4 अक्टूबर 1884 को बस्ती, उत्तर-पश्चिमी प्रांत, ब्रिटिश भारत (अब उत्तर प्रदेश) में राम चंद्र शुक्ल (आचार्य राम चंद्र शुक्ल) का जन्म हुआ। राम चंद्र शुक्ल हिंदी साहित्य के शीर्षस्थ इतिहासकार बने। उन्हें व्यापक अनुभव-आधारित शोध का इस्तेमाल करके वैज्ञानिक तरीके से हिंदी साहित्य के इतिहास को व्यवस्थित करने वाला पहला व्यक्ति माना जाता है। लेखक के तौर पर राम चंद्र शुक्ल हिंदी साहित्य का इतिहास के लिए सबसे ज्यादा जाने जाते हैं। शुक्ल का काम छठी सदी से हिंदी कविता और गद्य की शुरुआत और बौद्ध व नाथ परंपराओं तथा अमीर खुसरो, कबीरदास, रविदास, तुलसीदास के मध्यकालीन योगदान से लेकर निराला और प्रेमचंद के आधुनिक यथार्थवाद तक के विकास को दिखाता है। #RamchandraShukla के बारे में अपनी समीक्षा (आचार्य रामचंद्र शुक्ल और हिंदी आलोचना) में जाने-माने आलोचक डॉ. राम विलास शर्मा ने इस बात पर जोर दिया है कि इस महान लेखक ने सामंती और दरबारी साहित्य का विरोध किया क्योंकि वह आम लोगों और समकालीन समाज के जीवन की सच्ची तस्वीर पेश नहीं करता था। राम चंद्र शुक्ल के नाम पर 1972 में स्थापित आचार्य राम चंद्र शुक्ल साहित्य शोध संस्थान साहित्यिक गतिविधियों का एक केंद्र है। इसे उनके बेटे गोकुल चंद्र शुक्ल के प्रयासों से वाराणसी स्थानीय प्रशासन द्वारा दी गई जमीन पर बनाया गया।
यहां प्रस्तुत हैं आचार्य रामचंद्र शुक्ल के कुछ प्रेरक, विचारणीय, अनुकरणीय कथन
देशप्रेम है क्या? प्रेम ही तो है। इस प्रेम का आकलन क्या है? सारा देश अर्थात मनुष्य, पशु, पक्षी, नदी, नाले, वन, पर्वत सहित सारी भूमि। यह साहचर्यगत प्रेम है।
संसार से तटस्थ रहकर, शांति-सुखपूर्वक लोक-व्यवहार-संबंधी उपदेश देनेवालों का उतना अधिक महत्त्व हमारे हिंदू-धर्म में नहीं है, जितना संसार के भीतर घुसकर उसके व्यवहारों के बीच सात्विक सौंदर्य की ज्योति जगानेवालों का है।
जो भावुक या सहृदय होते हैं, अथवा काव्य के अनुशीलन से जिनके भावप्रसार का क्षेत्र विस्तृत हो जाता है, उनकी वृत्तियाँ उतनी स्वार्थबद्ध नहीं रह सकतीं।
मानव-जीवन का नित्य और प्रकृत स्वरूप देखने के लिए दृष्टि जैसी शुद्ध होनी चाहिए, वैसी अतीत के क्षेत्र के बीच ही वह होती है। वर्तमान में तो हमारे व्यक्तिगत रागद्वेष में, वह ऐसी बँधी रहती है कि हम बहुत-सी बातों को देखकर भी नहीं देखते।
किसी देश की शब्द-परंपरा अर्थात भाषा, कुछ काल तक चलकर जो अर्थ विधान करती है, वही उस देश का साहित्य कहलाता है।
कविता सृष्टि-सौंदर्य का अनुभव कराती है, और मनुष्य को सुंदर वस्तुओं में अनुरक्त करती है।
मनुष्य के कठोर, मधुर और तीक्ष्ण दो पक्ष हैं और बराबर रहेंगे। काव्यकला की पूरी रमणीयता इन दोनों पक्षों के समन्वय के बीच मंगल या सौंदर्य के विकास में दिखाई पड़ती है।
