
24 अक्टूबर 2005 को डेट्रॉइट, मिशिगन में दिग्गज अमेरिकी नागरिक अधिकार कार्यकत्री रोजा पार्क्स (रोजा लुईस मैकॉले पार्क्स जन्म 4 फरवरी 1913 टस्केगी, अलबामा) का निधन हुआ। मुख्य रूप से 1955 में अलबामा के मोंटगोमरी में एक बस के अंदर अपनी सीट से हटने से इनकार करने के लिए जानी जाती हैं। रोजा पार्क्स जिम क्रो नस्लीय अलगाव कानूनों का विरोध करते हुए ऐसा किया था, जिसकी वजह से मोंटगोमरी बस बहिष्कार आंदोलन शुरू हुआ। तब बस में बैठे अश्वेत व्यक्ति को किसी गोरे के आने पर उसके लिए अपनी सीट छोड़ देने का नियम था। उन्हें मदर आफ द सिविल राइट्स मूवमेंट कहा गया। नागरिक अधिकार आंदोलन में अपने योगदान के लिए पार्क्स को कई पुरस्कार मिले। एससीएलसी ने 1963 में रोजा पार्क्स फ्रीडम अवार्ड की शुरुआत की, खुद रोजा पार्क्स को यह पुरस्कार 1972 में जाकर मिला। 1965 में उन्हें एफ्रो-अमेरिकन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी की ओर से डिग्निटी ओवरड्यू पुरस्कार दिया गया और डेट्रॉइट के फोर्ड ऑडिटोरियम में आयोजित एक समारोह में उन्हें सम्मानित किया गया। 1968 में कैपिटल प्रेस क्लब ने उन्हें मार्टिन लूथर किंग जूनियर अवार्ड से सम्मानित किया। 1979 में एनएएसीपी ने उन्हें स्पिंगार्न मेडल दिया। यह सम्मान उन्हें अपनी सीट छोड़ने से इनकार करने के दौरान दिखाए गए उनके शांत साहस और दृढ़ संकल्प के लिए दिया गया। 1980 में एनएएसीपी ने उन्हें अपने मार्टिन लूथर किंग जूनियर अवार्ड से भी सम्मानित किया। 1983 में उन्हें मिशिगन विमेंस हॉल ऑफ फेम में शामिल किया गया। 1984 में उन्हें नेशनल कोएलिशन ऑफ 100 ब्लैक विमेन की ओर से कैंडेस अवार्ड मिला। रोजा पार्क्स को सरकारी कांग्रेसनल गोल्ड मेडल, प्रेसिडेंशियल मेडल ऑफ फ्रीडम और विंडसर-डेट्रॉइट इंटरनेशनल फ्रीडम फेस्टिवल फ्रीडम अवार्ड जैसे पुरस्कार भी मिले।
रोजा पार्क्स को मोंटगोमरी बस बहिष्कार में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका और उसके बाद प्रारंभ अश्वेतों के आंदोलन के लिए जाना जाता है। यूनाइटेड स्टेट्स कांग्रेस ने उन्हें नागरिक अधिकारों की प्रथम महिला और स्वतंत्रता आंदोलन की जननी के रूप में सम्मानित किया था। पार्क्स ने अनेक नागरिक अधिकार अभियानों में भाग लिया। 1 दिसंबर, 1955 को, मोंटगोमरी, अलबामा में, पार्क्स ने जेम्स एफ. ब्लेक नामक एक श्वेत यात्री के लिए सीट खाली करने से इन्कार कर दिया था। व्यवस्था थी कि बसों में गोरे लोगों को बैठने के लिए काले लोगों को सीट खाली करनी पड़ती थी। इस घटना के बाद पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। इसके बाद अश्वेत लोगों का भेदभाव के खिलाफ चल रहा आंदोलन और तेज हो गया। इसके मुख्य अगुआ लोगों में मार्टिन लूथर किंग जूनियर भी थे। नेशनल एसोसिएशन फॉर द एडवांसमेंट ऑफ कलर्ड पीपल (एनएएसीपी) का कहना था कि पार्क्स अलबामा अलगाव का उल्लंघन करने में सविनय अवज्ञा के लिए गिरफ्तारी के बाद अदालती चुनौती से निपटने के लिए सबसे अच्छी उम्मीदवार थीं। कालों ने बसों में सीट खाली करने के कानून का जमकर उल्लंघन किया और बसों का बहिष्कार भी। मामला राज्य की अदालतों में उलझ गया, लेकिन संघीय मोंटगोमरी बस मुकदमा ब्राउनर बनाम गेल के परिणामस्वरूप नवंबर 1956 में फैसला आया कि अमेरिकी संविधान के 14वें संशोधन के समान सुरक्षा खंड के तहत बस अलगाव असंवैधानिक है। रोजा पार्क्स ने अपनी आत्मकथा लिखी और इस बात पर जोर देती रहीं कि न्याय के