाफिर के लिए
अब कहीं और नहीं जाएगा घर जाएगा
कू-ए-कातिल में तही-दस्त को जा मिलती नहीं
जो भी जाएगा लिए हाथ में सर जाएगा
कितनी तारीकी है शहर-ए-दिल-ओ-जाँ पर तारी
कोई अंदाजा नहीं कौन किधर जाएगा
एक गुल-दस्ता बनाया था प-ए-राहत-ए-जाँ
अब ये अंदेशा है हर फूल बिखर जाएगा
एक दिन ऐसा भी किस्मत से मिले जब असलम
रक्स करता हुआ महबूब-नगर जाएगा
मैं सोचता हूँ कहीं तू खफा न हो जाए
मैं सोचता हूँ कहीं तू खफा न हो जाए
तिरी अना मिरी जंजीर-ए-पा न हो जाए
ये जीती-जागती आँखें ये ख्वाब सी दुनिया
वुफूर-ए-शौक खुद अपनी जजा न हो जाए
कदम कदम पे बपा जश्न-ए-इम्तिहान-ए-वफा
तिरी तरह कोई दर्द-आश्ना न हो जाए
न देख मुझ को मोहब्बत की आँख से ऐ दोस्त
मिरा वजूद मिरा मुद्दआ न हो जाए
मैं जिस को ढूँड रहा हूँ नशात-ए-कुर्बत में
मिरे खयाल से भी मावरा न हो जाए
जमीं की गोद से सूरज निकालने वालो
सितारा-ए-सहरी रहनुमा न हो जाए
हरीम-ए-जाँ में है अर्जां खुमार-ए-तीरा-शबी
ये इस दयार की आब-ओ-हवा न हो जाए
गम-ए-फिराक में लज्जत सही मगर असलम
मिरी हयात मिरा खूँ-बहा न हो जाए।
ये हिकायत तमाम को पहुँची
ये हिकायत तमाम को पहुँची
जिंदगी इख्तिताम को पहुँची
रक्स करती हुई नसीम-ए-सहर
सुब्ह तेरे सलाम को पहुँची
रौशनी हो रही है कुछ महसूस
क्या शब आखिर तमाम को पहुँची
शब को अक्सर कलीद-ए-मय-खाना
शैख-ए-आली-मकाम को पहुँची
शहर कब से हिसार-ए-दर्द में है
ये खबर अब अवाम को पहुँची
पहले दो एक कत्ल होते थे
नौबत अब कत्ल-ए-आम को पहुँची
सब का अंजाम एक जैसा है
सुब्ह-ए-रौशन भी शाम को पहुँची
मौत बिल्कुल करीब है शायद
सुब्ह को पहुँची शाम को पहुँची। –असलम फर्रुखी
The one for whom I live, in this state of distress—even that person now asks, Why don’t you just die? — From the ghazals of Aslam Farrukhi, a renowned Urdu writer, critic, and radio scriptwriter
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