साथ ले निकले है सूरज की किरण पिचकारी, 18वीं सदी के शायर और नज्म के पितामह नज़ीर अकबराबादी की ग़ज़ल
हाँ इधर को भी ऐ गुंचादहन पिचकारीदेखें कैसी है तेरी रंगबिरंग पिचकारीतेरी पिचकारी की तकदीद में ऐ गुल हर सुबहसाथ ले निकले है सूरज की किरण पिचकारीजिस पे हो रंग…

