
19 अक्टूबर 1911 को रुदौली (फैजाबाद, उत्तर प्रदेश) में असरार-उल-हक मजाज लखनवी का जन्म हुआ। मजाज लखनवी रूमानी और क्रांतिकारी उर्दू शायर के रूप में मशहूर हुए। उन्होंने उर्दू में गजलें और नज्में लिखीं। वे कवि और पटकथा लेखक जावेद अख्तर तथा भारतीय-अमेरिकी मनोविश्लेषक सलमान अख्तर के मामा थे। मजाज का परिवार जमींदार वर्ग से जुड़ा था लेकिन वे बहुत अमीर नहीं थे। उनके भाई अंसार हरवानी पत्रकार थे और उनकी दो बड़ी बहनें – सफिया और हमीदा थीं। सफिया जाने माने उर्दू शायर जां निसार अख्तर की पत्नी थीं। इस तरह मजाज जावेद अख्तर के मामा हुए। मजाज ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में जो वक्त बिताया, उस दौरान वहां उर्दू के कई महत्वपूर्ण कवि और लेखक मौजूद थे। उन दिनों एएमयू साहित्यिक प्रतिभाओं की एक नर्सरी (केंद्र) हुआ करता था। यहीं पर मजाज के. एम. अशरफ और अब्दुल अलीम के नेतृत्व वाले प्रोग्रेसिव राइटर्स मूवमेंट (प्रगतिशील लेखक संघ) के संपर्क में आए। मजाज ने जिस दौर में अपनी रचनाएं लिखीं, वह शायरी के लिए बेहद जीवंत समय था, फैज अहमद फैज, फानी बदायूंनी, जज्बी, मखदूम मुहिउद्दीन, साहिर लुधियानवी, इस्मत चुगताई और अली सरदार जाफरी आदि उर्दू शायर मजाज के समकालीन और करीबी दोस्त थे। जोश मलिहाबादी और रघुपति सहाय फिराक गोरखपुरी आदि अन्य साहित्यकारों से भी मजाज के तअल्लुक थे। उनका पहला काव्य-संग्रह (दीवान) आहंग, फैज और जज्बी को समर्पित है, जिन्हें वे अपना दिल-ओ-जिगर कहते हैं साथ ही यह सरदार जाफरी और मखदूम को भी समर्पित है, जिन्हें वे अपना दस्त-ओ-बाजू मानते हैं। फैज ने आहंग के लिए एक बहुत ही विचारपूर्ण प्रस्तावना लिखी थी।
आर्थिक तंगी के कारण मजाज को अलीगढ़ में अपनी एएमयू की पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी और वे दिल्ली चले गए, जहां उन्होंने आवाज नामक पत्रिका में उप-संपादक (सब-एडिटर) के रूप में काम किया। यहाँ वे शाहिद अहमद देहलवी द्वारा चलाई जा रही प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन (प्रगतिशील लेखक संघ) की दिल्ली शाखा से सक्रिय रूप से जुड़ गए। बॉम्बे जाने से पहले उन्होंने एक साल तक ऑल इंडिया रेडियो के लिए भी काम किया जहाँ उन्होंने बॉम्बे सरकार के सूचना विभाग में काम किया। 1937 में वे लखनऊ लौट आए और जाफरी तथा सिब्ते हसन के साथ मिलकर परचम नाम की एक साहित्यिक पत्रिका शुरू की, जिसका केवल एक ही अंक छप पाया। लखनऊ में उन्होंने जाफरी और सिब्ते हसन के साथ हलका-ए-अदब (साहित्य का दायरा) और नया अदब (नया साहित्य) जैसी पत्रिकाओं के संपादकीय विभाग में भी काम किया। 2008 में भारत सरकार ने भारतीय साहित्य में उनके योगदान के सम्मान में एक स्मारक डाक टिकट जारी किया। 