जो किसी मुख के लावण्य, वन-स्थली की सुषमा, नदी या शैलतटी की रमणीयता, कुसुमविकास की प्रफुल्लता, ग्रामदृश्यों की सरल माधुरी देख मुग्ध नहीं होता, जो किसी प्राणी के कष्ट-व्यंजक रूप और चेष्टा पर करुणार्द्र नहीं होता जो किसी पर निष्ठुर अत्याचार होते देख क्रोध से नहीं तिलमिलाता, उसमें काव्य का सच्चा प्रभाव ग्रहण करने की क्षमता कभी नहीं हो सकती।
जब तक समष्टि-रूप में हमें संसार के लक्ष्य का बोध नहीं होता, और हमारे अंतःकरण में सामान्य आदर्शों की स्थापना नहीं होती, तब तक हमें श्रद्धा का अनुभव नहीं होता।
कोरी साधुता का उपदेश पाखंड है, कोरी वीरता का उपदेश उद्दंडता है, कोरे ज्ञान का उपदेश आलस्य है, और कोरी चतुराई का उपदेश धूर्तता है।
मनुष्य के व्यापार परिमित और संकुचित हैं। अतः बाह्य प्रकृति के अनंत और असीम व्यापारों के सूक्ष्म-से-सूक्ष्म अंशों को तारतम्यपूर्वक दिखाकर, कल्पना को शुद्ध और विस्तृत करना कवि का धर्म है।
भाव और विभाव, दोनों पक्षों के सामंजस्य के बिना पूरी और सच्ची रसानुभूति हो नहीं सकती।
जिन मनोवृत्तियों का अधिकतर बुरा रूप हम संसार में देखा करते हैं, उनका भी सुंदर रूप कविता ढूँढ़कर दिखाती है।
काव्य का उद्देश्य शुद्ध विवेचन द्वारा सिद्धांतनिरूपण नहीं होता, रसोत्पादन या भावसंचार होता है।
हृदय के मर्मस्थल का स्पर्श तभी होता है जब जगत या जीवन का कोई सुंदर रूप, मार्मिक दशा या तथ्य मन में उपस्थित होता है।
इस जगत में न तो सदा और सर्वत्र लहलहाता वसंतविकास रहता है, न सुखसमृद्धिपूर्ण हासविलास।
तुलसी की प्रतिभा सर्वतोमुखी है और सूर की एकमुखी। पर एकमुखी होकर उसने अपनी दिशा में जितनी दूर तक की दौड़ लगाई है, उतनी दूर तक की तुलसी ने भी नहीं और किसी कवि की तो बात ही क्या है।
जो धर्म उपदेश द्वारा न सुधरनेवाले दुष्टों और अत्याचारियों को दुष्टता के लिए छोड़ दे, उनके लिए कोई व्यवस्था न करे, वह लोकधर्म नहीं, व्यक्तिगत साधना है।
यदि कहीं पाप, अन्याय है, अत्याचार है, तो उनका फल उत्पन्न करना और संसार के समक्ष रखना लोकरक्षा का कार्य है।
भाव के विषय का कैसा ही यथातथ्य चित्रण क्यों न हो, यदि उसके वर्णन के अंतर्गत ही उक्त भाव को शब्द और चेष्टा द्वारा प्रकट करनेवाला न होगा, तो (शास्त्रीय दृष्टि से) रस कच्चा ही समझा जाएगा।
किसी कर्म में प्रवृत्त होने से पहले, यह स्वीकार करना आवश्यक होता है कि वह कर्म या तो हमारे लिए या समाज के लिए अच्छा है। इस प्रकार की स्वीकृति कर्म की पहली तैयारी है।
मनुष्य के कर्मों में जिस प्रकार दिव्य सौंदर्य और माधुर्य होता है, उसी प्रकार कुछ कर्मों में भीषण कुरूपता और भद्दापन होता है। इसी सौंदर्य या कुरूपता का प्रभाव मनुष्य के हृदय पर पड़ता है और इस सौंदर्य या कुरूपता का सम्यक प्रत्यक्षीकरण, कविता ही कर सकती है।
सूर (सूरदास) का संयोगवर्णन एक क्षणिक घटना नहीं है प्रेम, संगीतमय जीवन की एक गहरी चलती धारा है, जिसमें अवगाहन करने वाले दिव्य माधुर्य के अतिरिक्त और कहीं कुछ नहीं दिखाई पड़ता।