संघर्ष में अभी और काम किया जाना बाकी है। अमेरिकी राज्य कैलिफोर्निया और मिसौरी उनके जन्म दिन को रोजा पार्क्स डे के रूप में राज्य स्तर पर मनाते हैं जबकि ओहियो, ओरेगॉन और टेक्सास उसकी गिरफ्तारी की सालगिरह 1 दिसंबर को रोजा पार्क्स डे मनाते हैं। RosaParks अवज्ञा की कार्रवाई और मोंटगोमरी बस बहिष्कार आंदोलन के महत्वपूर्ण प्रतीक बन गई। वह नस्लीय अलगाव के प्रतिरोध की एक अंतरराष्ट्रीय प्रतीक बन गईं, और एडगर निक्सन और मार्टिन लूथर किंग जूनियर सहित नागरिक अधिकार नेताओं के साथ संगठित और सहयोग किया। रोजा पार्क्स उस समय एक स्थानीय डिपार्टमेंट स्टोर में सीमस्ट्रेस के रूप में कार्यरत थीं और मोंटगोमरी की सचिव थीं। श्रमिकों के अधिकारों और नस्लीय समानता के लिए कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण देने वाले टेनेसी केंद्र हाईलैंडर फोक स्कूल में भी उन्होंने सेवाएं दीं। उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया। गोरे लोगों ने उन्हें जान से मारने की धमकियाँ दीं। 1965 से 1988 तक उन्होंने अफ्रीकी-अमेरिकी अमेरिकी प्रतिनिधि जॉन कॉनयर्स के सचिव और रिसेप्शनिस्ट के रूप में कार्य किया। वह ब्लैक पावर आंदोलन और अमेरिका में राजनीतिक कैदियों के समर्थन में भी सक्रिय रहीं।
यहां पेश हैं रोजा पार्क्स के कुछ विचारोत्तेजक उद्धरण
जब आप कुछ सही कर रहे हों, तो आपको कभी भी डरना नहीं चाहिए।
मैं एक ऐसे इंसान के रूप में जानी जाना चाहती हूँ, जिसे सभी लोगों की आजादी, समानता, न्याय और समृद्धि की परवाह हो।
मैंने इन वर्षों में सीखा है कि जब कोई व्यक्ति मन बना लेता है, तो उसका डर कम हो जाता है, यह जान लेना कि क्या करना है, डर को खत्म कर देता है।
हर व्यक्ति को अपना जीवन दूसरों के लिए एक मिसाल के तौर पर जीना चाहिए।
मैं बस झुकते-झुकते थक गई थी।
क्या कभी ऐसा हुआ है कि आपको कोई चोट लगी हो, वह थोड़ी ठीक होने लगे, और आप बार-बार उस घाव को फिर से कुरेद दें?
मैं चाहती हूँ कि मुझे एक ऐसे इंसान के रूप में याद रखा जाए जो आजाद होना चाहता था ताकि बाकी लोग भी आजाद हो सकें।
नस्लवाद आज भी हमारे बीच मौजूद है। लेकिन यह हम पर निर्भर है कि हम अपने बच्चों को उन चुनौतियों के लिए तैयार करें जिनका सामना उन्हें करना पड़ सकता है, और उम्मीद है कि हम इस पर जीत हासिल कर लेंगे।
मेरा मानना है कि हम इस धरती पर जीने, बड़े होने और इस दुनिया को सभी के लिए एक बेहतर जगह बनाने के लिए आए हैं, ताकि हर कोई आजादी का आनंद ले सके।
बस में बैठने के लिए मुझे गिरफ्तार करना चाहते हैं? आप ऐसा कर सकते हैं।
लोग अक्सर कहते हैं कि मैंने अपनी सीट इसलिए नहीं छोड़ी क्योंकि मैं थक गई थी, लेकिन यह सच नहीं है। मैं शारीरिक रूप से नहीं थकी थी या यूँ कहें कि मैं उतनी ही थकी थी जितनी कि काम के दिन के अंत में आमतौर पर होती हूँ। मैं उस समय बूढ़ी नहीं थी, हालाँकि कुछ लोग मुझे बूढ़ी समझते हैं। मैं 42 साल की थी। नहीं, मैं बस झुकते-झुकते थक गई थी।
मैंने पहले भी अपनी सीट छोड़ी थी, लेकिन उस दिन मैं कुछ ज्यादा ही थक गई थी। एक दर्जन (कपड़े सिलने वाली) के तौर पर अपने काम से थकी हुई, और अपने दिल के दर्द से थकी हुई।
मैं बस काम से घर लौटने की कोशिश कर रही थी।
मैंने ईश्वर पर भरोसा करना और उन्हें अपनी ताकत मानना घ्घ्सीखा। बहुत पहले ही मैंने तय कर लिया था कि मैं एक आजाद इंसान बनूँगी और डर के आगे नहीं झुकूँगी। मुझे हमेशा यही लगा कि अगर मैं कर सकती हूँ, तो अपना बचाव करना मेरा अधिकार है। मैंने इन वर्षों में सीखा है कि जब जब इंसान मन बना लेता है, तो उसका डर कम हो जाता हैय यह जान लेने से कि क्या करना है, डर खत्म हो जाता है।