5 दिसंबर 1955 को जब लखनऊ में पहला स्टूडेंट्स उर्दू कन्वेंशन (छात्र उर्दू सम्मेलन) चल रहा था, तब मजाज का निधन हो गया। उस रात मजाज के दोस्त उन्हें लालबाग की एक शराब की दुकान पर ले गए, जहाँ उन्होंने छत पर बैठकर शराब पी। फिर वे सब यार एक-एक करके चले गए और नशे में मजाज कड़ाके की ठंडी रात में अकेले खुली छत पर अकेले पड़े रहे। सुबह किसी पड़ोस की इमारत से किसी की नजर #MajazLakhnavi पर पड़ी, पहले आवाज दी। जब मजाज के जिस्म में हरकत न हुई तो पास जाकर देखा गया, जिस्म अकड़ा हुआ था। उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने पाया कि ब्रेन हैमरेज (मस्तिष्क में रक्तस्राव) और निमोनिया के कारण मौत हो चुकी है। 7 दिसंबर 1955 को रिफाह-ए-आम हॉल में उनके लिए एक शोक सभा आयोजित की गई, जिसमें पूरे भारत से कवि, शायर, आलोचक और लेखक इत्यादि शामिल हुए। आलाचकों मजाज को महान अंग्रेजी कवि कीट्स के समान मानते हुए उर्दू का कीट्स कहा है। मजाज लखनवी को लखनऊ के एक कब्रिस्तान में दफनाया गया। उनकी कब्र पर उनकी 1945 में लिखी गई एक गजल का शेर लिखा है –
और इसके बाद सहर है, और नई सुबह है मजाज
मेरे साथ ही खत्म होती है लखनऊ के दुखों की शाम।
यहां मजाज लखनवी के कुछ शेर और एक नज्म पेश है –
बख्शी हैं हम को इश्क ने वो जुर्रतें मजाज
डरते नहीं सियासत-ए-अहल-ए-जहाँ से हम।
बहुत मुश्किल है दुनिया का सँवरना
तिरी जुल्फों कं पेच-ओ-खम नहीं है।
कुछ तुम्हारी निगाह काफिर थी
कुछ मुझे भी खराब होना था
तिरे माथे पे ये आँचल बहुत ही खूब है लेकिन
तू इस आँचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था। (कहते हैं कि यह शेर मजाज ने स्वतंत्रता आंदोलन में शिरकत कर रही नरगिस को देखकर साथी लड़कों के उकसाने पर लिखा था। नरगिस बाद में लोकप्रिय फिल्म अभिनेत्री बनीं)
मुझ को ये आरजू वो उठाएँ नकाब खुद
उन को ये इंतिजार तकाजा करे कोई
इश्क का जौक-ए-नजारा मुफ्त में बदनाम है
हुस्न खुद बे-ताब है जल्वा दिखाने के लिए
दफ्न कर सकता हूँ सीने में तुम्हारे राज को
और तुम चाहो तो अफ्साना बना सकता हूँ मैं
ये मेरे इश्क की मजबूरियाँ मआज-अल्लाह
तुम्हारा राज तुम्हीं से छुपा रहा हूँ मैं
रोएँ न अभी अहल-ए-नजर हाल पे मेरे
होना है अभी मुझ को खराब और जियादा
बताऊँ क्या तुझे ऐ हम-नशीं किस से मोहब्बत है
मैं जिस दुनिया में रहता हूँ वो इस दुनिया की औरत है
क्या क्या हुआ है हम से जुनूँ में न पूछिए
उलझे कभी जमीं से कभी आसमाँ से हम
ये आना कोई आना है कि बस रस्मन चले आए
ये मिलना खाक मिलना है कि दिल से दिल नहीं मिलता
इस महफिल-ए-कैफ-ओ-मस्ती में इस अंजुमन-ए-इरफानी में
सब जाम-ब-कफ बैठे ही रहे हम पी भी गए छलका भी गए
आँख से आँख जब नहीं मिलती
दिल से दिल हम-कलाम होता है
रूदाद-ए-गम-ए-उल्फत उन से हम क्या कहते क्यूँकर कहते
इक हर्फ न निकला होंटों से और आँख में आँसू आ भी गए
तुम्हीं तो हो जिसे कहती है नाखुदा दुनिया
बचा सको तो बचा लो कि डूबता हूँ मैं
हाए वो वक्त कि जब बे-पिए मद-होशी थी
हाए ये वक्त कि अब पी के भी मख्मूर नहीं
सब का तो मुदावा कर डाला अपना ही मुदावा कर न सके
सब के तो गरेबाँ सी डाले अपना ही गरेबाँ भूल गए
फिर किसी के सामने चश्म-ए-तमन्ना झुक गई
शौक की शोखी में रंग-ए-एहतराम आ ही गया
क्यूँ जवानी की मुझे याद आई
मैं ने इक ख्वाब सा देखा क्या था
तुम ने तो हुक्म-ए-तर्क-ए-तमन्ना सुना दिया
किस दिल से आह तर्क-ए-तमन्ना करे कोई
अब मेरे पास तुम आई हो तो क्या आई हो?