श्रीमानों के शुभागमन पर पद्य बनाना, बात-बात में उनको बधाई देना, कवि का काम नहीं। जिनके रूप या कर्मकलाप जगत और जीवन के बीच में उसे सुंदर लगते हैं, उन्हीं के वर्णन में वह स्वांतः सुखाय प्रवृत्त होता है।
सदाचारी के प्रति यदि हम श्रद्धा नहीं रखते, तो समाज के प्रति अपने कर्तव्य का पालन नहीं करते।
वर्तमान हमें अंधा बनाए रहता है, अतीत बीच-बीच में हमारी आँखें खोलता रहता है।
अत्याचार का दमन और क्लेश का शमन करते हुए चित्त में जो उल्लास और तृष्टि होती है, वही लोकोपकारी कर्म-वीर का सच्चा सुख है।
कवि की पूर्ण भावुकता इसमें है कि वह प्रत्येक मानवस्थिति में अपने को डालकर, उसके अनुरूप भाव का अनुभव करे।
करुणा और सात्विकता का संबंध इस बात से और भी सिद्ध होता है कि किसी पुरुष को दूसरे पर करुणा करते देख, तीसरे को करुणा करनेवाले पर श्रद्धा उत्पन्न होती है।
भौतिक सौंदर्य के अवलोकन से हमारी आत्मा को जिस प्रकार संतोष होता है, उसी प्रकार मानसिक सौंदर्य से भी।
जिस प्रकार एक कुरूपा स्त्री अलंकार लादकर सुंदर नहीं हो सकती, उसी प्रकार प्रस्तुत वस्तु या तथ्य की रमणीयता के अभाव में, अलंकारों का ढेर काव्य का सजीव स्वरूप नहीं खड़ा कर सकता।
ज्ञान ही भावों के संचार के लिए मार्ग खोलता है। ज्ञानप्रसार के भीतर ही भावप्रसार होता है।
जिसमें शिष्टों के आदर, दीनों पर दया, दुष्टों के दमन आदि जीवन के अनेक रूपों का सौंदर्य दिखाई पड़ेगा, वही सर्वांगपूर्ण लोकधर्म का मार्ग होगा।
भीषणता और सरसता, कोमलता और कठोरता, कटुता और मधुरता, प्रचंडता और मृदुता का सामंजस्य ही लोकधर्म का सौंदर्य है।
जिस वस्तु के प्रत्यक्ष ज्ञान या भावना से तदाकार परिणति जितनी ही अधिक होगी, उतनी ही वह वस्तु हमारे लिए सुंदर कही जाएगी।
किसी साहित्य में केवल बाहर की भद्दी नकल उसकी अपनी उन्नति या प्रगति नहीं कही जा सकती। बाहर से सामग्री आए, खूब आए, पर वह कूड़ा-करकट के रूप में न इकट्ठी की जाए। उसकी कड़ी परीक्षा हो, उस पर व्यापक दृष्टि से विवेचन किया जाए, जिससे हमारे साहित्य के स्वतंत्र और व्यापक विकास में सहायता पहुँचे।
जो लोग स्वार्थवश, व्यर्थ की प्रशंसा और खुशामद करके वाणी का दुरुपयोग करते हैं वे सरस्वती का गला घोंटते हैं।
लक्ष्य यदि व्यापक और श्रेष्ठ है, तो साधन का अनिवार्य अनौचित्य उतना खल नहीं सकता।
ग्लानि अंतःकरण की शुद्धि का एक विधान है।
धीर, गंभीर और सुशील अंतःकरण की बड़ी भारी विशेषता यह होती है कि वह दूसरे में बुरे भाव का आरोप जल्दी नहीं कर सकता।
साधारण-असाधारणय अनेक वस्तुओं के मेल से एक विस्तृत पूर्ण चित्र संघटित करनेवाले ही, कवि कहे जाने के अधिकारी हैं। -आचार्य रामचंद्र शुक्ल
As Acharya Ramchandra Shukla stated, the beauty of Lok-dharma duty towards society lies in the harmony of the formidable and the delightful, the tender and the stern, the bitter and the sweet, the fierce and the gentle
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