लोग अक्सर कहते हैं कि मैंने अपनी सीट इसलिए नहीं छोड़ी क्योंकि मैं थकी हुई थी, लेकिन यह सच नहीं है। नहीं, मैं बस झुकते-झुकते थक गई थी।
लोग अक्सर कहते हैं कि मैंने अपनी सीट इसलिए नहीं छोड़ी क्योंकि मैं थकी हुई थी, लेकिन यह सच नहीं है। मैं शारीरिक रूप से नहीं थकी थी, मैं बस झुकते-झुकते थक गई थी।
हमारे जीवन, हमारे कामों और हमारे कर्मों की यादें दूसरों के जरिए आगे बढ़ती रहेंगी।
नहीं।
आज भी मेरा मानना है कि हम इस धरती पर जीने, आगे बढ़ने और इस दुनिया को सभी के लिए एक बेहतर जगह बनाने के लिए आए हैं, जहाँ हर कोई आजादी का आनंद ले सके। -रोजा पार्क्स
बचपन में मैंने बाइबल से सीखा कि ईश्वर पर भरोसा रखना चाहिए और डरना नहीं चाहिए, और मुझे लगा कि जो भी मुश्किलें मेरे सामने आएंगी, उन्हें सहने की ताकत ईश्वर मुझे देंगे। ईश्वर ने मेरे सारे डर दूर कर दिए।
वहाँ मुझे सबसे ज्यादा मजा बेकन तलने और कॉफी बनने की महक लेने में आता था, और यह जानकर अच्छा लगता था कि मेरे बजाय गोरे लोग ये सब तैयार कर रहे हैं। वहाँ इंसानों द्वारा बनाई गई झील में तैरना, वॉलीबॉल खेलना और स्क्वायर डांसिंग करना होता था। हाइलैंडर में समय बिताना बहुत सुखद था। हम भूल ही जाते थे कि कौन किस रंग का है। तब मैं 42 साल की थी, और यह मेरी जिंदगी के उन कुछ पलों में से एक था, जब मुझे गोरे लोगों की तरफ से कोई नफरत या दुश्मनी महसूस नहीं हुई।
निरीक्षक ने उसे पीटा, भूखा रखने की कोशिश की, जूते तक नहीं दिए और उसके साथ इतना बुरा बर्ताव किया कि उसके मन में गोरे लोगों के लिए गहरी नफरत पैदा हो गई। मेरे दादाजी ने ही मेरी माँ, उनकी बहनों और उनके बच्चों के मन में यह बात डाली थी कि किसी के भी द्वारा किए गए बुरे बर्ताव को कभी सहना नहीं चाहिए। यह बात मानो हमारे जींस में ही आ गई थी।
बदलाव लाने के लिए, आपको पहला कदम उठाने से डरना नहीं चाहिए। हम तब असफल होते हैं जब हम कोशिश ही नहीं करते।
मिस व्हाइट के स्कूल में मैंने सबसे बड़ी बात यह सीखी कि मैं भी गरिमा और आत्म-सम्मान रखने वाली एक इंसान हूँ, और मुझे किसी और से कमतर नहीं समझना चाहिए, सिर्फ इसलिए कि मैं अश्वेत थी।
अश्वेत गुलामों और श्वेत अनुबंधित सेवकों के बीच यही एक अंतर था। आमतौर पर अश्वेत गुलामों को अपने नाम रखने की अनुमति नहीं होती थी, उनके मालिक उन्हें नए नाम दे देते थे।
उस समय मुझे समझ नहीं आया कि क्लान की गतिविधियाँ इतनी ज्यादा क्यों थीं, लेकिन बाद में मुझे पता चला कि ऐसा इसलिए था क्योंकि प्रथम विश्व युद्ध से लौट रहे अफ्रीकी-अमेरिकी सैनिक यह मान रहे थे कि चूँकि उन्होंने अपने देश की सेवा की है, इसलिए वे भी समान अधिकारों के हकदार हैं।
वहाँ मुझे सबसे ज्यादा खुशी इस बात से मिलती थी कि बेकन तलने और कॉफी बनाने का काम मैं नहीं, बल्कि श्वेत लोग कर रहे थे।
मैंने तय कर लिया था कि मैं हाथ में कागज का टुकड़ा लिए किसी श्वेत व्यक्ति के पास जाकर उनसे कोई मदद नहीं माँगूँगा। यह फैसला मैंने खुद, एक व्यक्ति के तौर पर लिया था। -रोजा पार्क्स
I was just tired of bending down” — Thought-provoking statement by Rosa Parks, the ‘Mother of the Civil Rights Movement’ and an American civil rights activist
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