मैने माना के तुम इक पैकर-ए-रानाई हो
वो एक नर्स थी चारागर जिसको कहिए
मदावाये दर्दे जिगर जिसको कहिए
नज्म / शहर की रात – मजाज लखनवी
शहर की रात और मैं, नाशाद-ओ-नाकारा फिरूँ
जगमगाती जागती, सड़कों पे आवारा फिरूँ
गैर की बस्ती है, कब तक दर-ब-दर मारा फिरूँ
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
झिलमिलाते कुमकुमों की, राह में जंजीर सी
रात के हाथों में, दिन की मोहिनी तस्वीर सी
मेरे सीने पर मगर, चलती हुई शमशीर सी
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
ये रुपहली छाँव, ये आकाश पर तारों का जाल
जैसे सूफी का तसव्वुर, जैसे आशिक का खयाल
आह लेकिन कौन समझे, कौन जाने जी का हाल
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
फिर वो टूटा एक सितारा, फिर वो छूटी फुलझड़ी
जाने किसकी गोद में, आई ये मोती की लड़ी
हूक सी सीने में उठी, चोट सी दिल पर पड़ी
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
रात हँस – हँस कर ये कहती है, कि मयखाने में चल
फिर किसी शहनाज-ए-लालारुख के, काशाने में चल
ये नहीं मुमकिन तो फिर, ऐ दोस्त वीराने में चल
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
हर तरफ बिखरी हुई, रंगीनियाँ रानाइयाँ
हर कदम पर इशरतें, लेती हुई अंगड़ाइयां
बढ़ रही हैं गोद फैलाये हुये रुस्वाइयाँ
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
रास्ते में रुक के दम लूँ, ये मेरी आदत नहीं
लौट कर वापस चला जाऊँ, मेरी फितरत नहीं
और कोई हमनवा मिल जाये, ये किस्मत नहीं
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
मुंतजिर है एक, तूफान-ए-बला मेरे लिये
अब भी जाने कितने, दरवाजे है वहां मेरे लिये
पर मुसीबत है मेरा, अहद-ए-वफा मेरे लिए
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
जी में आता है कि अब, अहद-ए-वफा भी तोड़ दूँ
उनको पा सकता हूँ मैं ये, आसरा भी छोड़ दूँ
हाँ मुनासिब है ये, जंजीर-ए-हवा भी तोड़ दूँ
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
एक महल की आड़ से, निकला वो पीला माहताब
जैसे मुल्ला का अमामा, जैसे बनिये की किताब
जैसे मुफलिस की जवानी, जैसे बेवा का शबाब
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
दिल में एक शोला भड़क उठा है, आखिर क्या करूँ
मेरा पैमाना छलक उठा है, आखिर क्या करूँ
जख्म सीने का महक उठा है, आखिर क्या करूँ
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
मुफलिसी और ये मजाहिर, हैं नजर के सामने
सैकड़ों चंगेज-ओ-नादिर, हैं नजर के सामने
सैकड़ों सुल्तान-ओ-जबर, हैं नजर के सामने
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
ले के एक चंगेज के, हाथों से खंजर तोड़ दूँ
ताज पर उसके दमकता, है जो पत्थर तोड़ दूँ
कोई तोड़े या न तोड़े, मैं ही बढ़कर तोड़ दूँ
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
बढ़ के इस इंदर-सभा का, साज-ओ-सामाँ फूँक दूँ
इस का गुलशन फूँक दूँ, उस का शबिस्ताँ फूँक दूँ
तख्त-ए-सुल्ताँ क्या, मैं सारा कस्र-ए-सुल्ताँ फूँक दूँ
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
जी में आता है, ये मुर्दा चाँद-तारे नोंच लूँ
इस किनारे नोंच लूँ, और उस किनारे नोंच लूँ
एक दो का जिक्र क्या, सारे के सारे नोंच लूँ
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ। – मजाज लखनवी
O sorrow of the heart, what shall I do? O frenzy of the heart, what shall I do? — Verses and poems by Majaz Lakhnavi, a poet of romantic and revolutionary temperament
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